सूरह नास – तार्रुफ़, तफ़सीर और फ़ज़ाईल

अस्सलाम व अलैकुम व रहमत उल्लाह। मेरे प्यारे दोस्तो मैं आपका फिर से इसतेकबाल करता हूँ। आज हम कुरान शरीफ की सबसे आखिरी सूरह, सूरह नास के बारे में ज़िक्र करेंगे। उम्मीद करता हूँ कि आप आखिर तक इस ज़िक्र-ओ-अज़्कार को पढ़ेंगे।

सूरह नास का तार्रुफ़

जैसा मैंने पहले बताया, सूरह नास कुरान शरीफ की 114वीं और सबसे आखिरी सूरह है। सबसे पहले हम इस सूरह के बारे में कुछ ज़रूरी जानकारी हासिल करेंगे।

मकामे नुज़ूल

ज़्यादा सही क़ौल के मुताबिक सूरह नास मदीना मुनव्वरा में नाज़िल हुई।

रुकु, आयात और कलिमात की तादाद।

सूरह नास में 1 रुकु 6 आयत, 20 कलिमे और 79 हर्फ़ हैं।

नास नाम रखने की वजह

अरबी में इन्सानों को नास कहते हैं। इस सूरह में नास लफ्ज का ज़िक्र बारंबार हुआ है जिस वजह से इसे सूरह नास कहते हैं।

सूरह नास का मौजू-ए-नुज़ूल

इस सूरह मुबारका में उन जिन्नातों और इन्सानो से अल्लाह की पनाह मांगने की तालीम दी गयी है जो लोगो के दिलों में वसवसे डालते हैं।

सूरह फलक के साथ मुनासिबत

सूरह नास का सूरह फलक के साथ मुनासिबत ये है कि सूरह फलक में ज़ाहिरी शर से अल्लाह कि पनाह मांगने की तालीम दी गयी है जबकि सूरह नास में खुफिया शर से पनाह मांगने की हिदायत है।

तफ़सीर-ओ-तहरीर

सूरह नास तर्जुमा

तुम कहो मैं उसकी पनाह में आया जो सबका रब है। सबका मालिक है। सबका ख़ुदा  है। उसके शर से जो दिल में बुरे ख्याल डाले और छिपा रहे। वो जो लोगों के दिलों में वसवसे डालते हैं। जिन्न और इंसान।

कुल अऊज बि रब्बिन नास

तुम कहो मैं तमाम लोगों के रब की पनाह लेता हूँ।

अल्लाह ताला सारी मख़लूक़ का रब है मगर चूंकि इंसान अशरफूल मख्लूकात है इस लिए उनका खुसुसियत से ज़िक्र फरमाया है।

इंसान की अज़मत और शराफ़त

इससे इंसान की अज़मत व शराफ़त भी मालूम हुई कि बतौरे ख़ास अल्लाह ताला ने अपनी रबूबीयत की निस्बत उस की तरफ फरमायी। उलमा ने यहाँ ये नुक्ता ब्यान फरमाया है कि इस सूरह में लफ़्ज़े नास पाँच मर्तबा आया है।

पहली मर्तबा

पहली मर्तबा लफ़्ज़े नास का इस्तेमाल रब्बिन नास में किया गया है। चूंकि इंसान बचपन में सिर्फ परवरिश पाता है और उसे एक पालने वाले कि ज़रूरत होती है। इसलिए यहाँ पर अल्लाह कि रबूबीयत वाली सिफ़्फ़त का ज़िक्र किया गया है।

दूसरी मर्तबा

दूसरी मर्तबा लफ़्ज़े नास का इस्तेमाल मलिकिन नास में किया गया है। जिसके माना है इन्सानों का बादशाह। चूंकि इंसान जब जवान हो जाता है तो वो मदमस्त हो कर बेराह हो जाता है। इसलिए उसे कानून में गिरफ्त करने वाले एक बादशाह कि ज़रूरत होती है।

तीसरी मर्तबा

तीसरी मर्तबा लफ़्ज़े नास का इस्तेमाल इलाहिन नास में किया गया है। जिसके माना है इन्सानो का ख़ुदा। जब इंसान बूढ़ा हो जाता है तो वो इबादत कि तरफ मायल होता है और उस वक़्त उसे एक ख़ुदा कि ज़रूरत होती है। इसलिए यहाँ पर अल्लाह के ख़ुदा होने के सिफ़्फ़त का ज़िक्र किया गया है।

चौथी मर्तबा

चौथी मर्तबा लफ़्ज़े नास का इस्तेमाल फ़ी सुदूरिन नास में है। यहाँ पर नास से मुराद ऐसे इंसान है सो सच्चाई कि राह पर चलते है और शैतान जिनहे अपने वसवसों में फसाता है और उन्हे इबादत से रोकता है।

पाँचवीं मर्तबा

पाँचवीं मर्तबा लफ़्ज़े नास का ज़िक्र मिनल जिन्नते वननास के साथ है। यहाँ पर लफ़्ज़े नास से मुराद ऐसे इंसाने है जो लोगों के दिलों में वसवसे डालते हैं और फसादी होते है।

तो अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने साफ कर दिया है कि शैतान सिर्फ जिन्नात ही नहीं बल्कि इंसान में भी हो सकता है।

मिन सर्रिल वसवासिल खन्नास

बार-बार वसवसे डालने वाले, छिप जाने वाले के शर से।

इससे मुराद शैतान है, और ये उसकी आदत है इंसान जब गाफ़िल हो तो उसके दिलों में वसवसे डाले और जब अल्लाह के ज़िक्र में लगा हो तो दुबक कर बैठ जाए। तो इससे साफ-साफ यही ज़ाहिर होता है कि इंसान को कभी भी अल्लाह से गाफिल नहीं होना चाहिए।

वसवसा इल्हाम में फर्क

बुरे ख़्याल को वसवसा और अच्छे ख्याल को इल्हाम कहते हैं। वसवसा शैतान की तरफ से होता है इसलिए उसपर लाहौल भेजना चाहिए। इलहाम फरिश्तों के ज़रिये अल्लाह की तरफ से होता है इसलिए इसपर अल्लाह का शुक्र करना चाहिए।

शैतान हमारा ऐसा दुश्मन है जो हमें देख सकता है लेकिन हम उसे नहीं देख सकते। तो ऐसे में हमें ऐसे रब से पनाह मंगनी चाहिए जो शैतान को देखे मगर शैतान उसे न देख सके।

अल्लजी यूवस्विसो फी सुदूरिन नास

वह जो लोगों के दिलों में वस्वसे डालता है।

शैतान ज़बान और आवाज़ से नहीं बहकाता बल्कि सीधे दिल पर असर डालता है। बुरी चीज़ को अच्छी करके दिखाता है। खुद दुश्मन है मगर दोस्त की तरह पेश आता है और जैसा इंसान हो वैसा ही वस्वसा डालता है।

मिनल जिन्नते वन्नास

जिन्नों और इन्सानों में से

यहाँ अल्लाह रबबूल इज्ज़त का फरमान ये है कि वो कोई भी मख़लूक़ जो वस्वसे डाले वो शैतान है फिर चाहे इंसान हो या जिन्नात।

जैसे जिन्नात इन्सानों के दिलों में वस्वसे डालते हैं वैसे ही इंसान भी इंसान के दिलों में वस्वसे डालते हैं। और जब लोग इन वस्वसों को मानने लगते है तो उनका सिलसिला चल पड़ता है।

जिन्नों और इन्सानो दोनों के शैतानों से पनाह मांगे

इन्सानों को चाहिए की वो सिर्फ जिन्नों के ही नहीं बल्कि इन्सानों के शैतानों से भी पनाह मांगे।

फ़ज़ाईल

इसके लिए बहुत ही मुफीद वजीफा पेशे खिदमत है। उम्मुल मोमीनीन आएशा सिद्दीका रज़ी0 से रिवायत है कि हुजूरे अकरम रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम जब रात को सोने जाते थे तो वो सोने से पहले कुल हो अल्लाहो अहद (सूरह एखलास), सूरह फ़लक और सूरह नास पढ़ कर अपने हाथों को दम  करते थे और अपने पूरे जिस्मे मुबारक पर मलते थे। और ये ये अमल 3 मर्तबा करते थे।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन खबीब रज़ी0 फरमाते हैं कि हम पर हल्की बारिश हुई और अंधेरा छाने लगा था और नबी करीम सल्लल्लाहो ताला अलईहे वसल्लम का इंतज़ार कर रहे थे ताकि वो आकार हमे नमाज़ पढ़ाएँ। फिर हुज़ूर पुर सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम तशरीफ लाये और इरशाद फरमाया, पढ़ो! मैंने अर्ज़ किया क्या पढ़ूँ? उन्होने इरशाद फरमाया, सुबह शाम तीन-तीन बार कुल हो अल्लाहो अहद, कुल अऊज़ बि रब्बिल फ़लक और कुल अऊज़ बि रब्बिन नास पढ़ो, इनकी तिलावत करना तुम्हें हर बुरी शय से बचाएगा।

अल्लाह हम सभी मुसलमान भाइयों को इस तफ़सीर से हिदायत लेने की तौफीक अता फरमाए।

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