Siratal Mustakeema – सूरह अल फातिहा की आखिरी 4 आयतों की तफ़्सीर

Siratal Mustakeema पर चलने की तलब के साथ सूरह फातिहा का खात्मा होता है। इस आयत मे अल्लाह से siratal mustakeema पर चलने की दुआ मांगी जाती है।

इससे पहले की आयतों मे अल्लाह रब्बुल इज्ज़त की हम्द और शुक्र अदा किया गया। और अल्लाह ताला के पूरी दुनिया का ही नहीं बल्कि आखिरत का भी मालिक होने का ज़िक्र किया गया है।


अस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्ला।  सूरह फ़ातिहा की तफ़्सीर का सिलसिला जारी रखते हुए आज हम इसकी आखिर की 4 आयतों की तफ़्सीर बयां करेंगे। तो आइये शुरू करते है —

सूरह अल फातिहा की आयात 4 ता 7 अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त से दुआ तलब  करने के लिए है। इस आयत में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की वहदानियत और सिर्फ उसी से मांगने का ज़िक्र किया गया है। 


इयया कना-बुदू, व इयया कनस्तईन – तेरी ही इबादत करता हु और तुझसे ही मदद मांगता हूँ (आयत नंबर 4 )  

इससे पहले की आयतों में बयान हुआ की हर तरह की हम्द ओ सना का हक़ीक़ी मुस्तहक़ अल्लाह ताला है। जो सब जहानो का पालने वाला बहुत मेहरबान और रहम फरमाने वाला है। 

जैसा की हमने पहले बताया, इस आयत के ज़रिये हम अल्लाह ताला की बारगाह में अपनी बंदगी का इज़हार ऐसे करें कि, अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त, हम सिर्फ तेरी ही इबादत करते है और तुझसे ही मदद चाहते हैं। 

तेरे अलावा कोई और इस लायक नहीं जिसकी इबादत की जा सके और हक़ीक़ी मदद करने वाला भी तू ही है। 

तेरी इजाज़त व मर्ज़ी के बगैर कोई किसी की किसी क़िस्म की ज़ाहिरी, बातिनी, जिस्मानी, रूहानी, छोटी, बड़ी कोई मदद नहीं कर सकता। 

इबादत और ताज़ीम में फ़र्क़ 

इबादत का मफ़हूम बहुत वाज़िह है, समझने के लिए इतना ही काफी है कि, किसी को इबादत के लायक समझते हुए उस की किसी क़िस्म की ताज़ीम करना इबादत कहलाता है। और अगर इबादत के लायक न समझें तो महज़ ताज़ीम होगी इबादत नहीं कहलाएगी। 

जैसे नमाज़ में हाथ बांध कर खड़े होना इबादत है, लेकिन इसी तरह अपने उस्ताद, पीर, माँ बाप के सामने खड़ा होना सिर्फ ताज़ीम है इबादत नहीं। और दोनों में फर्क वही है जो अभी बयां किया गया।

आयत “इयया काना-बुदू” से मालूम होने अहम् बातें 

इस आयत में एक से ज़ायेद लोगों का ज़िक्र है जैसे, हम तेरी ही इबादत करते हैं।  इससे मालूम होता है की नमाज़ हमें जमात के साथ ऐडा करनी चाहिए।

दूसरों को भी इबादत करने में शरीक करने का फायदा ये है कि गुनाहगारों की इबादतें अल्लाह ताला की बारगाह के महबूब और मकबूल बन्दों की इबादतों के साथ जमा होकर क़ुबूलियत का दर्जा पा लेती है। 

साथ में ये भी मालूम होता है कि अल्लाह ताला की बारगाह में हाजत अर्ज़ करने से पहले अपनी बंदगी का इज़हार करना चाहिए।

इमाम अब्दुलाह बिन अहमद निसफिया रहमतुल्लाह ताला अलैहे फरमाते है“इबादत को मदद तलब करने से पहले ज़िक्र किया गया क्योंकि हाजत तलब करने से पहले अल्लाह ताला की बारगाह में वसीला क़ुबूलियत के ज्यादा करीब है।” 

अल्लाह ताला की बारगाह में वसीला पेश करने की बरकत 

हर मुस्लमान को चाहिए की वो अल्लाह ताला की बारगाह में किसी का वसीला पेश करके अपनी हाजात के लिए दुआ करें।  ताकि उस  वसीले के  सदके दुआ जल्द मक़बूल हो जाये। 

अल्लाह की बारगाह में वसीला पेश करना क़ुरान व हदीस से साबित है।  चुनांचे वसीले के बारे में अल्लाह ताला इरशाद फरमाता है 

surah mayedah verse 35

तर्जुमा कंज़ुल इरफ़ान – ऐ ईमान वालों ! अल्लाह से डरो और उसकी तरफ वसीला ढूंढो। 

“सुन्नने इब्ने माजा” में है कि एक नबीना सहाबी बारगाहे रिसालत सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम में हाज़िर होकर दुआ का तालिब हुआ तो आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने उन्हें इस तरह दुआ मांगने का हुक्म दिया 

ऐ अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल मैं तुझसे सवाल करता हूँ और तेरे तरफ नबीए रहमत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के साथ मुतवज्जे होता हूँ।  ऐ मुहम्मद ! सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम मैंने आप के वसीले से अपने रब्ब अज़्ज़ व जल्ल की तरफ अपनी हाजत में तवज्जे की ताकि मेरी हाजत पूरी कर दी जाये। ऐ अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल ! पश तू मेरे लिए हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की शफ़ाअत क़ुबूल फ़रमा।

(इब्ने माजा, किताबुस सलात, बाब माजा फि सलातुल  हाजत, 2/157, हदीस 1385 )

व इयया कनस्तईन- तुझ ही से मदद चाहते हैं 

इस आयत में बयां किया गया है की मदद तलब करना चाहे वास्ते साथ हो या वास्ते के बगैर, हर तरह से अल्लाह ताला के साथ खास है और अल्लाह ताला की ज़ात ही ऐसी है जिससे हक़ीक़ी तौर पर मदद तलब की जाये। 

आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान रहमतुल्लाह ताला अलैहि फरमाते हैं – हक़ीक़ी मदद तलब करने से मुराद है कि जिससे मदद तलब की जाये उसे क़ादिर, मुस्तक़िल मालिक, और गनी बेनियाज़ जाना जाये कि वह अल्लाह ताला की ज़ात के बगैर खुद अपनी ज़ात से इस काम ( यानि मदद करने ) की क़ुदरत रखता हो। 

अल्लाह ताला के अलावा किसी और के बारे में अक़ीदा रखना मुसलमान के नज़दीक शिर्क है, और कोई मुसलमान अल्लाह ताला के अलावा किसी और के बारे में ऐसा अक़ीदा नहीं रखता और अल्लाह ताला के मक़बूल बन्दों के बारे में मुसलमान ये अक़ीदा रखता है की वह अल्लाह ताला की बारगाह तक पहुँचने का वास्ता, हाजात पूरी करने का वसीला और जरिया है। 


इहदिनस सिरातिल मुस्तक़ीमा (Siratal Mustakeema) – में सीधे रस्ते पर चला (आयत नंबर 5)

अल्लाह ताला की ज़ात व सिफ़ात की मार्फ़त के बाद उसकी इबादत और हक़ीक़ी मददगार होने का ज़िक्र किया गया है। 

और अब यहाँ से एक दुआ सिखाई जा रही है बंदा यूँ अर्ज़ करे कि ऐ अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल तूने अपनी तौफीक से हमें सीधा रास्ता दिखा दिया अब हमारी इस रस्ते की तरफ हिदायत में इज़ाफ़ा फ़रमा और हमें इस पर साबित क़दम रख। 

सिराते मुस्तक़ीम का माना 

सिराते  मुस्तक़ीम से मुराद “अक़ाइद का सीधा रास्ता” है।  जिस पर तमाम अम्बियाए किराम अलैहिमो सलातो वस्सलाम चले। 

या इस से मुराद “इस्लाम का सीधा रास्ता” है जिस पर सहाबा किराम रज़ि०, बुज़ुर्गाने दीं और औलियाए एज़ाम ऱह० चले जैसा की अगली आयत में मौजूद भी है।

ये रास्ता अहले सुन्नत का है आज तक औलियाए ऱह० सिर्फ इसी मसलके अहले सुन्नत में गुज़रे हैं और अल्लाह ताला ने इन्ही के रास्ते पर चलने का और इन्ही के साथ होने का फ़रमाया है। फरमाने बरी ताला है — 

surah tauba verse 5

तर्जुमा कंज़ुल इरफ़ान – ऐ इमान वालों ! अल्लाह से डरो और सच्चों के साथ हो जाओ। 

हज़रत अनस रज़ि० से रिवायत है, सय्यदुल मुर्सलीन सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया, “बेशक मेरी उम्मत कभी गुमराही पर जमा नहीं होगी, और जब तुम (लोगों में) इख़्तेलाफ़ देखो तो तुम पर लाज़िम है कि  तुम सुवादे आज़म ( यानि मुसलमानों के बड़े गिरोह) के  साथ हो जाओ।

(इब्ने माजा, किताबुल फ़ित्ना, बाब अस्वदुल आज़म, 4/327, हदीस, 3950 )

हज़रत अब्दुल्लाह  बिन उमर रज़ि० से रिवायत है, नबीए  अकरम सल्लल्लाहो ताला अलैहे वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया, ” बनी इसराइल 72 फ़िरक़ों में तक़सीम हो गए थे और मेरी उम्मत 73 फ़िरक़ों में तक़सीम हो जाएगी। उनमे से एक के अलावा सब जहन्नम में जायेंगे। सहाबए किराम रज़ि० ने अर्ज़ की, या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम निजात पाने वाला फ़िरक़ा कौन सा है? आप सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया जिस पर मैं और मेरे सहाबा हैं।”

(तिर्मिज़ी, किताबुल ईमान, बाब माजा फि इफ़तेराक़)

हिदायत हासिल करने के ज़रिये 

याद रहे कि  अल्लाह ताला ने हिदायत हासिल करने के बहुत से ज़रिये अत फरमाए हैं, इनमे से चंद निचे दिए हैं —

  • इंसान की ज़ाहिरी व बातिनी सलाहियतें जिन्हे इस्तेमाल करके वो हिदायत हासिल कर सकता है। 
  • आसमानों, ज़मीनों में अल्लाह ताला की क़ुदरत व वहदानियत पर दलालत करने वाली निशानियाँ जिन में ग़ौरो फिक्र करके इंसान 
  • अल्लाह ताला की नाज़िल करदा किताबें, उनमे से तौरात, ज़बूर और इंजील क़ुरान पाक के नाज़िल होने से पहले लोगों के लिए हिदायत का बायेश थीं, और अब क़ुरान मजीद लोगों के लिए हिदायत हासिल करने का जरिया है। 
  • अल्लाह ताला के भेजे हुए खास बन्दे, अम्बियाए किराम और मुर्सलीने आज़म अलैहि सलातो सलाम, ये अपनी क़ौमों के लिए हिदायत हासिल करने का जरिया थे। 
  • और हमारे नबी हज़रत  मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम क़यामत तक आने वाले  तमाम  लोगों के लिए हिदायत का जरिया हैं। 

आयत ” इहदिनस सिरातील मुस्तक़ीमा ” से मालूम होने वाले एहकाम 

इस आयत से तीन बातें मालूम हुईं —

हर मुस्लमान को अल्लाह ताल से सीधे रस्ते पर साबित क़दमी की दुआ मांगनी चाहिए। सीधा रास्ता मंज़िले मक़सूद तक पहुंचा देता है। और टेढ़ा रास्ता मंज़िल तक नहीं पहुंचाता।  अल्लाह ताला इरशाद फरमाता है कि अक़्ल वाले इस तरह सुआ मांगते हैं 

surah ale imran erse 8

तर्जुमा कंज़ुल इरफ़ान – ऐ हमारे रब्ब ! तूने हमें हिदायत अता फ़रमाई है।  इस के बाद हमारे दिलों को टेढ़ा न कर और हमें अपने पास से रहमत अता फ़रमा।  बेशक तू बड़ा अता फरमाने वाला है। 

हज़रत  अनस रज़ि० फरमाते हैं, हुज़ूर पुरनूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम कसरत से ये दुआ फरमाया करते थे, ” या मुक़ल्लिबाल क़ुलूब सब्बित क़ल्बी अला दीनिका” (ऐ दिलों को फेरने वाले ! मेरे दिल को अपने दीं पर साबित क़दम रख) तो मैंने अर्ज़ किया, या रसूल अल्लाह ! सल्लललाओ ताला अलैहि वसल्लम, हम आप पर और जो कुछ आप लाये हैं उस पर इमान रखते हैं तो क्या क्या आपको हमारे बारे में कोई खौफ है?

हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया , हाँ ! बेशक दिल अल्लाह ताला की (शान के लायक इस की ) अँगुलियों में से दो अँगुलियाँ के दरमियान हैं वो जैसे चाहता है उन्हें फेर देता है। –(तिर्मिज़ी, किताबुल क़दर बाब माजा इन्नल क़ुलूब )

  • इबादत करने के बाद बन्दों को दुआ में मशगूल होना चाहिए 
  • सिर्फ अपने लिए दुआ नहीं करनी चाहिए बाकि सब मुसलमानो के लिए दुआ मांगनी चाहिए की इस तरह दुआ जायदा क़ुबूल होती है। 

सिरातल लज़ीना अन्-अमता अलैहिम – उन लोगो का रास्ता जिन पर तूने एहसान किया (आयत नंबर 6)

सिरातल लज़ीना अन्-अमता अलैहिम (उन लोगो का रास्ता जिन पर तूने एहसान किया)- ये जुमला इस से पहली आयत की तफ़्सीर है की सिराते मुस्तक़ीम से मुराद उन लोगों का रास्ता है जिन पर अल्लाह ताला ने एहसान व इनाम फ़रमाया। 

और जिन लोगो पर अल्लाह ने अपना फज़ल और एहसान फ़रमाया है उनके बारे में इरशाद फरमाता है —

surah nisa verse 69

तर्जुमा कंज़ुल इरफ़ान – और जो अल्लाह और रसूल की इताअत करे तो वह उन लोगो के साथ होंगे जिन पर अल्लाह ने फ़ज़ल किया यानि अम्बियाए किराम और सिद्दिक़ीन और शुहदा और सालिहीन और ये कितने अच्छे साथी हैं। 

आयत “सिरातल लज़ीना अन्-अमता अलैहिम ” से मालूम होने वाले मसाइल

इस आयत से दो बातें मालूम हुईं–

  • जिन उमूर पर बुज़ुर्गाने दीं का अमल रहा है वो सिरते मुस्तक़ीम में दाखिल है 
  • इमाम फखरुद्दीन राज़ी ऱह० फरमाते हैं, बाज़ मुफ़स्सेरीन ने फ़रमाया कि “इहदिनस सिरातिल मुस्तक़ीमा” के बाद “सिरातल लज़ीना अन्-अमता अलैहिम” को ज़िक्र करना इस बात की दलील देता है कि मुरीद हिदायत  और  मुकाशफ़ा के मुकाबले तक इसी सूरत पहुँच सकता है जब वह किसी ऐसे पीर की पैरवी करे जो दुरुस्त रस्ते की तरफ उस की रहनुमाई करे।  

ग़ैर-इल-मग्दूबी अलैहिम वलद दाललीन – न कि उनका रास्ता जिन पर ग़ज़ब हुआ और न बहके हुओं का 

जिन पर अल्लाह ताला का ग़ज़ब हुआ इससे मुराद बद अमल लोग और जो बहके हुए हैं इनसे मुराद है बद अक़ीदा लोग। 

हर मुसलमान को चाहिए कि  वो अक़ाएद, आमाल, सीरत, सूरत हर ऐतबार से तमाम कुफ़्फ़ार से अलग रहे। न उनके तौर तरीक़े अपनाये अनुर न इनके रस्मो रिवाज और न ही फैशन इख़्तियार करे। 

इनकी दोस्तियों और सोहबतों से दूर रहते हुए अपने आप को क़ुरान और सुन्नत के सांचे में ढलने में ही अपने लिए दोनों जहाँ की स-आदत तसव्वुर करे।  

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