जंगे उहुद की 10 अहम बातें

मुस्लिमों के वार से तिलमिलाए हुए कुरऐश के बदले की जंग थी जंगे उहुद। जंगे उहुद की तारीख से लगभग एक साल पहले जंगे बद्र में 313 मुस्लिमों ने मिलकर 1000 कुरऐश लस्कर को धूल चटाई थी।

जंगे बद्र में कुरऐश के लोग इतने बेइज़्ज़त और इतनी बुरी तरह से हरे के वो इस जंग को भुला नहीं पा रहे थे तो उन्होने अपनी एक कोन्फ्रेंस बुलाई और ये तय किया कि वो मुस्लिमों के खिलाफ जंग करेंगे।

तो उन्होने जंगे बद्र का बदला लेने कि तयारी शुरू कर दी और नतीजतन लगभग एक साल बाद जंगे उहुद आन पड़ी।

जंगे उहुद इस्लामी इतिहास में काफी बड़ा मक़ाम रखती है और शायद उसकी असली वजह हुजूरे पाक सलल्लाहो ताला अलाइहि वासल्लम का घायल होना है।

आज हम हम आपको जंगे उहुद से जुड़े 10 अहम बातें बटेंगे जिनहे शायद आप नहीं जानते।

जंगजुओं की तादाद

किसी भी जंग में अगर सबसे अहम किरदार किसी बात का होता है तो वो है उसमे शरीक होने वाले जंगजू। और इसमे जंगजुओं कि तादाद बहुत ही अहम होती है।

तो जंगे उहुद में क्या थी तादाद जंगजुओं कि?

अगर हम दोनों फौजों में जंगजुओं कि बात करें तो कुरऐश कि फौज मुस्लिम फौज से चार गुना से भी बड़ी थी। कूरऐश कि फौज में कुल मिलाकर 3000 जंगजु थे जिनमें 700 बख्तर बंद (कवच के साथ) थे। 3000 ऊंट और 200 घोड़े थे।

इसके मुक़ाबले मुस्लिमों के फौज में 1000 लोग जिनमे 100 बख्तर बंद थे और सिर्फ 2 घोड़े थे। इस 1000 में से 300 लोग जंग शुरू होने से पहले ही वापस लौट गए। इस तरह मुस्लिमों के पास सिर्फ 700 लोगों कि फौज थी।

हज़रत हमज़ा के कत्ल पर ईनाम

हज़रत हमज़ा, जो कि बहुत ही उम्दा लड़ाका थे। उन्होने जंगे बद्र में कुरऐश को काफी नुकसान पहुंचाया था। जंगे उहुद में वो कुरऐश के असली निशाने पर थे। और उनको मरने के लिए इनामात भी रखे गए। जैसे नीचे पेश किया गया है।

कूरऐश के सरदारों में से एक जुबैर बिन मूतिम ने अपने गुलाम से कहा,” अगर तुम मुहम्मद के चाचा हमज़ा को मारकर, बद्र में कत्ल हुए मेरे चाचा कि मौत का बदला लोगे तो मैं तुम्हें आज़ाद कर दूंगा।“ उस गुलाम को ये सौदा काफी पसंद आया और उसने हामी भर दी।

थोड़ा दूर चलने के बाद, अबू सुफयान कि बीवी हिन्द ने उस गुलाम को आवाज़ लगाई और कहा,” अगर तुम हमज़ा को मारकर मेरे वालिद कि मौत का बदला लोगे तो मैं अपने सारे जेवरात तुम्हें दे दूँगी।“

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उस गुलाम का नाम था वहशी बिन हर्ब।   जो बाद में इस्लाम मे दाखिल हो गया।

मुनाफिकों का असली चेहरा

मुसलमानों कि एक 1000 कि फौज में 300 मुनाफिक जिनका सर्दा अब्दुल्लाह बिन उबय्य था, भी शामिल थे जो जंग शुरू होने से पहले ही जंग से वापस लौट गए।

उनके लौटने का कारण उन्होने ये बताया कि वो मदीने से बाहर जंग नहीं करेंगे।

जंग में औरतों की शिरकत

जंगे उहुद में कुल मिलाकर 29 औरतें भी शामिल थीं। इनमे 15 कुरऐश कि फौज में थीं और 14 मुस्लिम फौज में। हालांकि उन्होने जंग में लड़ाई नहीं कि मगर उनकी शिरकत को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता है।

कुरऐश कि फौज में कुल 15 औरतें थीं जिंका काम था कुरऐश के लोगों को उनके बदले कि बात याद दिलाते रहना। इन औरतों कि सरदार थी अबू सुफयान कि बीवी हिन्द थी।

मुस्लिम खेमे में कुल मिलकर 14 औरतें शामिल थीं जिंका काम था लोगों को पानी पिलाना, घायलों कि खिदमत करना वगैरह। और उन औरतों में हज़रत फातिमा भी शामिल थीं।

हज़रत हमज़ा की शहीदी

जंग के दौरान, हज़रत हमज़ा लड़ते लड़ते मुस्लिम फौज के बहिरी हिस्से पर जा पहुंचे। तभी एक शख़्स उनकी तरफ आता हुआ दिखा वो सबा बिन अब्दुलल उज्जा था।

उसी वक़्त वो गुलाम जिसका नाम वहशी बिन हर्ब था वो हज़रत हमज़ा कि ताक में था और उनको देखकर चट्टानों के पीछे छिप गया। वही से वो हज़रत हमज़ा के उसके भाले कि हद में आने का इंतिज़ार करने लगा।

थोड़ी ही देर बाद हज़रत हमज़ा उसके भाले कि हद में आ आ गए और उसने निशाना साध कर भला उनकी तरफ फेंका वो उनके शरीर को चीरता हुआ घुस गया। वो मुड़े और गुलाम कि तरफ उससे में देखा और उसकी तरफ बढ़े मगर एक दो कदम के बाद गिर पड़े।

वो गुलाम उनसे काफी दूर खड़ा था फिर भी दर के मारे कांप रहा था और वही खड़े खड़े उनकी जिस्म की हरकतों के बंद होने तक उसकी हिम्मत न पड़ी।

ये मुस्लिम खेमे के लिए बहुत बड़ा नुकसान था।

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कुरेश का पस्त होना

जैसा मैंने पहले भी बताया की जंग के दौरान एक वक़्त ऐसा भी आया जब लगा की मुस्लिम ये जंग जीत चुके हैं। कूरऐश की फौज तिलमिला उठी और वो इधर उधर भागने लगी थी।

आइनान पर 50 तीरंदाजों ने इकरीमह और खालिद की 200 की घुड़सवार सेना को रोक रखा था और उधर 650 मुस्लिम जंगजू 2800 कुरऐश पर भरी पद रहे थे।

कूरऐश फौज में ऐसा माहौल तारी हो गया की उन्हें लगा की वो अब ये जंग जीत नहीं पाएंगे और मैदाने जंग से भागने लगे। उनकी औरतों ने भी तेजी से भाग सके इसके लिए अपने कपड़े ऊपर उठाए और भागने सिवाय एक के जिसका नाम था अम्र।

कूरऐश की फौज बुरी तरह से पस्त हो चुकी थी।

नाफ़रमान तीरंदाज

जंगे उहुद कि सुरते हाल ऐसी थी कि मुस्लिमों के खेमे पर दो सिमतों से हमला किया जा सकता था। दायें से भी और बाएँ से भी। हालांकि मुस्लिम खेमे का दायाँ हिस्सा जो कि उनका सामने क भी हिस्सा था वो मुस्तैद था जबकि उसका बायाँ या पिछला हिस्सा कमजोर था।

अगर कुराइश पीछे के हिस्से से उमपर हमला कर दें तो मुस्लिमो का हार्न तय था। यहाँ पर मदीने के ताजदार, महबूबे परवरदिगार ने अपनी जंगी तरकीब लगाई और पिछले हिस्से कि पहाड़ी जिसका नाम आइनान था उसपर 50 तीरंदाज़ मुस्तैद कर दिये और उनके सख्त हिदायत दी। हिदायत नीचे पेश है।

“ दुश्मन की घुड़सवार सेना पर अपनी तीरो से हमला करो। उन्हे हमारे पीछे आने से रोको। जबतक तुम अपनी मक़ाम पर रहोगे तबतक हमारी फौज का पिछला हिससा महफूज है। किसी भी सुरते हाल में इस मक़ाम को नहीं छोडना है। अगर तुम हमें जीतता हुआ देखो, हमारी खुशी में शामिल होने मत आओ, अगर हमें हारता हुआ देखो, हमारी मदद के लिए मत आओ।“

और ठीक ऐसा ही हुआ, जबतक ये तीरंदाज़ अपने मक़ाम पर काम थे तबतक दुसमानों के घुड़सवार सेना जिसकी अगुवाई एक तरफ से खालिद बिन वलीद और दूसरे तरफ से इकरीमह बिन अबू जहल कर रहे थे।

पर जेएनजी के दौरान एक वक़्त ऐसा आया जब लगा कि मुस्लिम जीत चुके हैं, कुरऐश मैदान छोड़कर भागने लगे थे सिवाय, खालिद और इकरीमह कि फौज के। तब तीरंदाजों को लगा कि मुस्लिम जंग जीत चुके है और वो उतरना चाहे तब उनके सरदार अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर ने उन्हे रोका और कहा कि हमें यही रुकने को कहा गया है जबतक कि कोई नया फरमान न आ जाए। फिर भी वो माने नहीं और नीचे उतार गए।

उनका नीचे उतरना था कि खालिद जो पहले से ही इस ताक में था उसने धावा बोलदिया और देखते ही देखते जंग का नतीजा बिलकुल उलट हो गया। इस जेएनजी में शिकस्त कि सबसे बड़ी वजह तीरंदाजों कि नाफरमानी ही बनी।

हज़रत खालिद की पहली जंग।

हज़रत खालिद बिन वलीद इस्लामिक इतिहास के सबसे कामयाब आर्मी जनरल थे। शायद इस्लामी इतिहास के ही नहीं बल्कि इंसानियत के इतिहास के भी।

जंगे उहुद उनकी पहली जंग थी। कहा जाता है उन्होने जितनी भी जंगों में फौज की अगुवाई की है वो सारी जंगे जीते हैं। ये जंग भी कुरऐश उनही की अगुवाई वाली फौज से ही जीते है।

ये उनकी पहली जंग थी जो उनहो ने मुसलमानों के खिलाफ लड़ी थी।

ऊबय बिन खल्फ के लिए हुजूरे पाक की पेशेंगोई

जंग अपने शबाब पर थी, कुरऐश फौज ने अपना दबदबा बना लिया था। इसी दौरान, हुज़ूर सल्लल्लाहो ताला अलाइहै वसल्लम बार बार अपने कंधों की तरफ देख रहे थे तभी एक सहाबी ने उनसे इसका मजरा पूछा।

तो उन्होने कहा , “ मैं उबय्य बुन खल्फ के बारे में सोच रहा हु। वो पीछे से मेरे पास तक आ सकता है। अगर तुम उसे देखो तो मेरे पास आने देना।“

उन्होने ने अपनी बात खत्म की ही होगी कि इकरीमह के दस्ते से निकल कर एक घुड़सवार चिल्लाता हुआ आया, “ मुहम्मद (स0 अ0 व0) मैं आ गया हु, आज या तो मैं नहीं या तुम नहीं”

ये देखकर कुछ सहाबियों ने उसे रोकना चाहा तो आप (SAW) ने माना कर दिया और कहा,” उसे आने दो”

जांगे बद्र के बाद जब कुरऐश के लोग कैदी थे तो उनमे अब्दुल्लाह बिन उबय्य नाम का भी एक कैदी था। उबय्य बिन खल्फ उसका वालिद था। उसे छुड़ाने के लिए 4000 दिरहम कि रकम अदा कि और उसी उसने कहा-

ओ मोहम्मद! मेरे पास एक घोड़ा है जिसे मैं बहुत सारा चारा खिला खिला कर मजबूत बनाऊँगा और अगले जंग उसी घोड़े से आऊँगा और तुम्हारा कत्ल करूंगा।

इस पर आका (SAW) ने जवाब दिया,” नहीं, तुम मुझे नहीं मार पाओगे। मगर इन्शा अल्लाह मैं तुम्हें मार दूंगा चाहे तुम घोड़े पर ही क्यूँ न रहो।“

आखिरकार, उबय्य पैगंबर के पास पाहुच गया और उसने बड़े इतमीनान से अपनी तलवार निकाली। उसे पैग़ंबर कि फुर्ती का अंदाज़ा भी नहीं था वो अपने हिसाब से काम कर रहा था और तलवार निकाल कर उनके तरफ बढ़ा। आका (SAW) ने अपना नेज़ा निकाला और फेंक कर मारा। उबय्य बचना छटा था पर बच न सका। और घोड़े से गिर पड़ा।

जब वो घोड़े से गिरा तो उसकी पसली कि हड्डी टूट गयी और वो चीख पड़ा, “ खुदा कसम, मुहम्मद ने मुझे मार दिया।“

 हुजूरे पाक का घायल होना।

जंगे उहुद इकलौती ऐसी जंग थी जिसमे हुज़ूर (SAW) घायल हुव थे। इब्ने कयमियह था उस शख़्स का नाम जिसने उनको घायल किया था।

उम्मीद करता हूँ आपको ये पोस्ट पसंद आयी होग। इसे ज्यादा से ज्यादा शेर करें और लोगों को जंगे उहुद के बारे मे बताएं।

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