तफ़सीरुल कुरान : सूरह अल बक़्रह आयत 4 और 5 | Tafseerul Quran: Surah Al Baqraha Ayat 4 &

“wallazeena yoominoona bima unzila ilaika wama unzila min qablik, wabil aakhirate hum yooqinoon”

Surah al baqraha Verse 4

” वल्लज़ीना यूमीनूना बिमा उंज़ेला इलैका वमा उंज़ेला मिन क़ब्लिक, वबिल आखिरते हुम यूक़िनून। “

तर्जुमा कंजुल इरफ़ान- और वह ईमान लाते हैं उस पर जो तुम्हारी तरफ नाज़िल किया और जो तुमसे पहले नाज़िल किया गया और वह आखिरत पर यकीन रखते हैं।

“Ooolaaaika alaa hudammir rabbehim, wa ooolaaaika humul muflihoon”

Surah Al Baqraha Verse 5

“ऊलाइका अला हुदम्मिर रब्बिहिम, व ऊलाइका हुमुल मुफ़लिहून”

तर्जुमा कंजुल इरफ़ान- यही लोग अपने रब्ब की तरफ से हिदायत पर हैं और यही लोग कामयाबी हासिल करने वाले हैं।


बिरादराने इस्लाम, अस्सलाम व अलइकूम रहमतुल्लाह । राहे हक़ की तफ़सीरुल कुरान में आपका ख़ैर मकदम है।

तफ़सीरुल कुरान के सिलसिले में अभी हमारा सूरह अल बक़्रह का सिलसिला चल रहा है। आज हम सूरह अल बक़्रह की आयत नंबर 4 और 5 की तफ़सीर का ज़िक्र करेंगे।

और भी पढ़ें – सूरह अल बक़्रह की आयत 1 और 2 की तफ़सीर

और भी पढ़ें – सूरह अल बक़्रह की आयत 3 की तफ़सीर

अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने सूरह अल बकरह की आयत 4 और 5 में मोमीनीन के वस्फ़ बयान किए हैं।

अल्लाह रब्बुल इज्ज़त फरमाता है मोमिन वो होता है जो हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम पर ईमान लाते हैं और उन सभी चीजों पर जो अल्लाह ने उन पर नाज़िल फरमायी है।

मोमिन हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम से पहले आने वाले नबियों पर भी ईमान लाते हैं।

तो चलिये बिना देर किए शुरू करते हैं।

वल्लज़ीना यूमीनूना बिमा उंज़िला इलैक ( wallazeena yoominoona bima unzila ilaika)- (और वह ईमान लाते हैं उसपर जो तुम्हारी तरफ नाज़िल किया)

इस आयत में अहले किताब के वह मोमीनीन मुराद हैं जो अपनी किताब पर और तमाम पिछली किताबों पर और अंबियाय अलैहि सलाम पर नाज़िल होने वाली वहीयों पर ईमान लाये और कुरान पाक पर भी ईमान लाये।

इस आयत में “मा उंज़िला इलैक””Ma Unzila Ilaik” से तमाम कुरान पाक और शरीयत मुराद है। (जुम्ल, अल बक़्रह तहयातुल आया, 4, 1/19)

अल्लाह ताला की किताबों वगैरा पर ईमान लाने का शरई हुक्म

याद रखें जिस तरह कुरान पाक पर ईमान लाना हर इंसान पर फर्ज़ है उसी तरह पहली किताबों पर भी ईमान लाना ज़रूरी है। जो गुजिसता अंबियाय किराम पर नाज़िल हुईं।

अलबत्ता की जो अहकाम हमारी शरीयत में मंसूख हो गए हैं उन पर अमल दुरुस्त नहीं फिर ईमान ज़रूरी है।

मसलन पिछली कई शरियतों में बैतुल मुक़द्दस क़िबला था लिहाजा इसपर ईमान लाना तो हमरे लिए ज़रूरी है मगर अमल यानि नमाज़ में बैतुल मुक़द्दस की तरफ मुंह करना जायज़ नहीं।

ये हुक्म मंसूख हो चुका है।

और ये भी याद रखें कि कुरान करीम से पहले जो भी अल्लाह ताला ने अपने अंबियाय किराम नाज़िल फरमाया उन सब पर ईमान लाना “फर्ज़े आईन” है।

यानि ये ऐतिकाद रखा जाए कि अल्लाह ताला ने गुजिस्ता अंबियाय किराम पर किताबें नाज़िल फरमाई और उनमे जो कुछ फरमाया सब हक़ है।

कुरान शरीफ पर यूं ईमान लाना फर्ज़ कि हमारे पास जो मौजूद है उसका एक एके लफ्ज अल्लाह ताला कि तरफ से है और बरहक है।

जबकि “तफ़सीलन” जानना फर्ज़े किफाया है, लिहाज़ अवाम पर इसकी तफ़सीलत का इल्म हासिल करना फर्ज़ नहीं है।

जबकि ऐसे उलमा मौजूद हों जिनहोने ये इल्म हासिल कर लिया हो।

वबिल आखिरते हम यूकीनून(wabil aakhirate hum yooqinoon)- (और आखिरत पर यकीन रखते हैं)

यानि मुत्तकी लोग क़यामत पर और जो कुछ इसमे जज़ा व हिसाब वगैरा है सब पर ऐसा यकीन रखते हैं कि इसमें उन्हे ज़रा भी शक व शुब नहीं।

इसमे इस बात कि तरफ भी इशारा है कि यहूदियों और इसाइयों का आखिरत के मुताल्लिक अक़ीदा दुरुस्त नहीं।

उनमे से हर एक का ये अक़ीदा था कि उन के अलावा कोई जन्नत में दाखिल नहीं होगा जैसा कि सूरह अल बक़्रह कि आयत 111 में है और ख़ुसूसन यहूदियों का अक़ीदा था कि हम अगर जहन्नम में गए भी तो चंद दिन के लिए ही जाएंगे उसके बाद सीधे जन्नत में जाएंगे जैसा कि सूरह अल बक़्रह कि आयत 80 में है। (जुम्ल, अल बक़्रह, तहयातुल आया, 4, 1/19)

इस तरह के फ़ासिद और मन गढ़ंत खयालात जब जेहन में जम जाते हैं तो फिर उनकी इसलाह बहुत मुश्किल होती है।

हुमूल मुफ़लिहून (वही कामयाबी पाने वाले हैं)

यानि जिन लोगों में बयान कि गयी सिफ़्फ़ात पायी जाती हैं वो अपने रब्ब अज़्ज़ व जल्ल कि तरफ से आता कि गयी हिदायत पर हैं और वही लोग जहन्नम से निजात पाकर जन्नत में दाखिल होकर कामिल कामयाबी हासिल करने वाले हैं। (खाज़िन, अल बक़्रह, तहयतुल आया, 5, 1/25)

असल कामयाबी हर मुसलमान को हासिल है।

याद रहे इस आयत में “फलाह” से मुराद “कामिल फलाह” है। यानि कामिल कामयाबी मुत्तकीन ही को हासिल है।

हाँ असले फलाह हर मुसलमान को हासिल है अगरचे वो कितना भी गुनहगार क्यों ना हो।

क्योंकि ईमान बज़ाते खुद ही बड़ी कामयाबी है जिसकी बरकत से हर हाल जन्नत का दाखिला ज़रूर हासिल होगा चाहे जहन्नम के अजाब के बाद हासिल हो।

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