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सैय्यदना हज़रत हम्ज़ा रज़ि० का क़ातिल कौन था? क्या हुआ था उसका अंजाम?

शेरे खुदा सैय्यदना हज़रत हम्ज़ा रज़ि० मौलाए कायनात सैय्यदना मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के चचा थे। अहले मक्का में इनके जैसा जाँबाज़ कोई नहीं था।

सैय्यदना खालिद बिन वलीद रज़ि० बहुत ही उम्दा दर्ज़े के जंगजू थे जिससे कोई भी मोमिन इंकार नहीं कर सकता। बावजूद इसके वो भी सैय्यदना हज़रत हम्ज़ा रज़ि० से रश्क़ खाया करते थे कि मक्का में इन जैसा घुड़सवार और तलवारबाज़ कोई नहीं है।

खैर हम यहाँ बात करने वाले हैं कि आख़िर ऐसे बेजोड़ घुड़सवार, तलवारबाज़ और जंगजू सैय्यदना हज़रत हम्ज़ा रज़ि० का क़ातिल कौन था?

सैय्यदना हज़रत हम्ज़ा रज़ि० का क़ातिल एक हब्शी गुलाम था जिसका नाम वहशी इब्न हर्ब था।

कौन था वहशी इब्न हर्ब?

ये जुबैर इब्न मुतइम का गुलाम था और हज़रत बिलाल का दोस्त (जब हज़रत बिलाल आज़ाद नहीं हुए थे) था। हज़रात बिलाल ने वहशी को कई बार इस्लाम की दावत दी मगर वो अपने आज़ाद होने की रट लगाए बैठा था। और उसने इस्लाम की दावत क़ुबूल नहीं की लिहाज़ा हज़रत बिलाल ने उसका साथ छोड़ दिया।

जंगे उहुद और वहशी की आज़ादी की पेशकश

जब जंगे उहुद दरपेश आयी तो जुबैर इब्न मुतइम ने वहशी को आज़ाद करने की पेशकश रखी और इसके लिए शर्त रखी कि शेरे खुदा सैय्यदना हज़रत हम्ज़ा रज़ि० को क़त्ल करना होगा।

पर वहशी ही क्यों? और शेरे खुदा सैय्यदना हज़रत हम्ज़ा रज़ि० के ही क़त्ल की साजिश क्यों?

वहशी इसलिए कि वो एक बहुत उम्दा भालाफ़ेंक था जिसका निशाना शायद ही चूकता था और सैय्यदना हज़रत हम्ज़ा रज़ि० को क़रीबी टक्कर में हरा पाना लगभग नामुमकिन था इसलिए मुश्रिकीन ने ये तजवीज़ पेश की।

सैय्यदना हज़रत हम्ज़ा रज़ि० को इसलिए निशाना बनाया गया कि उन्होंने जंगे बद्र में मुश्रिकीन का वो हश्र किया था जो एक शेर हिरण का करता है।

तो, जुबैर इब्न मुतइम वहशी को आज़ाद करने का वादा किया और साथ ही अबू सुफियान की बीवी हिन्द बिन्त उतबा ने अपने सारे जेवरात देने की पेशकश की।

जंगे उहुद का वाक़्या

आखिरकार वो दिन आ गया जिसका वहशी को इन्तिज़ार था। उसका निशाना सिर्फ और सिर्फ सैय्यदना हज़रत हम्ज़ा रज़ि० ही थे और किसी से उसे कोई सरोकार नहीं था। उसकी निगाहें और भाला सिर्फ और सिर्फ सैय्यदना हज़रत हम्ज़ा रज़ि० को ही तलाश रही थीं।

आख़िरकार सैय्यदना हज़रत हम्ज़ा रज़ि० उसे नज़र आ गए और बड़ी मशक़्क़त और ध्यान लगाने के बाद उसे साफ़ मौका मिला और उसने भाला फेंका जो सैय्यदना हज़रत हम्ज़ा रज़ि० के नाफ के ऊपर लगा और उन्होंने पलट कर इसे देखा जिससे ये काफी दर गया मगर ज़ख्म गहरा होने की वजह से वो गिर पड़े। और वहीँ शहीद हो गए।

थोड़ी देर बाद वहशी उनके पास गया और अपना भाला निकल कर वापस मुश्रिकीन के खेमे में चला गया क्योंकि उसका काम तो हो गया था। वो महज़ इसी के लिए आया था।

जंग के बाद के हालात

जंग के बाद सैय्यदना हज़रत हम्ज़ा रज़ि० का क़ातिल आज़ाद तो कर दिया गया मगर उसने देखा कि उसकी हैसियत आज भी गुलामों जैसी ही थी। लोग उसे अपने मजमों में शामिल नहीं किया करते थे।

ये वक़्त था जब उसका अफ़सोस और बढ़ गया कि ऐसी आज़ादी का क्या फायदा जहाँ क़द्र न हो। बड़ा गुमसुम रहने लगा और अपने दिन गमकुशारी में गुजरने लगा जबतक की मक्का फतह नहीं हो गया। और जब उसे पता चला कि नबी करीम मक्का फ़तह करने के लिए आ रहे हैं तो वह डर कर तायफ़ भाग गया।

वहशी के ईमान की क़ुबूलियत

जब मक्का फतह हुआ तो सभी मक्का वालों को नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की बारगाह में पेश किया गया। वहशी बहुत डरा हुआ था क्योंकि वो जानता था कि उसने किसी आम शख़्स का क़त्ल नहीं किया था बल्कि नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के चचा का क़त्ल किया था। कैसे वह उनके पास जाये?

तब हज़रत बिलाल रज़ि० उसको पास गए और उसे नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के हुज़ूर पेश किया। नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने उसका ईमान तो क़ुबूल कर लिया मगर उसको अपना चेहरा दिखाने से मना कर दिया।

उसने दोबारा नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम को अपना चेहरा नहीं दिखाया मगर अपनी किस्मत रोता रहा की हाय! उसने क्या कर दिया।

जंगे यमामा का शुजाअत नुमा वाक़्या

नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के ज़ाहिरी दुनिया से पर्दा फरमाने के बाद अरब के कई कबीले मुर्तद हो गए कुछ पलीद ने नुबूवत का भी ऐलान कर दिया। उन सभी का रद्द करने के लिए ख़लीफ़ा ए नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम अबू बक्र सिद्दीक रज़ि० ने रिद्दा की मुहीम शुरू की।

इन्ही पलीदों और कज़्ज़ाबों में से एक था मुसैलमा कज़्ज़ाब था जिसके रद्द के लिए जो जंग हुई उस जंग को जंगे यमामा के नाम से जानते हैं।

इस जंग में इस्लामी लश्कर के कमाण्डर सैय्यदना हज़रत खालिद बिन वलीद थे। वहशी भी सभी रिद्दा जंगों में इस इरादे से शामिल हुआ था की शायद उसकी शहादत हो जाये और उसके पिछले गुनाह का कफ़्फ़ारा मिल जाये।

इस जंग में मुसैलमा कज़्ज़ाब निशाने पर था और हज़रत वहशी रज़ि० ने वही भाले का इस्तेमाल किया जो वो जंगे उहुद में लेकर गए थे। मुसैलमा के क़िले में घुसने के बाद हज़रत वहशी रज़ि० ने जंग करते हुए उन्हें मुसैलमा दिख गया।

बस फिर क्या था उन्होंने उस कज़्ज़ाब का पीछा किया और दुश्मनों को मारते काटते उसके करीब पहुंचे और उसका क़त्ल कर दिया। इस तरह हज़रत वहशी रज़ि० ने उसे कज़्ज़ाब से आलमे इस्लाम के फ़िटने को ख़त्म किया।

उसको क़त्ल करने के बाद उन्होंने वो भाला ये कहते हुए तोड़ दिया कि “तुझसे ही मैंने दुनिया के एक नेक और बहादुर आदमी का क़त्ल किया और तुझी से ही मैंने सबसे बड़े जाहिल और कज़्ज़ाब का भी क़त्ल किया।

तो ये थी हकीकत हज़रत वहशी इब्न हर्ब रज़ि० की।

इस वाक़ये से सबक

हज़रत वहशी रज़ि० के इस वाक़िये से हमें ३ सबक मिलता

  1. आपके गुनाह कितने ही बड़े क्यों न हो वो अल्लाह की रहमत की बूँद के बराबर भी नहीं।
  2. अल्लाह जिससे चाहे अच्छे काम करवाए और जिससे चाहे बुरे। हज़रत वहशी से अल्लाह ताला से दोनों तरह के काम करवाए।
  3. दिलों को खोलने वाला अल्लाह है। अम्र बिन हिशाम (अबू जहल) को कई मौके मिले मगर अल्लाह ने उसकी किस्मत में कुफ्र लिख रखा था सो वो कुफ्र की हालत में ही मरा। वहीँ हज़रत वहशी को अल्लाह ने ईमान लाने का एक मौका दिया और उनका दिल खोल दिया।

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