3 किस्में इन्सानों की जो कुरान ने बयान की। आप किस किस्म के हो?

इंसान जिसे अल्लाह सुबहानहु व ताला ने अशरफुल मख़लूक बनाया है। उसे अक़ल दी जिससे वो सोच सके समझ सके। इसी अक़ल की वजह से इंसान अपनी अकाईद चुनता है और ये फैसले करता है कि वो किस की जिंदगी जीएगा।

अक़ीदा, ये किस चिड़िया का नाम है?

अजी, अक़ीदा, इसे आप भरोसा कह सकते है, विश्वास कह सकते हैं या फिर ईमान और नियत कह सकते हैं।

अकीदे के एतबार से अगर हम इन्सानो की बात करें तो कितनी किस्में इन्सानों की हैं?

अकीदे के एतबार से 3 किस्में इन्सानों की हैं। जिसे अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने कुरान के शुरुआती आयतों में ही बयान कर दी हैं।

आज हम उनही 3 किस्में इन्सानों की ज़िक्र करेंगे और जानेंगे की क्या क्या निशानियाँ है उन इन्सानों की?

  1. मोमिन
  2. काफ़िर
  3. मुनाफ़िक

3 किस्में इन्सानों की

आगे उनकी निशानिया जानने से पहले और ये जानने से पहले कि कुरान उनके बारे में क्या कहता है हम ये जानेंगे कि ये तीन किस्में असल में होती क्या हैं?

मोमिन

मोमिन वो इंसान होता है जो अल्लाह पर पक्का ईमान लाये और उसके ईमान में किसी तरह का खोट न हो और न ही कोई शक और शुब हो।

काफ़िर

काफ़िर वो इंसान होता है जो किसी भी कीमत पर अल्लाह पर ईमान न लाये।

मुनाफिक

मुनाफिक वो होता जो दिखावा तो ईमान वाला होने का करता है मगर वो ईमान वाला न होकर एक काफिर होता है। इंसान कि ये क़िस्म सबसे खतरनाक होती है। क्योंकि इन इन्सानों में आप ये अंदाज़ा नहीं लगा पाएंगे कि वो ईमान वाला और भरोसे के लायक है या नहीं।


अगर हम सूरह बक़र कि शुरू कि 20 आयतों का ज़िक्र करें तो इन आयतों में अल्लाह रब्बुल इज्ज़त इन्सानो कि इन तीनों किडमों का ज़िक्र किया है। ये बीस आयतें कुछ इस प्रकार बाती हुईं हैं।

आयात नुमबर 3 से 5 तक मोमिन के औसाफ बयान किए गए हैं और फिर आयात 6 और 7 में काफिरों का ज़िक्र किया है उसके बाद आयात 8 से लेकर 20 तक मुनाफिकों का ज़िक्र है।

तो चलिये एक एक करके हम अपने मुद्दे कि बात करते हैं।

मोमिन कि निशानियाँ और खूबियाँ  

कुरान में बहुत से ऐसे मकमात हैं जहां अल्लाह रबबूल इज्ज़त नें इंसानों के औसाफ़ों का ज़िक्र किया है मगर हम यहाँ सिर्फ सूरह बकर के हवाले से बात करेंगे।

सूरह बक़र की पहली आयात हरफ़े मुक्कत-अत है जो की है अलिफ लाम मीम। बाद दूसरी आयत में अल्लाह रब्बुल इज्ज़त फरमाताहै ज़ालिकल किताबो ला रईबा फ़ीहि, हुदल्लिल मुत्तकीन। जिसका तर्जुमा है, ये बुलंद रुतबा किताब जिसमें कोई शक जी जगह नहीं, हिदायत है डर वालों को।

मोमिन कि पहचान

इन दो आयतों के बाद अल्लाह रब्बुल इज्ज़त तीसरी आयत में फरमाता है,

वल्लज़ीना यूमीनूना बिल गईबि , वयूकीमूनस सलात व मिम्मा रजकनाहुम युन्फ़िकून ।

सूरह अल बक़र आयत 3

तर्जुमा – वो लोग जो बेगैर देखे ईमान लाते है और नमाज़ कायम करते हैं और हमारे दिये हुए रिज्क में से कुछ हमारी रह में खर्च करते हैं।

जैसा इस आयत के पहले हिस्से से साफ ज़ाहिर है की कोई भी वो इंसान जो बिना देखे ईमान लाये यानि वो उन तमाम चीजों पर ईमान लाते हैं जो उनकी निगाहों से पोशीदा है और नबी करीम सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने उन के बारे में खबर दी है।

जैसे मरने के बाद दोबारा ज़िंदा किया जाना, क़यामत का कायम होना, आमाल का हिसाब होना और जन्नत व जहन्नम वगैरा।

एक मत ये भी है कि यहाँ गैब से मुराद है क़ल्ब यानि दिल। इस हालत में इस आयत के माना होते है कि “वो दिल से ईमान लाते हैं”।

इस आयत के दूसरे हिस्से में नमाज़ कायम करने और सदका करने का ज़िक्र है। मतलब वो इंसान जो नमाज़ कायम करे और सदका करे वो मोमिनोन में शुमार होता है।

मगर एक बात यहाँ ध्यान देने वाली है कि दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हैं जो नमाज़ तो पढ़ते हैं और सदका भी करते है मगर सिर्फ दिखावे के लिए। ऐसे लोग मोमिन में शुमार नहीं होते। मोमिन होने कि शर्तों में पहली शर्त अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने इसी आयत के पहले हिस्से में ही बयान कर दिया गया है कि वो दिल से ईमान लाते हैं।

सूरह बक़र कि आयत 4 में अल्लाह सुबहानहु व ताला फरमाता है,

वल्लज़ीना यूमीनूना बिमा उंज़ेला इलैका वमा उंज़ेला मिन क़ब्लिक, वबिल आखिरते हुम यूक़िनून। 

सूरह बक़र आयत 4

तर्जुमा- और वह ईमान लाते हैं उस पर जो तुम्हारी तरफ नाज़िल किया और जो तुमसे पहले नाज़िल किया गया और वह आखिरत पर यकीन रखते हैं।

इस आयत में हुज़ूर पुरनूर मुहम्मद (स०) कि तरफ इशारा करते हुए फरमाने बारी ताला है कि एक मोमिन तुम्हारी तरफ नाज़िल कि हुई चीजों पर (कुरान) ईमान लाता है और तुमसे पहले यानि पिछले नबियों पर नाज़िल किताबें और साहिफों पर ईमान लाता है।

एक मोमिन कि पहचान ये भी होती है कि वो आखिरात के दिन यानि कि कयामत के दिन पर ईमान लाता है।

सूरह बक़र कि आयत 3 और 4 में मोमिन कि पहचान का खुलासा है जबकि आयत 5 में मोमिन को मिलने वाले फ़ायदों कज़िक्र है।

मोमिन होने का क्या फाएदा मिलेगा

अल्लाह (सु०) फरमाता है

ऊलाइका अला हुदम्मिर रब्बिहिम, व ऊलाइका हुमुल मुफ़लिहून

सूरह बक़र आयत 5

तर्जुमा- यही लोग अपने रब्ब की तरफ से हिदायत पर हैं और यही लोग कामयाबी हासिल करने वाले हैं।

ईसा आयत से ज़ाहिरी तौर पर अल्लाह फरमाता है कि वो लोग जिनमें आयत 3 व 4 में बताई गयी खूबियाँ हैं वो अपने रब कि तरफ से भेजी हुई हिदायत पर हैं। और वही लोग कामयाबी हासिल करेंगे।

याद रहे यहाँ पर कामयाबी से मुराद सिर्फ दुनियावी कामयाबी नहीं है बल्कि असल कामयाबी यानि कामिल कामयाबी मुराद जो इंसान को उसकी मौत के बाद मिलेगी।

तो ये थी एक मोमिन कि पहचान और उसको मिलने वाला फाइदा। ये किस्में इन्सानों की सबसे बेहतरीन है। जिनके दिल में और चेहरे पर दोनों जगह एक सी बात होती है।


काफिर कि निशानियाँ

इन्सानों कि क़िस्मों कि फेहरिस्त में दूसरी किस्म है काफिर की। ये किस्में इन्सानों की ऐसी होती हैं की इनके दिल में जो रहता है खुला रहता है। मतलब अल्लाह और उसके नबियों पर न ईमान लाते हैं और न ही झूठा दिखावा करते हैं।

आइए देखते हैं कुरान क्या कहता है इन किस्में इन्सानों की के बारे में –

अल्लाह ताला सूरह बक़र में फरमाता है।

इन्नल्लजीना कफ़रू सवाऊन अलैहिम अ अंजरतहुम अम लम तुंज़िर हुम ला यूमीनून

सूरह बक़र आयत 6

तर्जुमा – बेशक वह जिनकी किस्मत में कुफ़्र है उन्हें बराबर है चाहे तुम उन्हें डराओ या न डराओ वह ईमान लाने के नहीं।

इस आयात का खुलासा कुछ इस तरह है –

ऐ प्यारे हबीब! (सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम), वह जिनकी किस्मत में कुफ़्र है जैसे अबू जहल और अबू लहब वगैरा। इनके लिए बराबर है कि आप उन्हें अल्लाह ताला के एहकामात की मुखालफत से डराएँ या न डराएँ, ये किसी सूरत मे ईमान नहीं लाएँगे। क्योंकि इनके बारे मे अल्लाह ताला जो पहले से ही मालूम है कि ये लोग ईमान से महरूम हैं।

ये कुफ़्फ़ार ईमान से महरूम हैं इसके बावजूद इनकी तबलीग करनी चाहिए।

ईमान से महरूम कुफ़्फ़ार के बारे मे मालूम होने के बावजूद उन्हे तबलीग़ करने का हुक्म इसलिए दिया गया ताकि उन पर हुज्जत पूरी हो जाए और क़यामत के दिन उनके लिए कोई आज़ार बाकी न रहे।

अल्लाह ताला इरशाद फरमाता है –

“रुसूलम मुबास्शैरीना व मुंजेरीना लिअल्ला यकूना लिन्नासि अलल ल्लाही हुज्जतुम बादर रुसुल, व कानललाहो अज़ीज़न हकीमा।”

सूरह अन निसा आयत १६५

तर्जुमा कंजुल इरफ़ान – रसूल खुशखबरी देते और दर सुनाते के रसूलों के बाद अल्लाह के यहाँ लोगों को कोई अज़र न रहे और अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है।

और इरशाद फरमाया

“व लौ अन्न अहलक्नाहुम बेअजाबिम मिन कब्लिही लकालू रब्बना लौ ल अरसलता रसूलन फनत्तबे-अ आयातेका मिन कब्ली अन्न नाज़िल्ल व नखारा।”

सूरह ताहा आयत 134

तर्जुमा कंजूल इरफ़ान – और अगर हम उन्हे रसूल के आने से पहले किसी अज़ाब से हलाक कर देते तो ज़रूर कहते: ऐ हमारे रब! तूने हमारी तरफ कोई रसूल क्यों न भेजा कि हम ज़लील व रुसवा होने से पहले तेरी आयतों कि पैरवी करते।

काफिरों के ईमान से महरूम रहने की वजह और उनके नुकसान

खतमल्लाहो अला कुलूबेहिम व अला सम-एहिम, व अला अब्सारेहिम गीसावतुन्व, वलहुम अज़ाबुन अज़ीम

Surah Al Baqr Verse 7

तर्जुमा कंजूल इरफान – अल्लाह ने इनके दिलों पर और उनके कानों पर मुहर लगा दी है और इनके आंखो पर पर्दा पड़ा हुआ है और इनके लिए बहुत बड़ा अज़ाब है।

यहाँ ये बात याद रखनी चाहिए कि जो काफिर ईमान से महरूम रहे उनपर हिदायत की राहें शुरू से बंद न थीं। वरना वो इस बात का भी बहाना बना सकते थे।

बल्कि असल ये है कि उनके कुफ़्र व इनाद, सरकशी व बे दीनी, हक़ कि मुखालफत, और अंबियाय किराम से मुखालफत और अंबियाय किराम से अदावत के अंजाम के तौर पर इनके दिलों और इनके कानों पर मुहर लगी और आँखों पर पर्दा पद गए।

ये ऐसे है जैसे कोई शख्स डॉक्टर कि मुखालफत करे और जानलेवा ज़हर खा ले और उसके लिए दवा फायदेमंद ना रहे। और डॉक्टर ये कह दे कि अब ये तंदरुस्त नहीं हो सकता।

तो हक़ीक़त में उस आदमी को इस हाल तक पहुँचाने में इस आदमी के अपनी करतूतों का हाथ है। ना कि डॉक्टर के कहना का लहज़ा।

वह खुद ही मलामत का मुस्तहक है डॉक्टर पर ऐतराज नहीं कर सकता।

ये किस्में इन्सानों की जन्नत में दाखिल नहीं होगी जब तक कि वो तौबा न करले और पूरे दिल से ईमान न ले आए जैसे कि बाकी सभी मोमिन ईमान लाते हैं।


यहाँ से आगे अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने वो किस्में इन्सानों की बयान की है जो जबर्दस्त बहाने बाज़ और गुमराही वाले थे। वो किस्में इन्सानों की हैं मुनाफ़िक़ों की जिनहोने अपने ईमान वाले होने का दिखावा किया हालांकि वो ईमान वाले नहीं थे।

मुनाफ़िक़ों की निशानियाँ

अल्लाह सुबहानहु व ताला ने मुनाफ़िक़ों की कई निशानियाँ कुरान में दी हैं मगर कुछ अहम निशानियाँ जो अल्लाह ताला ने सूरह बक़र की शुरुआती आयतों में बतायीं हैं वो पेशे नज़र है।

  • ईमान वाला होने का झूठा दावा करते हैं मगर ईमान का कोई काम नहीं करते।
  • हमेशा धोखा और फरेब देने की फिराक मे रहते हैं।
  • उनके दिलों में बीमारी होती है जो उन्हें ईमान पर आने से रोकती है।
  • फसाद करने वाले होते हैं।
  • अहमक़ होते हैं।
  • शैतानों के साथी होते हैं।
  • गुमराह और भटके हुए हैं।

सूरह बक़र की आयत नम्बर 9 से 20 तक अल्लाह ताला ने इन्ही किस्में इन्सानों की बयान की गयी हैं। तो आइये इन 12 आयतों का तर्जुमा पढ़ते हैं।

(9) वह अल्लाह को और ईमान वालों को धोखा देना चाहते हैं, परन्तु केवल वह अपने आप को धोखा दे रहें हैं और उन्हें इसका बोध नहीं है।

(10) उनके दिलों में रोग है तो अल्लाह ने उनके रोग को बढ़ा दिया और उनके लिए कष्टप्रद यातना है, इस कारण कि वह झूठ बोलते थे।

(11) और जब उनसे कहा जाता है कि धरती पर फ़साद (बिगाड़) न करो तो वह उत्तर देते हैं कि हम तो सुधार करने वाले हैं।

(12) सावधान! वास्तव में यही लोग बिगाड़ पैदा करने वाले हैं, परन्तु वह । समझ नहीं रखते।

(13) और जब उनसे कहा जाता है कि तुम भी उसी प्रकार ईमान लाओ (निष्ठावान __ बन जाओ) जिस प्रकार और लोग ईमान लाये हैं तो _वह कहते हैं क्या हम उस प्रकार ईमान लायें जिस प्रकार मूर्ख लोग ईमान लाये हैं। सावधान! मूर्ख स्वय यही लोग हैं, परन्तु वह नहीं जानते।

(14) और जब वह ईमान वालों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हम ईमान लाये हैं, और जब वह अपने शैतानों की बैठक में पहुँचते हैं तो वह कहते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं, हम तो उनसे मात्र उपहास (हंसी) करते हैं।

(15) अल्लाह उनके साथ उपहास कर रहा है और वह उनको उनके विद्रोह में ढील दे रहा है, वह भटकते फिर रहे हैं।

(16) यह वे लोग हैं जिन्होंने सन्मार्ग के बदले पथभष्टता (गुमराही) खरीदी, तो उनका व्यापार लाभप्रद न हुआ और वह सन्मार्ग प्राप्त करने वाले न हए।

(17) उनका उदाहरण ऐसा है जैसे एक व्यक्ति ने आग जलाई, जब आग ने उसके आस-पास को प्रकाशित कर दिया तो अल्लाह ने उनकी आँख की रोशनी छीन ली, और उनको अँधेरे में छोड़ दिया कि उनको कुछ दिखाई नहीं देता।

(18) वे बहरे हैं, गूंगे हैं, अंधे हैं, अब ये (सन्मार्ग की ओर) पलटने वाले नहीं।

(19) अथवा उनका उदाहरण ऐसा है जैसे आसमान से वर्षा हो रही हो, उसमें अँधेरा भी हो औ गरज-चमक भी, वह कड़क से डर कर मौत से बचने के लिए अपनी ऊँगलियाँ अपने कानों में डाल रहे हों, जबकि अल्लाह अवज्ञाकारियों को अपने घेरे में लिये हुए है।

(20) निकट है कि बिजली उनकी दृष्टि को उचक ले, जब भी उन पर बिजली चमकती है, वह उसमें चल पड़ते हैं और जब उन पर अँधेरा छा जात है तो वह रुक जाते हैं, और यदि अल्लाह चाहे तो उनके कान और उनकी आँखों को छीन ले, वास्तविकता यह है कि अल्लाह हर चीज़ की सामर्थ रखता है।

ध्यान रहे कि मुनाफिकत भी 2 तरह की होती है-

  1. अमल में मुनाफ़िक़त- ये तब होती है जब कोई इंसान अल्लाह और उसके रसूलों और ईमान के दूसरे ज़रूरी अहकामात पर तो ईमान लाता है मगर उन्हें अमल में नहीं रखता या अमल करता भी है तो दूसरों के दिखावे के लिए करता है।
  2. ईमान में मुनाफिकत – जब कोई इंसान अमल और ईमान दोनों मसलों से दिल से ईमान नहीं रखता बल्कि सिर्फ दिखावा करता है।

उम्मीद करता हूँ आपको ये 3 किस्में इन्सानों की अच्छी तरह से समझ आ गयी होंगी। एक बार आप भी अपना जेहन टटोलिए और पता कीजिये कि आप किस क़िस्म में शुमार होते हो।

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