फ़ज़ीलत बिस्मिल्लाह शरीफ की- Fazeelat Bismillah Shareef Ki

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम (Bismillah Shareef) क़ुरान शरीफ की पहली आयत है। इस आयत की अपनी खुद की बहुत ही फ़ज़ीलत है। आज हम बिस्मिल्लाह शरीफ की फ़ज़ीलत बतफ़सीर बयान की करेंगे। तो आइए शुरू करते हैं।

बिस्मिल्लाह – अल्लाह के नाम से शुरू

अल्लामा अहमद सावी फरमाते हैं, क़ुरान मजीद की इब्तेदा बिस्मिल्लाह शरीफ़ (Bismillah Shareef) से इसलिए की गयी ताकि अल्लाह त-आला के बंदे इस बात की पैरवी करते हुये हर अच्छे काम की इब्तेदा बिस्मिल्लाह से करें (सावी, अल फ़ातिहा, 1/15) और हदीस पाक में भी अहम काम की इब्तिदा बिस्मिल्लाह से करने की तरगीब दी गयी है । 

हज़रत अबू हुरैरा से रिवायत है, हुज़ूर पुरनूर ने इरशाद फ़रमाया जिस काम की इब्तेदा बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम से न की गयी तो वो अधूरा रह जाता है। –(कंजुल माल, किताबुल अज़्कार)

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लिहाज़ा तमाम मुसलमानों को चाहिए की वो हर नेक और जायज़ काम की इब्तिदा बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम से करें बहुत बरकत होगी।

रहमानिर रहीम – बहुत मेहरबान और रहम वाला

इमाम फख़रुद्दीन राज़ी फरमाते हैं, अल्लाह त-आला ने अपनी ज़ात को रहमान और रहीम फ़रमाया तो ये उसकी शान से बईद है कि वो रहम न फरमाये।  

मर्वी है की एक साएल ने बुलंद दरवाज़े के पास खड़े होकर कुछ मांगा तो उसे थोड़ा सा दे दिया गया। दूसरे दिन वो एक कुल्हाड़ा लेकर आया और दरवाज़े को तोड़ना शुरू कर दिया। उससे पूछा गया की तू ऐसे खून कर रहा है? उसने जवाब दिया, तू दरवाज़े को अपनी अता के मुताबिक कर या अपनी अता को दरवाज़े के लायक। 

जिस तरह उस दरवाज़े से उसके मालिक की अताएगी की लयकीयत मिलनी चाहिए उसी तरह दूसरी चीजों से भी हो। जैसे बिस्मिल्लाह शरीफ कुरान का दरवाज़ा है तो जितनी फ़ज़ीलत कुरान की है वैसी ही फ़ज़ीलत बिस्मिल्लाह शरीफ (Bismillah Shareef) की भी।

बिस्मिल्लाह शरीफ (Bismillah Shareef) से जुड़ी कुछ शरई मसाइल

वुल्माए किराम ने बिस्मिल्लाह शरीफ (Bismillah Shareef) से मुताल्लिक बहुत से शरई मसाइल बयान किए हैं, इनमें से चंद दर्ज़ ज़ेल हैं।

  1. जो बिस्मिल्लाह हर सूरह की शुरुआत में लिखी रहती है वो पूरी आयत है और जो सूरह नामाल की आयत नंबर 30 में लिखी है वो उस आयत का एक हिस्सा है ।
  2. बिस्मिल्लाह हर सूरह की शुरू की आयत नहीं है बल्कि पूरे कुरान की एक आयत है जिसे हर सूरह के शुरू में लिख दिया गया है। ताकि दो सूरतों के दरमियान फासला हो जाए। इसलिए सूरह के ऊपर इम्तियाजी शान में बिस्मिल्लाह लिखी जाती है। आयत की तरह मिलाकर नहीं। इमाम जहरी नमाजों में बिस्मिल्लाह आवाज़ से नहीं पढ़ता । यहाँ तक की जब जिबरील अलइह सलाम वही लेकर आए थे तो भी पहली वही बिस्मिल्लाह नहीं थी ।  
  3. तरावीह पढ़ने वाले को चाहिए की वो किसी एक सूरह के साथ बिस्मिल्लाह को बुलंद आवाज़ में पढे जिससे एक आयत छूट न जाए।
  4. तिलावत शुरू करने से पहले आ-ऊज़्बिल्लाही मिनस शैत्वानीर रजीम पढ़ना सुन्नत है । लेकिन अगर शागिर्द उस्ताद एसडबल्यू कुरान सीख रहा है तो उसके लिए सुन्नत नहीं है।
  5. सूरह की इब्तिदा में बिस्मिल्लाह पढ्न सुन्नत है वर्ण मुस्तहब।
  6. अगर सूरह तौबा की तिलावत शुरू की जाए। तो आ-ऊज़्बिल्लाह और बिस्मिल्लाह (Bismillah Shareef) दोनों पढ़ा जाए। और अगर सूरह तौबा तिलावत के बीच में आ जाए तो बिस्मिल्लाह पढ़ने की ज़रूरत नहीं। 

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