Surah Al Baqraha – जानिए क्यों नाज़िल हुई ये 286 आयतों कि सूरत?

Surah Al Baqraha कुरान शरीफ की सबसे बड़ी सूरह है। इस सूरह मे अल्लाह ताला ने इंसानियत के लिए तमाम तरह की हिदायात बख़्शी है।

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अस्सलाम अलैकुम व रहमत उल्लाह ! मेरे प्यारे इस्लामी भाइयों क़ुरान शरीफ की तफ़्सीर का सिलसिला ज़ारी रखते हुए, आज हम क़ुरान शरीफ की दूसरी और सबसे बड़ी सूरह की तफ़्सीरात का सिलसिला शुरू करते हैं।

तो तफ़्सीर शुरू करने से पहले सूरह अल बक़्रह के बारे में कुछ ख़ास बातें जान लेते हैं। जैसे की ये सूरह कहाँ नाज़िल हुई थी, इसमें कितनी आयतें हैं। अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने इस सूरह को क्यों नाज़िल फ़रमाया।

रुकू और आयतों की तादाद 

जैसा हम सभी जानते हैं, सूरह अल बक़्रह (Surah Al Baqraha) कुरान शरीफ की दूसरी सूरह है और सबसे बड़ी भी है। इस सूरह में कुल मिलाकर 40 रुकू और 286 आयतें हैं।

मक़ामे नुजूल 

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ीo के फरमान के मुताबिक मदीना मुनव्वरा में सबसे पहले इसी सूरह की आयतें नाज़िल हुईं।

(खाजिन तफ़सीर सूरह बक़र 1/19)

बक़्रह नाम रखे जाने की वजह

अरबी में गाय को “बक़्रह” कहते हैं। और इस सूरह की आठवीं और नौवीं रुकू की आयत नंबर 67 से 73 में बनी इस्राइल की एक गाय का वाक़िया बयान किया गया है। उसकी मुनासिबत से इसे सूरह “बक़्रह” कहते हैं।

Surah Al Baqraha के नाज़िल होने का मौजू 

ये क़ुरान पाक की सबसे बड़ी सूरह है। इस सूरह का मरकज़ी मज़मून ये है कि इसमे बनी इस्राइल पर किए गए इनामों और उनके मुक़ाबले बनी इस्राइल कि नाशुक्री, बनी इस्राइल के जुर्म जैसे बछड़े कि पूजा करना, सरकशी और इनाद कि वजह से मूसा अलैहि सलाम से तरह तरह के मुतालबात करना, अल्लाह ताला कि आयतों के साथ कुफ़्र करना, अंबियाय किराम को नाहक शहीद करना और अहद तोड़ना।

गाय ज़बह करने का वाक़िया और नबी करीम के जमाने के मौजूद यहूदियों के बातिल अकाईद और नज़रियात और उनकी खबाशतों को बयान किया गया है। और मुसलमान को यहूदियों कि धोखा देने वाली आदत से आगाह किया गया है।

इसके अलावा Surah Al Baqraha में नीचे दिये गए मजमून बयान किए गए हैं।

  • कुरान पाक कि सदाकत, हक्कानियत और इस किताब के हर तरह के शक व शुबा से पाक होने को बयान किया गया है। 
  • क़ुरान पाक से हक़ीक़ी हिदायत हासिल करने वालों और उन्के औसाफ बयान, अज़्लि काफिरों के ईमान से महरूम रहने और मुनाफ़िक़ों कि बुरी खसलतों का ज़िक्र किया गया है।
  • क़ुरान पाक में शक करने वाले कुफ़्फ़ार से क़ुरान मजीद कि सूरत जैसी कोई एक सूरत बना कर लाने का मुतालबा किया गया। और उनके इस चीज़ से आजिज़ होने को भी बयान कर दिया गया।
  • हज़रत आदम अलैहि सलाम की तख्लीक का वाकिया बयान किया गया और फरिश्तों के सामने उनकी शान को ज़ाहिर किया गया।
  • खाने काबा की तामीर और हज़रत इब्राहिम अलैहि सलाम की दुआ का ज़िक्र किया गया है।
  • इस सूरह में नबी करीम सल्लाल्लाहो अलैहि वसल्लम की पसंद की वजह से क़िबला की तबदीली और इस तबदीली की वजह से होने वाले एतराजो व जवाबों का बयान है।
  • इबादत और मामलात जैसे नमाज़ कायम करने ज़कात अदा करने, रमज़ान के रोज़े रखने, खाने काबा का हज करने, अल्लाह ताला की रह में जिहाद करने, दीनी मामलात में चाँद के महीनो पर भरोसा करने, अल्लाह ताला की राह में माल खर्च करने। वालिदैन और रिशतेदारों के साथ सलूक करने, यतीमों के मामलात करने, निकाह, तलाक़, रज़ा-अंत।
  • इद्दत, बीवियो के साथ एला करने, जादू, क़त्ल, लोगों का माल नाहक खाने, शराब, सूद, जुआ, और हैइज़ की हालत में बीवी के साथ सोहबत करने वगैरा के बारे में मुसलमानों को एक शरई दस्तूर फ़राहिम किया गया है।
  • ताबूते शकीना, तालूत और जालूत में होने वाली जंग का बयान है।
  • मुर्दों को ज़िंदा करने के सबूत पर हज़रत उजैर अलैहि सलाम की वफ़ात का वाक़िया ज़िक्र किया गया है।
  • हज़रत इब्राहिम अलैहि सलाम को चार परिंदो के जरिये मुर्दों को ज़िंदा करने पर अल्लाह ताला की कुदरत का नज़ारा करवाने का वाक़िया बयान किया गया है।
  • इस सूरह के आखिर में अल्लाह ताला की बारगाह में रुजू, गुनाहों से तौबा करने और कुफ़्फ़ार के खिलाफ मदद तलब करने की तरफ मुसलमानो को तवज्जो दिलाई गयी है और मुसलमानो को क़यामत के दिन डराया गया है

सूरह फातिहा के साथ मुनासिबत

सूरह बक़्रह (Surah Al Baqraha) की अपने मा कबल सूरह फातिहा के साथ मुनासिबत ये है कि सूरह फातिहा में मुसलमानो को ये दुआ मांगने कि तालिम दी गयी थी

“इहदिनस सिरातल मुस्तक़ीम”

                  तर्जुमा: यानि ए अल्लाह हमको सीधा रास्ता चला 

Surah Al Baqraha में कामिल ईमान वालों के औसाफ, मुश्रिकीन और मुनाफीकीन कि निशानियाँ, यहूदियो और इसाइयों का तर्ज़े अमल। मा-आशरती ज़िंदगी के उसूल और एहकाम ज़िक्र करके मुसलमानो के लिए “सिराते मुस्तक़ीम” बनाया गया।

Surah Al Baqraha के फ़ज़ाईल 

हदीस में इस सूरह के बेशुमार फ़ज़ाईल बयान किए गए हैं। इनमे से 5 फ़ज़ाईल नीचे पेश है …

फ़ज़ाइल नम्बर 1

हज़रत अबू उमामा बाहली रज़ीo से रिवायत है, नबी करीम सल्लाल्लाहो ताला अलइह वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया, “कुरान पाक की तिलावत किया करो क्यूंकि वो क़यामत के दिन अपने पढ़ने वालों की शफ़ा-अंत करेगा। और दो रोशन सूरतें “सूरह बक़्रह (Surah Al Baqraha) और “सूरह आले इमरान” पढ़ा करो। क्योंकि ये दोनों क़यामत के दिन इस तरह आएँगी जिस तरह दो बादल हों या दो साएबान हों या उड़ते हुए परिंदों की कतारें हों। ये दोनों सूरतें अपने पढ़ने वालों की शफ़ा-अत करेंगी। सूरह बक़रः पढ़ा करो क्यूंकि इसको पढ़ते रहने में बरकत है और और न पढ़ने में हसरत है। जादूगर इसका मुकाबला करने की ताक़त नहीं रखते। 

(मुस्लिम, किताबुल मुसाफेरीन व किसराहा, बाब फज़्ले किरातुल कुरान व सूरतुल बक़र, हदीस 252(804))

फ़ज़ाइल नम्बर 2

हज़रत अबू हुरैरा रज़ीo से रिवायत है, हुज़ूर पुरनूर सल्लाल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया, “ अपने घरों को कब्रिस्तान न बनाओ। और शैतान उस घर से भागता है जिस घर में सूरह बक़र (Surah Al Baqraha) की तिलावत की जाती है। 

(मुस्लिम, किताब सलातुल मुसाफेरिन व किसराहा, बाब इस्तहबाब सलातुल नाफिला, हदीस 212(780))

फ़ज़ाइल नम्बर 3

हज़रत अबू मसूद रज़ीo से रिवायत है, सरकारे दो आलम सल्लाल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया, “ जो शख़्स रात को सूरह बक़र (Surah Al Baqraha) की आखिरी दो आयतें पढ़ लेगा वो उसे काफी होंगी। (बुख़ारी, किताबे फजाईलिल क़ुरान, बाब फज़्ले बक़र 3/405, हदीस, 5009)

(बुख़ारी, किताबे फजाईलिल क़ुरान, बाब फज़्ले बक़र 3/405, हदीस, 5009)

फ़ज़ाइल नम्बर 4

हज़रत अबू हुरैरा रज़ीo से रिवायत है, हुजूरे अक़्दस सल्लाल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया, “हर चीज़ की एक बुलंदी है। और क़ुरान की बुलंदी सूरह बक़र (Surah Al Baqraha)है। इसमे एक आयत है जो क़ुरान की तमाम आयतों की सरदार है और वो आयतुल कुर्सी है। 

(तिरमिज़ी, किताब फजाईलिल क़ुरान, बाब माजा फ़ी फज़्ले सूरतुल बक़र, हदीस, 2887)

फ़ज़ाइल नम्बर 5

हज़रत साद सादी रज़ीo से रिवायत है, हुज़ूरे अनवर सल्लाल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया, “ जिसने दिन के वक़्त अपने घर में “सूरह बक़र” की तिलावत की तो तीन दिन तक शैतान उसके घर के करीब नहीं आयेगा।जिसने रात के वक़्त अपने घर में सूरह बक़र (Surah Al Baqraha) की तिलावत की तो तीन रातें उस घर में शैतान दाखिल न होगा। 

(साबुल ईमान, हदीस, 2378)

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