जंगे खंदक का एक ईमान अफ़रोज वाक्या

अस्सलाम अलैकुम व रहमत उल्लाह! दौरे नबूवत में बहुत से जंगे हुईं और उन सभी जंगों की अपनी-अपनी अहमियत है। हर उन जंगों मे जिसमे नबीए पाक खुद शरीक थे सबमे हमे उनकी अक्लमंदी देखने को मिली।

ऐसी ही एक जंग थी जंगे खंदक। ये ऐसी जंग है जिसमे खूंरेजी तो ज्यादा नहीं हुई मगर किसी क़िले को महफूज रखने का बहुत ही अच्छा नज़ारा देखने को मिला। इस जंग में कुफ़्फ़ारे मक्का अकेले नहीं थे बल्कि दूसरे कबीले के लोग भी शामिल थे जिनकी कुल तादाद 10000 थी। 10000 काफिरों के मुक़ाबले मुसलमानों की तादाद सिर्फ 3000 की थी।

दुश्मन तादाद मे बहुत ज़्यादा थे ऐसे मे क्या करना ज्यादा अच्छा रहेगा। ऐसे हालत मे सलमान फारसी वही मौजूद थे और उन्होने सलाह दी की शहर के चारों तरफ एक खंदक खोद दी जाए जैसा फारसी बादशाह किया करते हैं। ये सलाह नबीए पाक को काफी पसंद आयी और उन्होने खंदक खोदे जाने का हुक्म दिया।

इस तरह खंदक खोदी गयी और दुश्मनों को रोक के रखा गया। इसी दरमियान बहुत सारे वाकियात हुए उनमे से एक वाकिया है जिसे बहुत ही कम लोग जानते हैं। आज हम उसी वाकिए का ज़िक्र करेंगे।

तो क्या था वो वाकिया?

वाकिया ये था कि कुफ़्फ़ारों मे एक बहुत ही बड़ा और भयानक आदमी निकल कर आया और उसने सारे अहले इस्लाम को जंग के लिए ललकारा।

आखिरकार क्या हुआ था उसकी ललकार का? क्या किसी ने उसको जवाब दिया था या नहीं? और जवाब क्या था जानने के लिए आखिर तक पढ़ें।

क्या हुआ जब अहले इस्लाम को मिली जंग की ललकार?

तो, जैसा मैंने बताया, ये वाकिया जंगे खंदक का है। जब शहर के चारो तरफ खंदक खोद दी गयी तो दुश्मन शहर के अंदर दाखिल नहीं हो सकते थे और मुसलमान शहर के बाहर नहीं जा रहे थे। इसी खंदक के वजह से ही इस जंग को जंगे खंदक कहते हैं।

ऐसे मे दुश्मन बहुत परेशान हो गए तो उन्होने एक टोली खंदक के तरफ भेजी। खंदक मे एक जगह ऐसी थी जहां उसकी चौड़ाई कम थी जिसे घोड़े पर बैठकर आसानी से पार किया जा सकता था। कुफ़्फ़ारों की टोली उसी जगह पर गयी।

दुश्मनों की इस टोली मे 7 जंगजू थे जिनमे इकरीमा बिन अबु जहल, खालिद बिन वलीद और पाँच और साथी। इन पाँच साथियों मे एक था अम्र बिन अब्दु वुद।

अम्र बिन अब्दु वुद पूरे अरब का सबसे जाँबाज जंगजू माना जाता था। वो बहुत कवी और बड़ा था और बहुत ही ज़ोरावर था। कहते हैं उसकी ऊंचाई इतनी थी की वो ज़मीन पर खड़ा हो फिर भी किसी सबसे ऊंची कद के घोड़े पर बैठे आदमी से भी ऊँचा। जब वो घोड़े पर सवर होता था तो ऐसा लगता था जैसे किसी ने घोड़े पर कोई पहाड़ लाद दिया हो।

खैर, इकरीमा की टोली के 7 जवान उस जगह पर पहुंचे जहां खंदक की चौड़ाई कम थी। उन्होने घोड़े को एड़ लगाई और घोडा कूद कर दूसरे तरफ जा पहुंचा। इस तरह वो लोग मुस्लिम खेमे मे पहुँच गए। मुस्लिम खेमा ये देखकर हैरान रहा उन्हे लगा ये कैसे हो गया? मगर थोड़ी ही देर मे वो जवाब देने को तयार हो गये।

जंगे उहुद से जुड़ी 10 अहम जानकारी यहाँ पढ़ें – जंगे उहुद

अम्र बिन अब्दु वुद की ललकार

मुस्लिम खेमे मे पहुँच कर उस ज़ोरावर अम्र बिन अब्दु वुद ने सदा लगाई और चिल्लाया,

” मैं अम्र बिन अब्दु वुद हूँ, मैं पूरे अरब का सबसे ताक़तवर जंगजु हु। मुझे जंग मे कोई नहीं हरा सकता। क्या तुम्हारे खेमे मे है ऐसा कोई जंगजू जो मुझसे जंग करना चाहता हो, मैं उसे ललकारता हूँ? आए मेरे सामने जंग करने को।”

मुस्लिम खेमे मे किसी तरह की कोई हलचल नहीं हुई। उन्होने इसकी ललकार सुनी पर कोई जवाब नहीं दिया। उन्होने एक दूसरे के तरफ देखा और पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम की तरफ उनकी इजाज़त पाने की गरज से देखा।

कहा जाता है अम्र ने कभी दो लोगों की जंग मे शिकस्त नहीं पायी, यहाँ तक की आज तक उसका कोई मुखालिफ जिंदा नहीं बचा।

ये भी कहा जाता है की अम्र अकेला 500 घुड़सवारों के बराबर था और वो एक घोड़े को अपनी ऊंचाई से भी ऊपर उठाकर पटक सकता था। खैर कहानिया बहुत बन जाती हैं हम अपने मुद्दे पर आते है।

मुस्लिम अभी भी खामोश थे। उनकी खामोशी देखकर अम्र ठट्ठे मार कर हंसने लगा। उसकी हंसी देखकर कुरैश के लोग भी हंसने लगे।

“तो कोई नहीं है तुम लोगों मे जिसमे मेरा मुकाबला करने की हिम्मत हो? तुम्हारे इस्लाम के बारे मे क्या ख्याल है? और तुम्हारे पैगंबर की क्या हाल है?” इतना सुनना था की हज़रत अली को गुस्से आया और वो खड़े हो गए मगर मुहम्मद सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने उन्हे रोक लिया।

हंसी ठहाके और ललकार की एक और फुहार छूटी कुरैश के खेमे से। फिर अली उठ खड़े हुए और मुहम्मद सल्लल्लाहो ताला अलैहि वासल्लम से इजाज़त तलब की मगर उन्होने मना कर दिया।

हज़रत अली को ज़ुल्फिकार की नवाज़िश

अम्र ने एक बार फिर से ललकारा और बे इज़्ज़ती की और कहा ” कहाँ है तुम्हारी जन्नत? जहां तुम कहते हो की जंग मे मरने वाला जाएगा? क्या तुम किसी को भी नहीं भेजोगे मुझसे मुकाबला करने को?”

इस बार हज़रत अली से बर्दाश्त नहीं हुआ और वो फिर से उठ खड़े हुए। इस बार वो गुस्से से भरे हुए थे। मुहम्मद सल्लल्लाहो ताला अलैहि वासल्लम ने उनकी तरफ प्यार से देखा और अपना अमामा उतारकर उन्हे पहना दिया। अपनी तलवार निकाली और हज़रत अली की कमर मे बांध दी।

जो तलवार मुहम्मद सल्लल्लाहो ताला अलैहि वासल्लम ने हज़रत अली को दी वो एक काफिर की तलवार थी जिसका नाम था मुनब्बा बिन हजाज। इसे जंगे बद्र मे क़तल किया गया था और ये तलवार जंग समानों मे मिली जिसे मुहम्मद सल्लल्लाहो ताला अलैहि वासल्लम ने अपने लिए रख लिया। अब ये अली के हाथ मे थी और इस्लाम की तारीख की सबसे मशहूर तलवार बनी जिसे हम ज़ुल्फिकार के नाम से जानते हैं।

अम्र बिन अब्दु वुद और हज़रत अली के बीच मुकाबला

हज़रत अली कुछ मुस्लिम जवानो को लेकर उन काफिरों के पास पहुंचे। अम्र अली को अच्छे से जनता था क्योंकि वो अली के वालिद अबु तालिब का अच्छा दोस्त था। अली को देखकर वो मुस्कुरा उठा। तब अली ने कहा

“ओ अम्र! ऐसा माना जाता है की अगर कुरैश से कोई तुम्हें दो तजवीज दे तो तुम्हें कम से कम एक को मानना पड़ेगा?”

“सच है” अम्र ने कहा

“तो मेरे पास तुम्हारे लिए दो तजवीज है; पहली, अल्लाह उसके रसूल और इस्लाम पर ईमान ले आओ।” अली ने कहा।

“मुझे उसकी ज़रूरत ही नहीं है” अम्र बोला।

“तो अपने घोड़े से उतरो और मुझसे मुक़ाबला करो”

इस पर अम्र ने कहा ” ऐ मेरे दोस्त के बेटे तुम्हें मरने की मेरी कोई मंशा नहीं है”

अली ने जवाब दिया, “मगर मुझे तुम्हें मारने की ख़्वाहिश है?”

अम्र गुस्से मे अपने घोड़े से उतरा और अली की तरफ अपनी तलवार लेकर बढ़ा। अली अम्र के मुक़ाबले ज्यादा फुर्तीले थे जिस वजह उन्होने अम्र के बहुत से वारों को अपने आसपास भी नहीं आने दिया और महफूज रहे।

अम्र की हार

अम्र गुस्से से भरा हुआ वार पे वार किए जा रहा था मगर अली का कुछ बिगाड़ नहीं पाया। अली हर बार उसके वार से बच जाता था। आखिर कर वो थक कर चूर चूर हो गया और हाँफने लगा। वो खुद बहुत परेशान था की ऐसा कैसे हो सकता है। आज तक कोई भी मुखालिफ उसके सामने इतनी देर तक नहीं टिक पाया था।

तभी यकायक चीजें इतनी तेजी से हुई की किसी को कुछ समझ नहीं आया न ही मुस्लिम खेमे मे और न ही कुरैश खेमे मे। अली ने अपनी फुर्ती दिखाते हुए अम्र को ज़मीन पर गिरा दिया था और खुद उसकी छाती पर बैठा हुआ था।

अली ने अम्र को एक बार फिर इस्लाम की दावत और उसे छोड़ने को कहा। मगर अम्र के लिए ये बात किसी शर्मिंदगी से कम नहीं थी कि कल तक जो पूरे अरब के सबसे ताकतवर जंगजुओं मे शुमार होता था आज एक बच्चे से हार गया। हालांकि हज़रत अली तब बच्चे नहीं थे मगर अम्र के सामने उम्र के एतबार से वो बच्चे ही थे।

अम्र को अब इस बात कि चिंता होने लगी कि लोग क्या कहेंगे अम्र बिन अब्दु वुद जो अरब का सबसे ताकतवर जंगजू था वो हार गया और उसने अपनी जान बचाने के लिए दूसरा दीन अपना लिया। इन सब खयालात को ज़ेहन मे रख कर अम्र ने इस्लाम कुबूल करने से माना कर दिया और अली के मुंह पर थूक दिया।

तब अली ने कहा,” ओ अम्र! मैं सिर्फ अल्लाह की राह मे क़तल करता हूँ अपने किसी जाती मामले के वजह से नहीं। अब जब तुमने मुझ पर थूक दिया है तो मेरा तुमको मारना जाती बदला भी समझा जा सकता है।इसलिए मैं तुम्हारी जान बख्शता हूँ। उठो और अपने लोगों के खेमे मे जाओ।” इतना कह कर अली वहाँ से हट कर अपने खेमे कि तरफ जाने लगे। तभी अम्र उठा और अली कि तरफ तलवार लेकर दौड़ पड़ा तब अली ने भी मौका नहीं चुका और उसका सर उसके धड़ से अलग कर दिया।

इस तरह हमे इस वाकिए से ये पता चलता है कि इस्लाम के मानने वाले किसी भी दुश्मन से नहीं डरते। उन्हे बस अपना ईमान दुरुस्त रखने कि ज़रूरत है।

उम्मीद करता हूँ आपको भी इस वाकिए से ईमान कि रोशनी मिले। इसे और दोस्तों, अहबाबों और अजीजों तक पहुंचाए। दुआ मे याद रखिएगा।

अस्सलाम अलैकुम !!!

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *