कुरआन अल्लाह की किताब (6236 आयतों का बेहतरीन संकलन)

कुरआन अल्लाह की किताब है। वह अपनी मूल अरबी भाषा में पूर्णतः सुरक्षित है। ऐसी एक किताब का अनुवाद कभी मूल किताब का विकल्प नहीं बन सकता। कुरआन के अनुवाद का उद्देश्य उसको बोधगम्य बनाना है, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि जो व्यक्ति अरबी भाषा न जानता हो, वह कुरआन को समझ नहीं सकता।

कुरआन अल्लाह की किताब, अरबी भाषा न जानने वाले के लिए भी एक बोधगम्य किताब है। कुरआन प्रत्यक्षतः अरबी भाषा में है, परन्तु वास्तविकता यह है कि वह प्रकृति की भाषा में है, अर्थात वह भाषा जिसमें अल्लाह ने रचना के समय समस्त मनुष्यों से प्रत्यक्ष सम्बोधन किया था।

यह सम्बोधन प्रत्येक महिला और पुरुष के अन्दर सहज रुप मैं सदैव उपस्थित रहता है। इसलिए कुरआन अल्लाह की किताब प्रत्येक मनुष्य के लिए एक बोधगम्य किताब है, किसी के लिए चेतन रूप से और किसी के लिए अचेतन रूप से।

इस वास्तविकता का कुरआन में इन शब्दों में उल्लेख है:

“यह खुली हुई आयतें है उन लोगों के सीनों में जिनको ज्ञान प्रदान हुआ है।”

(49:49)

इसका अर्थ यह है कि कुरआन जिस आसमानी वास्तविकता को चेतना की भाषा में बता रहा है, वह सहज भाषा में पहले से मनुष्य के अन्दर विद्यमान है। कुरआन का सन्देश मनुष्य के लिए कोई अजनबी सन्देश नहीं, वह उसी ज्ञान की एक शाब्दिक अभिव्यक्ति है जिससे मनुष्य प्रकृति के स्तर पर पहले से परिचित है।

    कुरआन सभी इंसान को पहले से ही सुनाई जा चुकी है।

    कुरआन अल्लाह की किताब में बताया गया है कि जो मनुष्य बाद के युग में पैदा हो रहे हैं, वह सब प्रारम्भिक रूप से आदम की रचना के समय ही पैदा कर दिये गये थे। उस समय अल्लाह ने उन मानव आत्माओं से प्रत्यक्ष सम्बोधन किया। इस मामले का कुरआन में इस तरह वरणन है।

    “और जब तेरे पालनहार ने आदम की सन्तान की पीठों से उनकी सन्तान को निकाला और उनको साक्षी ठहराया था स्वयं उनके ऊपर, “क्या मैं तुम्हारा पालनहार नहीं हूँ” उन्होंने कहा हाँ, हम स्वीकार करते हैं यह इसलिए हुआ कि कहीं तुम कियामत के दिन कहने लगो कि हमको तो इस बात की खबर ही न थी”।

    (7:172)

    अल्लाह और बन्दे के बीच एक और वार्ता का उल्लेख कुरआन में इस प्रकार आया हैः

    “हमने अमानत (ऐच्छिक कर्म) को आसमानों और धरती और पहाड़ों के समक्ष प्रस्तुत किया तो उन्होंने उसको उठाने से मना किया और वह इससे डर गये और मनुष्य ने इसको अर्थात अमानत को उठा लिया। निस्सन्देह, वह अत्याचारी और अज्ञानी था।”

    (33:72)

    इन दोनों आयतों से पता चलता है कि रचना के प्रारम्भ में अल्लाह ने सभी मनुष्यों को प्रत्यक्ष रूप से सम्बोधित किया था। इस सम्बोधन में जो बात कही गयी थी, वह समस्त मनुष्यों के अवचेतन में सुरक्षित कर दी गयी।

    कुरआन इंसान के अवचेतन मन में फीड है।

    मानो अल्लाह की जिस वाणी को मनुष्य, कुरआन के रूप में पढ़ रहा है, इससे पहले प्रत्यक्ष अल्लाह के सम्बोधन के अन्तर्गत वह उस वाणी को सुन चुका है और समझ चुका है। कुरआन अल्लाह की किताब, मनुष्य के लिए एक जानी हुई बात को जानना है, न कि किसी अनजानी बात को अचानक सुनना। वास्तविकता यह है कि कुरआन इन्सान की चेतना का उजागर होना (unfolding) है।

    इस बात को सामने रखा जाये तो यह जानना कठिन नहीं कि कुरआन को समझने के लिए कुरआन का अनुवाद भी एक पर्याप्त साधन की हैसियत रखता है। जिस व्यक्ति की प्रकृति जीवित हो, जिसने अपने आप को बाद की कंडीशनिंग (conditioning) से बचाया हो, वह जब कुरआन का अनुवाद पढ़ेगा तो उसके मन के वह खाने खुल जायेंगे जहाँ संरचना के समय किया गया अल्लाह का सम्बोधन पहले से सुरक्षित है।

    अलस्तु विरब्धिकुम” (क्या मैं तुम्हारा पालनहार नहीं है) की प्रतीज्ञा यदि यह अल्लाह का पहला सम्बोधन है तो कुरआन अल्लाह का दूसरा सम्बोधन है। दोनों एक दूसरे के लिए पुष्टि की हैसियत रखते हैं। कोई व्यक्ति यदि अरबी भाषा न जानता हो, अथवा कम जानता हो और वह मात्र कुरआन का अनुवाद पढ़ने की स्थिति में हो तो उसको कुरआन बोध के सम्बन्ध में निराशा का शिकार नहीं होना चाहिए।

     कुरआन अल्लाह की किताब की यह मानव धारणा वर्तमान युग में एक वैज्ञानिक तथ्य बन चुकी है। वर्तमान युग में जेनेटिक (आनुवशिंक) कोड का विज्ञान और एन्थ्रोपोलोजी (मानव विज्ञान) का अध्ययन, दोनों कुरआन के इस दृष्टिकोण की पूर्णतः पुष्टि करते हैं। कुरआन अल्लाह की किताब है, जो इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल0) को प्रदान की गयी।

    कुरआन अल्लाह की किताब का नुजूल

    कुरआन अल्लाह की किताब एक संकलन के रूप में नहीं उतरा है, बल्कि वह 23 वर्ष की अवधि में भिन्न भिन्न अंशों के रूप में उतारा गया। इस्लाम के पैग़म्बर मक्का में थे, जबकि 610 ई० में कुरआन का पहला भाग उतरा। उसके बाद निरन्तर उसके विभिन्न भाग आप पर उतरते रहे। कुरआन का अन्तिम भाग आप पर 632 ई0 में उतरा, जबकि आप मदीने में थे।

    कुरआन का यह अवतरण फ़रिश्ता जिब्रील के माध्यम से होता था। अन्त में स्वयं फ़रिश्ता जिब्रील के निर्देशा अनुसार, कुरआन के विभिन्न अंशों को एक ग्रन्थ के रूप में संकलित किया गया।

    कुरआन में कुल 114 सूरतें हैं, कुछ बड़ी सूरतें हैं और कुछ छोटी सूरत। आयतों की संख्या कुल 6236 है। तिलावत (वाचन) की सुविधा के लिए कुरआन को तीस भाग और सात मंजिल के रुप में बाँटा गया है।

    कुरआन अल्लाह की किताब सातवीं शताब्दी की प्रथम चैथाई में उतरा। उस समय कागज़ अस्तित्व में आ चुका था। यह कागज़ कुछ विशेष वृक्षों के रेशे से लेकर हस्त उद्योग के रूप में बनाया जाता था। उसको पपायरस (Papyrus) कहा जाता है।

    कुरआन का कोई अंश जब भी उतरता तो उसको उस कागज पर लिख लिया जाता था, जिसको अरबी भाषा में ‘किरतास’ कहा जाता है। इसी के साथ लोग कुरआन को अपनी स्मृति में सुरिक्षत कर लेते थे, क्योंकि उस समय कुरआन ही एक मात्र इस्लामी साहित्य था।

    कुरआन अल्लाह की किताब को नमाजों में पढ़ा जाता था और इस्लाम की ओर आमन्त्रित करने के लिए उसको लोगों के समक्ष प-सजयकर सुनाया जाता था। इस प्रकार कुरआन एक ही साथ लिखा भी जाता रहा और इसी के साथ उसको कण्ठस्थ भी किया जाता रहा।

      कुरआन का संकलन

      इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल0) के अन्तिम जीवन काल तक कुरआन अल्लाह की किताब को सुरक्षित करने का यही तरीका प्रचलित रहा। आपकी मृत्यु 632 ई0 में हुई, इसके बाद अबू बक़्र सिद्दीक (रजि0) इस्लाम के पहले ख़लीफ़ा बने।

      उन्होंने नियमित रूप से अपनी देख रेख में कुरआन की एक जिल्द चढ़ाई हुई संकलित प्रति बनाई। यह प्रति प्राचीन काल के कागज़ अथवा किरतास पर बनायी गयी थी। कुरआन की इस प्रति की जिल्द का साइज़ चैकोर था, अतः उसको रबआ (वर्ग) कहा जाता था।

      इस प्रकार कुरआन, पहले ख़लीफ़ा के युग में एक जिल्द चढ़ी हई किताब के रुप में सुरक्षित हो गया। तीसरे खलीफा उस्मान बिन अफ्फान के युग में इस जिल्द वाले कुरआन की अतिरिक्त प्रतियाँ तैयार की गयी और उनको विभिन्न नगरों में भेज दिया गया। यह प्रतियाँ नगर की जामा मस्जिदों में उपलब्ध रहती थीं। लोग उनको पढ़ते भी थे और उनसे अतिरिक्त प्रतियों को तैयार करते थे।

      कुरआन अल्लाह की किताब के लिखने का यह अनुक्रम 19वीं शताब्दी तक जारी रहा। 19वीं शताब्दी में प्रिटिंग प्रेस का अविष्कार हुआ और साथ ही कागज़ भी आधुनिक औद्योगिक ढंग से अधिक मात्रा में तैयार किया जाने लगा। इस प्रकार 19वीं शताब्दी में नियमित रूप से प्रिंटिंग प्रेस के द्वारा छपाई का काम आरम्भ हो गया।

      छपाई की विधियों में निरन्तर विकास होता रहा। इसी के साथ कुरआन अल्लाह की किताब की मुद्रित प्रतियाँ भी अधिक उत्कृष्ट रूप में तैयार होने लगीं।

      अब कुरआन की मुद्रित प्रतियाँ इतनी सामान्य हो गयी हैं कि वह प्रत्येक घर में और प्रत्येक मस्जिद में और प्रत्येक पुस्तकालय में और प्रत्येक बाजार में इस प्रकार प्रचुर संख्या में उपलब्ध हैं। जिससे कि प्रत्येक मनुष्य विभिन्न भाषा में कुरआन अल्लाह की किताब की छपी हुए सुन्दर प्रतियाँ प्राप्त कर सकता है, चाहे वह पृथ्वी के किसी भी भाग में हो।

      अल्लाह की सृष्टि निर्माण योजना

      प्रत्येक किताब का एक विषय (subject) होता है। कुरआन का विषय यह है कि अल्लाह की सृष्टि निर्माण योजना (Creation Plan of God) से मनुष्य को अवगत कराया जाये,

      अर्थात मनुष्य को यह बताया जाये कि अल्लाह ने यह संसार किस लिए बनाया है?

      मनुष्य को धरती पर बसाने का उद्देश्य क्या है?

      मृत्यु से पहले के जीवन काल में मनुष्य से क्या वांछित है, और मृत्यु के बाद के जीवनकाल में मनुष्य के साथ क्या घटित होने वाला है? मनुष्य एक अमर रचना है। उसकी जीवन यात्रा मृत्यु के बाद भी जारी रहती है।

      कुरआन अल्लाह की किताब इस सम्पूर्ण जीवन यात्रा के लिए एक मार्गदर्शक किताब की हैसियत रखता है। मनुष्य को इस वास्तविकता से अवगत करना, यही कुरआन का उद्देश्य है और यही कुरआन की वार्ता का विषय है।

      अल्लाह ने मनुष्य को एक अमर रचना की हैसियत से पैदा किया। फिर उसके जीवन काल को दो भागों में बाँट दिया। उसका बहुत थोड़ा भाग मृत्यु से पहले के समय में रखा और उसका अधिक बड़ा भाग मृत्यु के बाद के जीवन काल में रख दिया।

      मृत्यु से पहले का जो काल है, वह परीक्षा काल है और मृत्यु के बाद का जो काल है वह परीक्षाफल के अनुसार, अच्छा या बुरा परिणाम पाने का काल। कुरआन, जीवन की इसी वास्तविकता के लिए एक परिचयात्मक पुस्तक की हैसियत रखता है।

      कुरआन अल्लाह की किताब एक दृष्टि से उपकार करने वाले की ओर से नियामत का अनुस्मरण है। अल्लाह ने मनुष्य को विशेष गुणों के साथ पैदा किया। फिर उसको पृथ्वी जैसे ग्रह पर बसाया, जहाँ मनुष्य के लिए प्रत्येक किस्म का लाईफ सपोर्ट सिस्टम (Life Support System) उपलब्ध है।

      कुरआन अल्लाह की किताब का उद्देश्य यह है कि मनुष्य, प्रकृति के इन नियामतों से लाभान्वित होते हुए उपकार करने वाले को याद रखे। वह नियामतों के रचयिता पर आस्था रखे।

      नियामतों का उपभोग करते हुए उपकारक को मानना और उसके तगादों को पूरा करना, यही सदैव रहने वाली जन्नत का सर्टिफिकेट (certificate) है। और नियामतों का उपभोग करते हुए उपकारक को भूल जाना, मनुष्य को नरक (जहन्नम) का भागी बना देता है। कुरआन अल्लाह की किताब वास्तव में इसी सबसे बड़ी वास्तविकता का अनुस्मरण

      आप कुरआन अल्लाह की किताब को पढ़ें तो आप उसमें बार बार इस तरह के वर्णन पायँगे कि यह अल्लाह की उतारी हुई वाणी (Word of God) है। प्रत्यक्ष रूप से यह एक साधारण सी बात है, परन्तु जब इसको तुलनात्मक रूप से देखा जाये तो पता चलेगा कि यह अत्यन्त असाधारण बात है।

      संसार में बहुत सी किताबें हैं जिनके सम्बन्ध में लोगों का विश्वास है कि वह आसमानी किताब है। परन्तु कुरआन के अतिरिक्त किसी भी पवित्र धर्म ग्रन्थ में आपको यह लिखा हुआ नहीं मिलेगा कि यह अल्लाह की वाणी है।

      इस तरह का वर्णन विशेष रूप से मात्र कुरआन में पाया जाता है। कुरआन में इस तरह वर्णन का होना, उसके पाठक को एक प्रारम्भ बिन्दु (Starting Point) देता है। वह कुरआन अल्लाह की किताब का अध्ययन एक विशेष प्रकार की पुस्तक के रूप में करता है, न कि साधारण मानवीय पुस्तक के रूप में।

      कुरआन की लेखन शैली

      कुरआन की शैली भी एक अनोखी शैली है। साधारण मानवकृत पुस्तकों का तरीका यह है कि उसमें चीज़े एक लेखन क्रम के साथ लिखी होती हैं। उसमें A से Z तक क्रमबद्ध रूप से चीज़ों का वर्णन किया जाता है।

      परन्तु कुरआन अल्लाह की किताब में इस प्रकार की शैली मौजूद नहीं। साधारण मनुष्य को प्रत्यक्षतः करआन एक अक्रमबद्ध वाणी प्रतीत होती है, परन्तु वास्तविकता के अनुसार देखा जाये तो वह एक अत्यन्त व्यवस्थित और क्रमबद्ध वाणी दिखायी देगा।

      कुरआन अल्लाह की किताब की वाक् शैली के सम्बन्ध में यह कहना उपयुक्त होगा कि उसकी शैली एक राजसी शैली है। कुरआन को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे उसका लेखक एक ऐसे उच्चतम स्थान पर है जहाँ से वह सम्पूर्ण मानवता को देख रहा है।

      सम्पूर्ण मानवता उसका कन्सर्न (concern) है, वह अपनी महानता के स्थान से सम्पूर्ण मानवता को सम्बोधित कर रहा है। यद्यपि, इस सम्बोधन के बीच वह कभी एक समूह की ओर मुड़ जाता है और कभी दूसरे समूह की ओर।

      कुरआन अल्लाह की किताब का एक विशेष पहलू यह है कि उसका पाठक किसी भी क्षण उसके लेखक से कन्सल्ट (consult) कर सकता है। कुरआन का लेखक अल्लाह है। वह एक जीवन्त हस्ती है।

      वह सम्पूर्ण मानवता को घेरे हुए है। वह किसी मध्यस्थ के बिना भी आदमी की बात को सुनता है और उसका उत्तर देता है। इसलिए कुरआन के पाठक के लिए प्रतिक्षण यह संभव है कि वह अल्लाह से सम्पर्क स्थापित कर सके। वह अल्लाह से पूछे और अल्लाह से अपने प्रश्नों का उत्तर पा ले।

      जो लोग मात्र मीडिया के माध्यम से कुरआन अल्लाह की किताब को जानते हैं. वह सामान्य रूप से समझते हैं कि कुरआन जिहाद की किताब है और जिहाद उनके दृष्टिकोण के अनुसार, हिंसा के माध्यम से अपने उद्देश्य को प्राप्त करने का।

      परन्तु यह मात्र ग़लतफ़हमी (भ्रम) है। जो व्यक्ति भी कुरआन को प्रत्यक्ष रूप से पढ़े, उसके लिए यह समझना मुश्किल नहीं होगा कि कुरआन अल्लाह की किताब का हिंसा से कोई सम्बन्ध नहीं। कुरआन पूर्ण रूप से शान्ति की पुस्तक है, वह हिंसा की पुस्तक नहीं।

      जिहाद क्या है?

      यह एक वास्तविकता है कि कुरआन की शिक्षाओं में एक शिक्षा वह है जिसको जिहाद कहा जाता है। परन्तु जिहाद शान्तिपूर्ण प्रयास का नाम है, न कि किसी तरह की हिंसात्मक कारवाई का।

      कुरआन में बताई गई जिहाद की धारणा कुरआन की इस आयत से ज्ञात होती है।

      “और इसके (कुरआन) माध्यम से तुम उनके साथ बड़ा जिहाद करो।” (25:52)

      (25:52)

      कुरआन की इस आयत में, कुरआन के माध्यम से जिहाद करने की शिक्षा दी गयी है। स्पष्ट है कि कुरआन कोई हथियार नहीं, कुरआन एक वैचारिक पुस्तक है।

      कुरआन अल्लाह की किताब अल्लाह की आडियोलोजी (विचारधारा) का परिचय है। इससे कुरआन अल्लाह की किताब में बताई गई जिहाद की धारणा स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।

      कुरआन अल्लाह की किताब के अनुसार,

      जिहाद वास्तव में शान्तिपूर्ण वैचारिक संघर्ष (peaceful ideological struggle) का नाम है। इस वैचारिक संघर्ष का लक्ष्य कुरआन में यह बताया गया है कि कुरआन का शान्तिपूर्ण संदेश लोगों के दिलों में उतर जाये।

      (4:63)

      इस आयत के अनुसार, कुरआन अल्लाह की किताब का वांछित कथन वह है जो बोधगम्य कथन हो, अर्थात ऐसी वाणी जो लोगों के मन को सम्बोधित करे, जो लोगों को सन्तुष्ट करने वाली हो, जिसके माध्यम से लोगों को कुरआन की सच्चाई पर विश्वास पैदा हो, जिसके माध्यम से लोगों के अन्दर वैचारिक क्रान्ति उत्पन्न हो जाये।

      यह कुरआन का मिशन है। और इस प्रकार का वैचारिक मिशन मात्र तर्कों के माध्यम से पूरा किया जा सकता है। हिंसा अथवा किसी भी सशस्त्र कारवाई के माध्यम से इस लक्ष्य को पाना संभव नहीं।

      यह सही है कि कुरआन में कुछ ऐसी आयतें हैं जो युद्ध की अनुमति देती है, परन्तु यह आयतें मात्र युद्ध स्थिति के लिए हैं. वह मात्र आक्रमण के समय बचाव के अर्थ में हैं।

      रक्षात्मक युद्ध के अतिरिक्त, कोई युद्ध इस्लाम में वैध नहीं। यह रक्षात्मक युद्ध भी मात्र एक स्थापित राज्य (established state) कर सकता है। राज्य के अतिरिक्त किसी भी व्यक्ति, अथवा संगठन को जिहाद छेड़ने की अनुमति नहीं।

      कुरआन कोई कानूनी किताब नहीं

      कुरआन अल्लाह की किताब को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण बात यह है कि कुरआन कोई कानूनी किताब नहीं है, कुरआन एक दावती (आवाहक) किताब है। कुरआन की वाक् शैली क़ानूनी नहीं है, बल्कि आवाहक है।

      कानून की भाषा निर्धारण करने वाली भाषा होती है। कानूनी लेख मैं चीजें शाब्दिक रूप से वांछित होती है, जबकि आवाहक लेखन का मामला ऐसा नहीं। आवाहक लेख में उसके अर्थ पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

      आवाहक किताब में शब्दों की हैसियत मात्र एक माध्यम की हो जाती है, जबकि कानूनी किताब में शब्द स्वयं अपने आप में वांछित बन जाते हैं।

      इसका एक पहलू यह है कि दावती लेख में विशेष बल देकर उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए तीव्रता की शैली को अपनाया जाता है। आवाहक लेख में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है जो प्रत्यक्षतः अत्यन्त कठोर प्रतीत होते हैं, परन्तु आवाहक वाणी में यह कठोरता विवेक पर आधारित होती है।

      ऐसी किसी वाणी में कठोरता को देखकर उसको कानूनी कठोरता के अर्थ में लेना, पूर्णतः नासमझी की बात होगी। इसी तत्वदर्शिता का यह परिणाम है कि आवाहक भाषा में अधिकतर ऐसा होता है कि उसमें एक ऐसी बात कही जाती है जो कानूनी शैली के अनुसार अत्यन्त कठोर प्रतीत होती है।

      परन्तु आवाहक शैली के अनुसार वह मात्र झिंझोड्ने के लिए होती है, वह मात्र इसलिए होती है कि मनुष्य की प्रकृति को जगाया जाये, उसके अन्दर छिपे हुए भावों को गतिमान किया जाये। एक उदाहरण से इसका स्पष्टीकरण होता है।

      जंगे बद्र का वाकिया

      पैराम्बर मुहम्मद (सल्ल0) के जीवन काल में बद्र (2 हिजरी) का युद्ध हुआ। यह युद्ध आक्रमण के समय आपने बचाव के लिए लड़ा था। इस युद्ध में आपको विजय प्राप्त हुई। युद्ध के बाद आपने विरोधियों के 70 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया।

      इसके बाद यह लोग युद्ध बंदी की हैसियत से मदीना लाये गये। इस घटना पर कुरआन में यह आयत अवतरित हुई:

      “किसी पैगंबर के लिए उपयुक्त नहीं कि उसके पास कैदी हो, जब तक वह धरती में अच्छी तरह रक्तपात न कर ले।”

      (8:67)

      इस आयत के शब्दों को यदि कानूनी अर्थ में लिया जाये तो इसका अर्थ यह होगा कि यद्ध बंदियों की आवश्यक रूप से हत्या की जानी चाहिए। जैसा कि ज्ञात है, यह युद्ध बंदी कुरआन के अवतरण के समय पूर्णतः मुहम्मद (सल्ल0) के नियंत्रण में थे।

      ऐसी स्थिति में यह आयत यदि कानून की भाषा में होती तो उसमें इस तरह के शब्द होने चाहिए थे कि जिन 70 व्यक्तियों को तुम युद्ध के मैदान से गिरफ्तार करके मदीना लाये हो, वह सब के सब अपने अपराध के कारण गर्दन उड़ा देने योग्य हैं, इसलिए तुरन्त इनकी हत्या करके इन्हें समाप्त कर दो।

      परन्तु न कुरआन अल्लाह की किताब मैं ऐसी आयत उतरी और न रसूल (सल्ल0) ने इस आयत को कानूनी आयत समझकर उस पर शाब्दिक रूप से अमल किया।

      यह घटना स्पष्ट रूप से बताती है कि यह आयत अपने प्रकट अथों के अनुसार वांछित न थी, बल्कि वह अपनी वास्तविकता के अनुसार वांछित थी, यह भाषा की कठोरता का मामला था जो इसलिए था कि युद्ध बंदियों के अन्दर अपने सुधार की भावना उत्पन्न हो।

      दूसरे शब्दों में यह कि कुरआन की उपर्युक्त आयत में जो बात थी, वह कोई कानुनी आदेश न था बल्कि वह मात्र हेमरिंग की भाषा (language of hammering) थी। इस आयत का अर्थ अपराधियों का सुधार था, न कि अपराधियों की हत्या। अतः उन कैदियों में से अधिकतर लोग बाद में इस्लाम में प्रविष्ट हो गये। उदाहरण के रूप में सुहेल बिन अम आदि।

        करने लायक काम

        जो लोग कुरआन अल्लाह की किताब के माध्यम से सच्चाई की खोज करें, उनको कुरआन काम करने का दो सूत्रीय कार्यक्रम देता है।

        अपने जीवन में अल्लाह के मार्गदर्शन का पूर्ण रूप से आज्ञापालन, और दूसरे मनुष्यों को इस आसमानी मार्गदर्शन से अवगत कराना।

        हिदायात पर अमल

        आसमानी मार्गदर्शन के आज्ञापालन का प्रारम्भ, बोध अथवा आसमानी वास्तविकता की खोज से होता है।

        एक व्यक्ति जब कुरआन अल्लाह की किताब के माध्यम से सच्चाई की खोज करता है तो उसके अन्दर एक मानसिक क्रान्ति पैदा होती है। उसकी सोच बदल जाती है। उसके चाहने और न चाहने के मानक बदल जाते हैं। उसका जीवन अन्दर से बाहर तक एक नये दिव्य नक्शे में ढल जाता है।

        अल्लाह के बोध की यह अभिव्यक्ति जिन रूपों में होती है, उसको जिक्र (गुणगान) और इबादत (उपासना) और उत्तम व्यवहार और ईश परायण जीवन जैसे शब्दों में प्रस्तुत किया गया है।

        सच्चाई की खोज कोई मेकेनिकल खोज नहीं है। सच्चाई की खोज जीवन की सच्चाई की खोज है, और जिस व्यक्ति को जीवन की वास्तविकता का बोध हो जाये, वह स्वयं अपनी प्रकृति के बल पर एक नया मनुष्य बन जाता है।

        कुरआन अल्लाह की किताब के माध्यम से जो लोग सच्चाई की खोज करें, उनके व्यवहारिक कार्यक्रम का दूसरा भाग वह है जिसको कुरआन में अल्लाह की ओर आवाहन कहा गया है, अर्थात आसमानी सच्चाई से दूसरों को अवगत करना।

        दूसरों को हिदायत से रूबरू कराना

        यह आवाहन प्रक्रिया एक अत्यन्त गम्भीर प्रक्रिया है। यह पूर्ण डेडीकेशन (dedication) चाहता है। इसी पहलू से इसको जिहाद भी कहा गया है।

        कुरआन अल्लाह की किताब के अनुसार, जिहाद पूर्ण रूप से एक अराजनैतिक (non political) प्रक्रिया है। आवाहक जिहाद का लक्ष्य मनुष्य के दिल को और उसके मन को बदलना है।

        और दिल व मन में परिवर्तन मात्र शान्तिपूर्ण प्रचार के माध्यम से होता है, न कि किसी तरह के बलात् अथवा हिंसात्मक कार्य के माध्यम से।

        अर्थात वह मनुष्य जो इस संसार में खुदा वाला मनुष्य बने, जो पालनहार की और एकाय रहकर जीवन व्यतीत करे। पालनहार का पसन्दीदा मनुष्य बनने की इसी प्रक्रिया को कुरआन में तज़्कियः (शुद्धिकरण) (2:129) कहा गया है।

        कुरआन अल्लाह की किताब के अनुसार,

        जन्नत उन्हीं व्यक्तियों के लिए है जो इस संसार में अपना शुद्धिकरण करें, जो मुज़क्का (शुद्ध) मनुष्य बनकर अगले जीवन में प्रवेश हो।

        (ताहाः 76)

        तज़्कियः का अर्थ है: शुद्धिकरण (purification), अर्थात अपने व्यक्तित्व को अवांछित चीज़ों से बचाना। व्यक्तित्व को पवित्र करने की यह प्रक्रिया एक सतत् प्रक्रिया है, वह कभी समाप्त नहीं होती।

        कुरआन के मानने वाले (आस्थावान) के अन्दर यह प्रक्रिया उसके जीवन के अन्तिम क्षण तक जारी रहती है।

        अल्लाह सबको एक सा बनाता है

        मूल यह है कि प्रत्येक मनुष्य अपने जन्म के अनुसार, वास्तविक प्रकृति पर पैदा होता है। जन्म के अनुसार, प्रत्येक मनुष्य मिस्टर नेचर (Mr. Nature) होता है।

        परन्तु जीवन में प्रतिदिन ऐसे अनुभव सामने आते हैं जो उसके प्राकृतिक व्यक्तित्व पर नकारात्मक धब्बे डालते रहते हैं, क्रोध और वेष और ईष्या और लालच और भेदभाव और घमण्ड और अस्वीकारोक्ति और बदले की भावना, यह सब वही नकारात्मक धब्बे हैं, जो मनुष्य के प्राकृतिक व्यक्तित्व को दूषित करते रहते हैं।

        ऐसी स्थिति में प्रत्येक स्त्री और पुरुष को यह करना है कि वह आत्मनिरीक्षण (introspection) के माध्यम से अपना शुद्धिकरण करता रहे, वह अपने मन में पाये जाने वाले दूषित व्यक्तित्व को प्राकृतिक व्यक्तित्व बनाता रहे।

        प्रत्येक व्यक्ति का वातावरण उसको एक कंडीशन (conditioned) मनुष्य बना देता है। अब प्रत्येक व्यक्ति को यह करना है वह डीकंडीशनिंग (de-conditioning) के माध्यम से अपने आप को पुनः मिस्टर नेचर बनाये। इसी मिस्टर नेचर का कुरआनी नाम दिव्य व्यक्तित्व अथवा अल्लाह का पसन्दीदा इन्सान है।

        इस आर्टिक्ल को जनाब वहीदुद्दीन ख़ान की हिन्दी तर्जुमा कुरआन से लिया है।

        या अल्लाह, इस आर्टिक्ल को लिखने में अगर कोई गलती या भूल हुई उसके लिए मुझे माफ फ़रमा। और इस आर्टिक्ल को पढ़ने वाले को कुरआन की तिलावत करने की लत लगा। आमीन

        इसे ज़रूर पढ़ें – 3 किस्में इन्सानों की जो कुरान ने बयान की। आप किस किस्म के हो?

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