सूरह अल बक़र हिन्दी में ( 286 हिदायत वाली आयतें)

सूरह अल बक़र कुरान शरीफ की सबसे बड़ी सूरह है। इस सूरह मे अल्लाह ताला ने इंसानियत के लिए तमाम तरह की हिदायात बख़्शी है।

वैसे कुरआन शरीफ हो अरबी में ही पढ़ना चाहिए मगर कुछ लोग जो अरबी नहीं जानते या पढ़ लेते हैं मगर उसका तर्जुमा नहीं निकाल पाते उनके लिए पेश है सूरह अल बक़र हिन्दी में। ये तर्जुमा

मौलाना वहीदुद्दीन खान की हिन्दी में कुरान से लिया गया है।

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सूरह अल बक़र हिन्दी में

अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान है। (Bismillah Shareef)

कुरआन अल्लाह की किताब है।

(1) अलिफ़ लाम मीम।
(2) यह अल्लाह की किताब है। इसमें कोई सन्देह नहीं, मार्ग दर्शन है डर रखने वालों के लिए

मोमिन की पहचान

(3) जो विश्वास करते हैं बिन देखे और नमाज़ स्थापित करते है। और जो कुछ हमने उनको दिया है, वह उसमें से खर्च करते हैं हमारी राह में। 
(4) और जो ईमान लाते हैं उस पर जो तुम्हारे ऊपर अवतरित हुआ है (कुरआन) और जो तुमसे पूर्व अवतरित किया गया। और वह आखिरत (परलोक) पर विश्वास करते हैं।
(5) उन्हीं लोगों ने अपने पालनहार का मार्ग पाया है और वही सफलता पाने वाले हैं।

काफ़िर की पहचान

(6) जिन लोगों ने (इन बातों की) अवज्ञा की, उनके लिए समान है तुम उनको डराओ या न डराओ, वह मानने वाले नहीं हैं।
(7) अल्लाह ने उनके दिलों पर और उनके कानों पर मुहर लगा दी है, और उनकी आँखों पर पर्दा है, और उनके लिए कठोर यातना है।

मुनाफ़िक की पहचान

(8) और लोगों में कुछ ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि हम ईमान लाये (विश्वास किया) अल्लाह पर और आखिरत के दिन पर, वास्तविकता यह है कि वह ईमान वाले नहीं हैं।
(9) वह अल्लाह को और ईमान वालों को धोखा देना चाहते हैं, परन्तु केवल वह अपने आप को धोखा दे रहें हैं और उन्हें इसका बोध नहीं है।
(10) उनके दिलों में रोग है तो अल्लाह ने उनके रोग को बढ़ा दिया और उनके लिए कष्टप्रद यातना है, इस कारण कि वह झूठ बोलते थे।
(11) और जब उनसे कहा जाता है कि धरती पर फ़साद (बिगाड़) न करो तो वह उत्तर देते हैं कि हम तो सुधार करने वाले हैं।
(12) सावधान! वास्तव में यही लोग बिगाड़ पैदा करने वाले हैं, परन्तु वह । समझ नहीं रखते।
(13) और जब उनसे कहा जाता है कि तुम भी उसी प्रकार ईमान लाओ (निष्ठावान बन जाओ) जिस प्रकार और लोग ईमान लाये हैं तो वह कहते हैं क्या हम उस प्रकार ईमान लायें जिस प्रकार मूर्ख लोग ईमान लाये हैं। सावधान! मूर्ख स्वयं यही लोग हैं, परन्तु वह नहीं जानते।
(14) और जब वह ईमान वालों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हम ईमान लाये हैं, और जब वह अपने शैतानों की बैठक में पहुँचते हैं तो वह कहते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं, हम तो उनसे मात्र उपहास (हंसी) करते हैं।
(15) अल्लाह उनके साथ उपहास कर रहा है और वह उनको उनके विद्रोह में ढील दे रहा है, वह भटकते फिर रहे हैं।
(16) यह वे लोग हैं जिन्होंने सन्मार्ग के बदले पथभष्टता (गुमराही) खरीदी, तो उनका व्यापार लाभप्रद न हुआ और वह सन्मार्ग प्राप्त करने वाले न हए।
(17) उनका उदाहरण ऐसा है जैसे एक व्यक्ति ने आग जलाई, जब आग ने उसके आस-पास को प्रकाशित कर दिया तो अल्लाह ने उनकी आँख की रोशनी छीन ली, और उनको अँधेरे में छोड़ दिया कि उनको कुछ दिखाई नहीं देता।
(18) वे बहरे हैं, गूंगे हैं, अंधे हैं, अब ये (सन्मार्ग की ओर) पलटने वाले नहीं।
(19) अथवा उनका उदाहरण ऐसा है जैसे आसमान से वर्षा हो रही हो, उसमें अँधेरा भी हो औ गरज-चमक भी, वह कड़क से डर कर मौत से बचने के लिए अपनी ऊँगलियाँ अपने कानों में डाल रहे हों, जबकि अल्लाह अवज्ञाकारियों को अपने घेरे में लिये हुए है।
(20) निकट है कि बिजली उनकी दृष्टि को उचक ले, जब भी उन पर बिजली चमकती है, वह उसमें चल पड़ते हैं और जब उन पर अँधेरा छा जात है तो वह रुक जाते हैं, और यदि अल्लाह चाहे तो उनके कान और उनकी आँखों को छीन ले, वास्तविकता यह है कि अल्लाह हर चीज़ की सामर्थ रखता है।

अल्लाह की इबादत की हिदायत

(21) ऐ लोगों । अपने रब की इबादत करो जिसने तुमको पैदा किया और उन लोगों को भी जो तुमसे पहले गुज़र चुके हैं, ताकि तुम (जहन्नम की आग) से बच जाओ,
(22) वही हस्ती है, जिसने ज़मीन को तुम्हारे लिए बिछौना बनाया और आसमान को छत बनाया और उतारा आसमान से पानी, और उससे पैदा किए हर प्रकार के फल, तुम्हारी जीविका के रूप में। तो तुम किसी को अल्लाह के समकक्ष न ठहराओ, जबकि तुम जानते हो।
(23) यदि तुम उस वाणी (कुरआन) के सम्बन्ध में सन्देह में हो जो हमने अपने बन्दे (पैगम्बर मुहम्मद) के ऊपर उतारी है तो लाओ इस जैसी एक सूरः और बुला लो अपने समर्थकों को भी. अल्लाह के सिवा, यदि तुम सच्चे हो।
(24) और यदि तुम ऐसा न कर सको और कदापि न कर सकोगे तो डरो उस आग से जिसका ईधन बनेंगे इन्सान और पत्थर, वह तैयार की गई है अवज्ञाकारियों के लिए।
(25) और शुभ-सूचना दे दो उन लोगों को जो ईमान लाये और जिन्होंने अच्छे कर्म किए इस बात की कि उनके लिए ऐसे बाग होंगे जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, जब भी उनको उन बागों में से कोई फल खाने को मिलेगा तो वह कहेंगे: यह वही है जो इससे पहले हमको दिया गया था, और मिलेगा उनको एक दूसरे से मिलता-जुलता, और उनके लिए वहाँ पवित्र जोड़े होंगे, और वह उसमें सदैव रहँगे।
(26) अल्लाह इससे नहीं शर्माता कि वह मच्छर का उदाहरण बयान करे या इससे भी किसी छोटी चीज़ का, फिर जो ईमान वाले हैं वह जानते हैं कि वह सच है उनके पालनहार की ओर से, और जो इन्कार करने वाले हैं, वह कहते हैं कि इस उदाहरण को बयान करके अल्लाह ने क्या चाहा है, अल्लाह इसके माध्यम से बहुतों को भटका देता है और बहुतों का वह इसके माध्यम से मार्ग दर्शन करता है, और वह भटकाता है उन लोगों को जो अवज्ञाकारी हैं।
(27) जो अल्लाह से अपने किए हुए वचन को तोड़ देते हैं और उस चीज़ को तोड़ते हैं जिसको अल्लाह ने जोड़ने का आदेश दिया है और ज़मीन में बिगाड़ पैदा करते हैं, यही लोग हैं घाटा उठाने वाले।

आदम अलैहि सलाम की तख्लीक

(28) तुम किस प्रकार अल्लाह का इन्कार करते हो, जबकि तुम निर्जीव थे तो उसने तुमको जीवन प्रदान किया, फिर वह तुमको मृत्यु देगा, फिर जीवित करेगा, फिर तुम उसी की ओर लौटाये जाओगे।
(29) फिर वही है जिसने तुम्हारे लिए वह सब कुछ पैदा किया जो धरती पर है, फिर उसने आसमान की ओर ध्यान दिया और सात आसमान ठीक ढंग से बनाया, और वह हर चीज़ को जानने वाला है।
(30) और जब तेरे पालनहार ने फ़रिश्तों से कहा कि मैं पृथ्वी में एक ख़लीफा (उत्तराधिकारी) बनाने वाला हूँ। फ़रिश्ता ने कहा: क्या तू पृथ्वी पर ऐसे लोगों को बसाएगा जो उसमें फ़साद करें और खून बहायें। और हम तेरी प्रशंसा करते हैं और तेरी पवित्रता बयान करते हैं। अल्लाह ने कहा, मैं वह जानता हूँ जो तुम नहीं जानते,
(31) और अल्लाह ने सिखा दिये आदम को सारे नाम, फिर उनको फ़रिश्तों के समक्ष प्रस्तुत किया और कहा कि यदि तुम सच्चे हो तो मुझे इन लोगों के नाम बताओ।
(32) फ़रिश्तों ने कहा कि तू पवित्र है। हम तो वही जानते हैं जो तूने हमको बताया। निस्सन्देह, तू ही ज्ञान वाला और तत्त्वदर्शी है।
(33) अल्लाह ने कहा ऐ आदम, उनको बताओ उन लोगों के नाम। तो जब आदम ने बताये उनको उन लोगों के नाम तो अल्लाह ने कहा क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि आसमानों और पृथ्वी के भेद को मैं ही जानता हूँ। और मुझको ज्ञात है जो कुछ तुम प्रकट करते हो और जो कुछ तुम छिपाते हो।
(34) और जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सजदा करो, तो उन्होंने सज्दा किया, परन्तु इबलीस ने सजदा न किया। उसने अवज्ञा की और घमण्ड किया और अवज्ञाकारियों में से हो गया।
(35) और हमने कहा ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी दोनों जन्नत (स्वर्ग के बारा) में रहो और उसमें से खाओ इच्छाभर, जहाँ से चाहो। और उस वृक्ष के निकट मत जाना अन्यथा तुम अत्याचारियों (ज़ालिमों) में से हो जाओगे।
(36) फिर शैतान (इबलीस) ने उस वृक्ष के माध्यम से दोनों को विचलित कर दिया और उनको उस आनंदमय जीवन से निकाल दिया जिसमें वह थे। और हमने कहा तुम सब उतरो यहाँ से। तुम एक दूसरे के दुश्मन (शत्रु) होगे। और तुम्हारे लिए पृथ्वी में ठहरना और काम चलाना है एक अवधि तक।
(37) फिर आदम ने सीख लिये अपने पालनहार से कुछ बोल (शब्द) तो अल्लाह ने उस पर दया की। निस्सन्देह वह तौबा (क्षमा-याचना) को स्वीकार करने वाला, दया करने वाला है।
(38) फिर हमने कहा तुम सब यहाँ से उतरो। फिर जब आये तुम्हारे पास मेरी ओर से कोई मार्गदर्शन तो जो लोग मेरे मार्गदर्शन का अनुसरण करेंगे, उनके लिए न कोई डर होगा और न वह शोकाकुल होंगे।
(39) और जो लोग अवज्ञा करेंगे और हमारी निशानियों को झुठलायेंगे तो वही लोग नरक वाले हैं, वह उसमें सदैव रहेंगे।

बनु इस्राइल को हिदायत

(40) ऐ इस्राईल की सन्तान ! याद करो मेरे उस उपकार को, जो मैंने तुम्हारे ऊपर किया, और मेरे वचन को पूरा करो, मैं तुम्हारे वचन को पूरा करूंगा। और मेरा ही डर रखो।
(41) और ईमान लाओ उस चीज़ (कुरआन) पर जो मैंने भेजी है। पुष्टि करती हुई उस किताब की जो तुम्हारे पास है और तुम सबसे पहले इसके झुठलाने वाले न बनो। और न लो मेरी आयतों पर थोड़ा मोल। और मुझसे डरो।
(42) और सच में झूठ को न मिलाओ और सच को न छिपाओ जबकि तुम जानते हो।
(43) और नमाज़ स्थापित करो और ज़कात अदा करो और झुकने वालों के साथ झुक जाओ।
(44) तुम लोगों से भला कर्म करने को कहते हो और अपने आपको भूल जाते हो। हालाँकि तुम किताब को पढ़ते हो, क्या तुम समझते नहीं। ।
(45) सहायता चाहो धैर्य और नमाज़ से और निस्सन्देह वह भारी है परन्तु उन लोगों पर नहीं, जो मेरी तरफ झुकने वाले हैं।
(46) जो समझते हैं कि उनको अपने पालनहार से मिलना है और वह उसी की ओर लोटने वाले हैं।
(47) ऐ इस्राईल की सन्तान ! मेरे उस उपकार को याद करो जो मैंने तुम्हारे ऊपर किया और इस बात को कि मैंने तुमको संसार वालों पर प्रधानता दी।
(48) और डरो उस दिन से जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के काम न आयेगा। न उसकी ओर से कोई सिफारिश स्वीकार होगी। और न उससे बदले में कुछ लिया जायेगा और न उनकी (अपराधियों) की कोई सहायता की जायेगी।

बनु इस्राईल का फिरऔन से निजात

(49) और (याद करो) जब हमने तुमको फिरऔन के लोगों से छुटकारा दिलाया, वह तुमको बहुत कष्ट देते थे, तुम्हारे बेटों की हत्या करते और तुम्हारी बेटियों को जीवित रखते। और इसमें तुम्हारे पालनहार की ओर से भारी परीक्षा थी।
(50) और (याद करो वह समय) जब हमने नदी को फाड़कर तुम पार कराया। फिर बचाया तुमको और डुबा दिया फिरऔन के लोगों को, और तुम देखते रहे।
(51) और जब हमने बुलाया मूसा को चालीस रात के वादे पर, फिर तुमने उसकी अनुपस्थित में बछड़े को पूज्य बना लिया और तुम अत्याचारी (जालिम) थे।
(52) फिर हमने उसके बाद तुमको क्षमा कर दिया ताकि तुम आभार व्यक्त करने वाले बनो।
(53) और जब हमने मूसा को किताब दी और फैसला करने वाली वस्तु ताकि तुम मार्ग पा सको।

बनु इस्राईल का बछड़े की पुजा करना

(54) और जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि ऐ मेरी क़ौम ! तुमने बछड़े को ईश बनाकर अपने आप पर भारी अत्याचार किया है। अब अपने पैदा करने वाले की ओर अपना ध्यान करो और अपने अपराधियों की अपने हाथों से हत्या करो। यह तुम्हारे लिए तुम्हारे पैदा करने वाले के निकट उचित है। तो अल्लाह ने तुम्हारी तौबा (क्षमा याचना) स्वीकार की। निस्सन्देहः वह बड़ा तौबा स्वीकार करने वाला, अत्यन्त दयावान है।
(55) और जब तुमने कहा कि ऐ मूसा, हम तुम्हारा विश्वास नहीं करेंगे जब तक कि हम अल्लाह को साक्षात अपने सामने न देख लें, तो तुमको बिजली के कड़के ने पकड़ लिया और तुम देख रहे थे।
(56) फिर हमने तुम्हारी मृत्यु के पश्चात् तुमको उठाया ताकि तुम कृतज्ञ बनो।
(57) और हमने तुम्हारे ऊपर बादलों की छाया को और तुम पर मन्न (बटेर जैसा पक्षी) और सलवा (उपकार के रूप में एक विशेष खाद्य) उतारा। खाओ सुथरी चीज़ों में से जो हमने तुमको दी हैं और उन्होंने हमारा कुछ नहीं बिगाड़ा, बल्कि वह अपना ही नुकसान करते रहे।
(58) और जब हमने कहा कि प्रवेश करो इस नगर में और खाओ इसमें से जहाँ से चाहो, अपनी इच्छानुसार और प्रवेश करो द्वार में सिर झुकाये हए, और कहो, कि ऐ पालनहार ! हमारे पापों को दूर कर दे। हम तुम्हारे पापों को दूर कर देंगे और भलाई करने वालों को अधिक भी देंगे।
(59) तो अत्याचारियों ने बदल दिया उस बात को, जो उनसे कही गयी थी एक दूसरी बात से। इस पर हमने उन लोगों के ऊपर जिन्होंने अत्याचार कया, उनकी कृतघ्नता के कारण आकाश से प्रताड़ना उतारी।
(60) और याद करो वह समय, जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिए पानी माँगा, तो हमने कहा अपनी लाठी पत्थर पर मारो, तो उससे फूट निकले बारह स्रोत। प्रत्येक समूह ने अपना अपना घाट पहचान लिया। खाओ और पियो अल्लाह की दी हुई जीविका से और ज़मीन में बिगाड़ फैलाने वाले बनकर न फिरो।
(61) और याद करो, जब तुमने कहा, ऐ मूसा, हम एक ही प्रकार के खाने पर कदापि सन्तोष नहीं कर सकते। अपने पालनहार को हमारे लिए पुकारों कि वह निकाले हमारे लिए, जो उगता है धरती से, साग और ककड़ी और गेहूँ और मसूर और प्याज़। मूसा ने कहाः क्या तुम एक उत्तम चीज़ के बदले एक मामूली चीज़ लेना चाहते हो। किसी नगर में उतरो तो तुमको मिलेगी वह चीज़ जो तुम माँगते हो, और डाल दिया गया उनपर अपमान और निर्धनता और वह अल्लाह के क्रोध के भागी हो गये। यह इस कारण से हुआ कि वह अल्लाह की निशानियाँ को झुठलाते थे और पैगम्बरों की अकारण हत्या करते थे। यह इस कारण से कि उन्होंने अवज्ञा की और वह हद पर न रहते थे।
(62) निस्संदेह, जो लोग ईमान वाले हुए और जो लोग यहुदी हुए और नसारा (ईसाई) और साबी, उनमें से जो व्यक्ति ईमान लाया अल्लाह पर और आखिरत (परलोक) के दिन पर और उसने भले कर्म किये तो उसके लिए उसके पालनहार के पास (अच्छा) बदला है। और उनके लिए न कोई भय है और न वह दुःखी होंगे।
(63) जब हमने तुमसे तुम्हारा वचन लिया और तूर पहाड़ को तुम्हारे ऊपर उठाया। पकड़ों उस वस्तु को जो हमने तुमको दी है दृढ़ता के साथ, और जो कुछ इसमें है उसको याद रखो ताकि तुम बचो।
(64) इसके बाद तुम उससे फिर गये। यदि अल्लाह की कृपा और उसकी दया तुम पर न होती तो अवश्य तुम विनष्ट हो जाते।
(65) और उन लोगों की हालत तुम जानते हो जिन्होंने सब्त (शनिवार) के सम्बन्ध में अल्लाह के आदेशों को तोड़ा, तो हमने उनको कह दिया तुम लोग अपमानित बन्दर बन जाओ।
(66) फिर हमने इसको शिक्षा प्रद बना दिया उन लोगों के लिए जो उसके सामने थे और आने वाली पीढ़ीयों के लिये। और इसमें हमने शिक्षा रख दी डरने वालों के लिए।

गाय जबह करने का ज़िक्र

(67) जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि अल्लाह तुमको आदेश देता है कि तुम एक गाय ज़बह करो। उन्होंने कहाः क्या तुम हमसे हँसी कर रहे हो। मूसा ने कहा कि मैं अल्लाह की शरण माँगता हूँ कि में ऐसा अज्ञानी बनें
(68) उन्होंने कहा, अपने पालनहार से निवेदन करो कि वह हमसे वर्णन करे कि वह गाय कैसी हो। मूसा ने कहा, अल्लाह कहता है कि वह गाय न बूढी हो न बच्चा, इनके बीच की हो। अब कर डालो जो आदेश तुमको मिला है।
(69) फिर उन्होंने कहा, अपने पालनहार से निवेदन करो, वह बताये उसका रंग कैसा हो। मूसा ने कहा, अल्लाह कहता है कि वह गहरे पीले रंग की हो, देखने वालों को भली प्रतीत होती हो।
(70) फिर वह कहने लगे, अपने पालनहार से पूछो कि वह हमसे वर्णन करे कि वह कैसी हो। क्योंकि गाय में हमको सन्देह हो गया है। और अल्लाह ने चाहा तो हम मार्ग प्राप्त कर सकेंगे।
(71) मूसा ने कहा अल्लाह कहता है कि वह ऐसी गाय हो कि परिश्रम करने वाली न हो, भूमि को जोतने वाली और खेतों को पानी देने वाली न हो। वह सम्पूर्ण सुरक्षित हो, उसमें कोई धब्बा न हो। बोलेः अब तुम स्पष्ट बात लाये। फिर उन्होंने उसको ज़बह किया। और वह ज़बह करते दिखाई न देते थे।
(72) और जब तुमने एक व्यक्ति को मार डाला, फिर तुम एक दूसरे पर इसका आरोप लगाने लगे, जबकि अल्लाह प्रकट कर देना चाहता था जो कुछ तुम छिपाना चाहते थे।
(73) तो हमने आदेश दिया कि मारो उस मुर्दे को इस गाय का एक टुकड़ा। इसी प्रकार जीवित करता है अल्लाह मुर्दों को। और वह तुमको अपनी निशानियों दिखाता है, ताकि तुम समझो।
(74) फिर उसके बाद तुम्हारे दिल कठोर हो गये। अन्ततः वह पत्थर जैसे हो गये, अथवा उससे भी अधिक कठोर। पत्थरों में कुछ ऐसे भी होते हैं जिनसे नहर फूट निकलती है। कुछ पत्थर फट जाते हैं और उनसे पानी निकल आता है और कुछ पत्थर ऐसे भी होते हैं जो अल्लाह के डर से गिर पड़ते हैं। और अल्लाह उससे अनभिज्ञ नहीं जो तुम करते हो।

यहूदियों का मुनाफिक होने का ज़िक्र और उनका गुरूर

(75) क्या तुम यह आशा रखते हो कि ये यहूदी तुम्हारे कहने से ईमान ले आयेंगे। हालाँकि उनमें से कुछ लोग ऐसे हैं कि वह अल्लाह की वाणी सुनते थे और फिर उसको बदल डालते थे, समझने के बाद, और वह जानते हैं।
(76) जब वह ईमान वालों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हम ईमान लाये हुए हैं। और जब वह आपस में एक दूसरे से मिलते हैं तो कहते हैं: क्या तुम उनको वह बातें बताते हो जो अल्लाह ने तुम पर खोली हैं कि वह तुम्हारे विरुद्ध तम्हारे पालनहार के पास तुमसे तर्क-विर्तक करें। क्या तुम समझते नहीं।
(77) क्या वह नहीं जानते कि अल्लाह को ज्ञात है जो कुछ वह छिपाते हैं और जो कुछ वह प्रकट करते हैं।
(78) और उनमें अनपढ़ हैं जो नहीं जानते किताब को परन्तु अभिलाषाएँ। उनके पास कल्पना के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
(79) अतः विनाश है उन लोगों के लिए जो अपने हाथ से किताब लिखते हैं, फिर कहते हैं कि यह अल्लाह की ओर से है। ताकि उसके माध्यम वह से वह थोड़ी सी पूजी प्राप्त कर लें। अतः विनाश है उसके कारण, जो उनके हाथों ने लिखा। और उनके लिए विनाश है अपनी उस कमाई से।
(80) और वह कहते हैं हमको नरक (जहन्नम) की आग नहीं छूएगी सिवाय गिनती के कुछ दिन। कहो क्या तुमने अल्लाह के पास से कोई वचन ले लिया है कि अल्लाह अपने वचन के विरुद्ध नहीं करेगा। अथवा अल्लाह के ऊपर ऐसी बात कहते हो जिनका तुमको ज्ञान नहीं।  
(81) हाँ जिसने कोई बुराई की और उसके पाप ने उसको अपने घेरे में ले लिया, तो वही लोग नरक वाले हैं, वह उसमें सदैव रहेंगे।
(82) और जो लोग ईमान लाये और जिन्होंने भले कर्म किये, वह जन्नत (स्वर्ग) वाले लोग हैं, वह उसमें सदैव रहेंगे।

बनु इस्राईल का वादा

(83) और जब हमने इस्राईल की सन्तान से वचन लिया कि तुम अल्लाह के अतिरिक्त किसी की इबादत न करोगे और तुम भला व्यवहार करोगे माता-पिता के साथ, सम्बन्धियों के साथ, अनाथों और निर्धनों के साथ, और यह कि लोगों से अच्छी बात कहो, और नमाज़ स्थापित करो और जकात अदा करो। फिर तुम उससे फिर गये सिवाय थोड़े लोगों के। और तुम वचन देकर उससे हट जाने वाले लोग हो।
(84) और जब हमने तुमसे वचन लिया कि तुम अपना का खून न बहाओगे और अपने लोगों को अपनी बस्तियों से न निकालोगे। फिर तुमने वचन दिया और तुम उसके साक्षी हो।
(85) फिर तुम ही वह लोग हो कि अपनों की हत्या करते हो और अपने ही एक समूह को उनके नगरों से निकालते हो। उनके विरुद्ध उनके शत्रुओं की सहायता करते हो, पाप और अन्याय के साथ। फिर यदि वह तुम्हारे पास बन्दी बनकर आते हैं तो तुम फिदिया (अर्थदण्ड) अदा करके उनको छुड़ाते हो। जबकि स्वयं उनको निर्वासित करना तुम्हारे ऊपर हराम (अवैध) था। क्या तुम अल्लाह की किताब के एक भाग को मानते हो और एक भाग को झुठलाते हो। अतः तुममे से जो लोग ऐसा करें, उनका दण्ड इसके अतिरिक्त क्या है कि उनके सांसारिक जीवन में अपमान हो और क़यामत (ऊठाये जाने के दिन) में उनको कठोर यातना में डाल दिया जाये। और अल्लाह उस बात से अनभिज्ञ नहीं है जो तुम कर रहे हो।
(86) यही हैं वह लोग जिन्होंने परलोक के बदले सांसारिक जीवन खरीदा। अतः न उनकी यातना में कमी की जायेगी और न उनको सहायता पहुंचेगी।

बनु इस्राईल पर पैगम्बरों का नुज़ूल

(87) और हमने मूसा को किताब दी और उसके बाद एक के बाद एक रसूल (सन्देशवाहक) भेजे। और मरियम के बेटे ईसा को खुली-खुली निशानियाँ प्रदान की और पवित्र आत्मा (हल-कुद्स) से उसकी सहायता की। तो जब भी कोई रसूल (सन्देष्टा) तुम्हारे पास वह बात लेकर आया जो तुम्हारे जी को पसंद न थी तो तुमने घमण्ड किया। फिर तुम ने एक समूह को झुठलाया और एक समूह की हत्या कर दी।
(88) और यहूदी कहते हैं कि हमारे दृदय बन्द हैं। नहीं बल्कि अल्लाह ने उनकी अवज्ञा के कारण उनपर फटकार भेजी है। इसलिए वह बहुत कम ईमान लाते हैं।
(89) और जब उनके पास अल्लाह की ओर से एक किताब आई जो पुष्टि करने वाली है उसकी जो उनके पास है और इससे पहले वह स्वयं न मानने वालों पर विजय मांगा करते थे। फिर जब उनके पास वह चीज़ आई जिसको उन्होंने पहिचान लिया था तो उन्होंने उसको झुठला दिया। अतः अल्लाह की फटकार है झुठलाने वालों पर।
(90) कैसी बुरी है वह चीज़ जिससे उन्होंने अपने प्राप्त किया कि वह अवज्ञा कर रहे हैं अल्लाह कि उतारी हुई वाणी की, इस हठ के कारण कि अल्लाह अपनी कृपा और दया अपने बन्दों में से जिसपर चाहे उतारे। अतः वह क्रोध पर को और अवज्ञाकारियों के लिए अपमानजनक यातना है।
(91) और जब उनसे कहा जाता है कि उस वाणी पर ईमान लाओ जो अल्लाह ने उतारी है तो वह कहते हैं कि हम उस पर ईमान रखते हैं जो हमारे ऊपर अवतरित हुआ है और वह उसको झुठलाते हैं जो उसके पीछे आया है, यद्यपि वह सच है और पुष्टि और समर्थन करने वाला है उसका जो उनके पास है। कहो, यदि तुम ईमान वाले हो तो तुम इससे पहले अल्लाह के पैराम्बरों की हत्या क्यों करते रहे हो।
(92) और मूसा तुम्हारे पास खुली निशानियाँ लेकर आया। फिर तुमने उसके पीछे बछड़े को पूज्य बना लिया और तुम अत्याचार करने वाले हो।
(93) और जब हमने तुमसे वचन लिया और तूर पहाड़ को तुम्हारे ऊपर खड़ा किया-जो आदेश हमने तुमको दिया है, उसको दृढ़ता के साथ पकड़ो और सुनो। उन्होंने कहाः हमने सुना और हमने नहीं माना। और उनकी अवज्ञा के कारण बछड़ा उनके दिलों में रच बस गया। कहो यदि तुम ईमान वाले हो तो कैसी बुरी वह चीज़, जो तुम्हारा ईमान तुमको सिखाता है।
(94) कहो यदि अल्लाह के पास परलोक का घर विशेष रूप से तुम्हारे लिए है, दूसरों को छोड़कर, तो तुम मरने की कामना करो, यदि तुम सच्चे हो।
(95) परन्तु वह कभी इसकी कामना नहीं करेंगे, उसके कारण जो वह अपने आगे भेज चुके हैं। और अल्लाह भली-भाँति जानता है अत्याचार करने वालों को।
(96) और तुम उनको जीवन का सबसे अधिक लोभी पाओगे, उन लोगों से भी अधिक जो शिकं करने वाले हैं। उनमें से प्रत्येक यह चाहता है कि वह हज़ार वर्ष की आयु पाये, यद्यपि इतना जीना भी उसको यातना से बचा नहीं सकता। और अल्लाह देखता है जो कुछ वह कर रहे हैं।
(97) कहो कि जो कोई जिब्रील (अल्लाह की वाणी पैग़म्बर तक लाने वाला दूत) का विरोधी है तो उसने इस वाणी को तुम्हारे हृदय पर अल्लाह के आदेश से उतारा है, वह पुष्टि करने वाला है उसका, जो उसके आगे है और वह मार्गदर्शन और शुभसूचना है ईमान वालों के लिए।
(98) जो कोई शत्रु हो अल्लाह का और उसके फ़रिश्तों का और उसके रसूलों (सन्देष्टाओं) का और जिब्रील व मीकाईल (एक दूत का नाम) का तो अल्लाह ऐसे अवज्ञाकारियों का शत्रु है।
(99) और हमने तुम्हारे ऊपर स्पष्ट निशानियाँ ऊतारी और कोई उनको नहीं झुठलाता, परन्तु वही लोग जो सीमा से निकल जाने वाले हैं।
(100) क्या जब भी वह कोई वचन देंगे तो उनका एक समूह उसको तोड़ फैकेगा। बल्कि उनमें से अधिकतर लोग ईमान नहीं रखते।
(101) और जब उनके पास अल्लाह की ओर से एक रसूल (सन्देष्टा) आया जो पुष्टि करने वाला था उस चीज़ की जो उनके पास है तो उन लोगों ने जिनको किताब दी गई थी, अल्लाह कि किताब को इस तरह पीठ पीछे फेंक दिया जैसे कि वह उसको जानते ही नहीं।

हारूत व मारूत का ज़िक्र

(102) और वह उस चीज़ के पीछे पड़ गये जिसको शैतान, सुलेमान के राज्य का नाम लेकर पढ़ते थे। हालाँकि सुलेमान ने अवज्ञा नहीं की बल्कि ये शैतान थे जिन्होंने अवज्ञा की। वह लोगों को जादू सिखाते थे। और वह उस चीज़ में पड़ गये जो बाबुल में दो फ़रिश्तों, हारुत और मारूत पर उतारी गई, जबकि उनका मामला यह था कि वह जब भी किसी को यह सिखाते तो उससे कह देते कि हम तो परीक्षा के लिए हैं। अतः तुम अवज्ञाकारी न बनो। परन्तु वह उनसे वह चीज़ सीखते जिससे वह एक पुरुष और उसकी पत्नी के बीच अलगाव उत्पन्न कर दें। हालाँकि वह अल्लाह के आदेश के बिना इससे किसी का कुछ बिगाड़ नहीं सकते थे। और वह ऐसी चीज़ सीखते जो उनको हानि पहुँचाये और लाभ न पहुंचाए। और वह जानते थे कि जो कोई उस चीज़ का खरीदार हो, परलोक में उसका कोई हिस्सा नहीं। कैसी बुरी चीज़ है जिसके बदले उन्होंने अपने प्राणों को बेच डाला। काश ! वह इसको समझते।
(103) और यदि वह ईमान लाने वाले बनते और अल्लाह का डर अपनाते तो अल्लाह का बदला उनके लिए अधिक अच्छा था, काश वह इसको समझते।
(104) ऐ ईमान वालो, तुम ‘राइना' (हमारी ओर भी ध्यान करो, अवज्ञाकारी इस वाक्य को बदलकर 'राईना' अर्थात हमारा चरवाहा कहते थे) न कहीं बल्कि 'उन्जना' (हमारी ओर ध्यान कीजिए) कहो और सुनो। और अवज्ञा करने वालों के लिए कष्टकर दण्ड है।
(105) जिन लोगों ने अवज्ञा की, चाहे वह किताब वाले हों या बहुदेववादी, वह नहीं चाहते कि तुम्हारे ऊपर तुम्हारे पालनहार की ओर से कोई भलाई अवतरित हो। और अल्लाह जिसको चाहता है अपनी दया के लिए चुन लेता है। अल्लाह अत्यंत दयावान है।
(106) हम जिस आयत को निरस्त करते हैं या भुला देते है तो उससे बेहतर या उसके समान दूसरी आयत लाते हैं। क्या तुम नहीं जानते कि अल्लाह हर चीज़ की क्षमता रखता है।
(107) क्या तुम नहीं जानते कि अल्लाह ही के लिए आकाश और धरती का सामाज्य है. और तम्हारे लिए अल्लाह के अतिरिक्त न कोई मित्र है और न कोई सहायक।
(108) क्या तुम चाहते हो कि तुम अपने रसूल से प्रश्न करो जिस प्रकार इससे पूर्व मूसा से प्रश्न किये गये। और जिस व्यक्ति ने ईमान को कुफ़्र (अवज्ञा) से बदल लिया, वह निश्चित रूप से सन्मार्ग से भटक गया।
(109) बहुत से किताब वाले दिल से चाहते हैं कि तुम्हारे मोमिन (ईमान वाले) हो जाने के बाद किसी तरह वह फिर तुमको मुनकिर (अवज्ञाकारी) बना दें, अपनी इर्ष्या के कारण, इसके बावजूद कि सच्चाई उनके सामने स्पष्ट हो चुकी है। अतः क्षमा करो और अनदेखा करो यहाँ तक कि अल्लाह का निर्णय आ जाये। निस्सन्देह अल्लाह को हर चीज की सामर्थ्य प्राप्त है।
(110) और नमाज़ स्थापित करो और जकात दो। और जो भलाई तुम अपने लिए आगे भेजोगे, उसको तुम अल्लाह के पास पाओगे। जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह निश्चित रूप से उसको देख रहा है।

यहूद और नसारा का झूठा गुमान

(111) और वह कहते हैं कि जन्नत में मात्र वही लोग जायेंगे जो यहुदी हो या ईसाई, ये मात्र उनकी अभिलाषाएँ है कहो कि लाओ अपना तर्क यदि तुम सच्चे हो।
(112) बल्कि जिसने अपने आप को अल्लाह के आज्ञापालन में समर्पित कर दिया और वह पवित्र हृदय भी है तो ऐसे व्यक्ति के लिए उसके पालनहार के पास बदला है, उनके लिए न कोई डर है और न कोई दुख।।
(113) और यहूदियों ने कहा कि नसारा (ईसाई) किसी चीज़ पर नहीं और नसारा ने कहा कि यहूदी किसी चीज़ पर नहीं। और वह सब आकाशीय ग्रन्थ पढ़ते हैं। उसी प्रकार उन लोगों ने कहा जिनके पास ज्ञान नहीं, उन्हीं का सा कथन। अतः अल्लाह कियामत (परलोक) के दिन उनके बीच उस बात का निर्णय करेगा जिसमें वह झगड़ रहे थे।
(114) और उससे बढ़कर अत्याचारी और कौन होगा जो अल्लाह की मस्जिदों को इससे रोके कि वहाँ अल्लाह के नाम का स्मरण किया जाये और वह उनको उजाड़ने का प्रयास करे। उनका हाल तो यह होना चाहिए था कि वह मस्जिदों में अल्लाह से डरते हुए प्रवेश करते। उनके लिए संसार में अपमान है और परलोक में उनके लिए बड़ी यातना है।
(115) और पूरब और पश्चिम अल्लाह ही के लिए है। तुम जिधर चेहरा करो उसी ओर अल्लाह है। निश्चित रूप से अल्लाह व्यापकता वाला है, ज्ञान वाला है।
(116) और वह कहते हैं कि अल्लाह ने बेटा बनाया है। अल्लाह इससे पाक है। बल्कि आकाश और धरती में जो कुछ है, सब उसी का है, उसी के आज्ञाकारी हैं सारे।
(117) वह आकाशों और पृथ्वी का बनाने वाला है। वह जब किसी कार्य का करना ठहरा लेता है तो बस उसके लिए वह कह देता है कि हो जा', तो वह हो जाता है।
(118) और जो लोग ज्ञान नहीं रखते, उन्होंने कहाः अल्लाह क्यों नहीं बात करता हमसे या हमारे पास कोई निशानी क्यों नहीं आती। इसी तरह उनके पहले के लोग भी इन्ही की सी बातें कह चुके हैं, उन सबके दिल एक जैसे हैं, हमने स्पष्ट कर दी हैं निशानियाँ उन लोगों के लिए जो विश्वास करने वाले हैं।
(119) हमने तुमको सत्य के साथ भेजा है. शुभ सूचना सुनाने वाला और डराने वाला बनाकर। और तुमसे जहन्नम (नरक) में जाने वालों के बारे में कोई पूछ नहीं होगी।
(120) और यहूदी और ईसाई तुमसे कभी सन्तुष्ट न होंगे, जब तक तुम उनके पंथ के अनुयायी न बन जाओ। तुम कहो कि जो मार्ग अल्लाह दिखाता है, वही वास्तविक मार्ग है। और इस ज्ञान के पश्चात जो तुमको पहुँच चुका है, यदि तुमने उनकी इच्छाओं का अनुकरण किया तो अल्लाह के मुकाबले में न तुम्हारा कोई मित्र होगा और न कोई सहायक।
(121) जिन लोगों को हमने किताब दी है, वह उसको पढ़ते हैं जैसा कि उसको पढ़ने का हक़ है, यही लोग ईमान लाते हैं इस (कुरआन) पर। और जो इसको झुठलायें, तो वही घाटे में रहने वा
(122) ऐ इस्राईल की सन्तान! मेरे उस उपकार को याद करो जो मैंने तुम्हारे ऊपर किया और इस बात को कि मैंने तुमको समस्त संसार वालों पर श्रेष्ठता प्रदान की।
(123) और उस दिन से डरो जिसमें कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के कुछ काम न आयेगा और न किसी की ओर से कोई अर्थदण्ड स्वीकार किया जायेगा और न किसी को कोई सिफारिश लाभ देगी और न कि कोई सहायता पहुँचेगी।

इब्राहीम (अ०) का ज़िक्र

(124) और जब इब्राहीम को उसके पालनहार ने कुछ बातों के माध्यम से परीक्षा में डाला तो उसने पूरा कर दिखाया। अल्लाह ने कहा, मैं तुमको सब लोगों का इमाम (मार्गप्रदर्शक) बनाऊँगा। इब्राहीम ने कहाः और मेरी सन्तान में से भी। अल्लाह ने कहा मेरा वचन अत्याचारियों तक नहीं पहुँचता।
(125) और जब हमने काबा को लोगों के एकत्र होने का स्थान और शान्ति का स्थान घोषित किया। और आदेश दिया कि मक़ाम इब्राहीम (इब्राहीम के खड़े होने का स्थान) को नमाज़ पढ़ने का स्थान बना लो। और हमने इब्राहीम और इस्माईल को हक्म दिया कि मेरे घर की परिक्रमा करने वालों, एतेकाफ (बैठ कर स्तुति) करने वालों और झुकने (रुकू) और सजदा करने वालों के लिए पवित्र रखो।
(126) और जब इब्राहीम ने कहा ऐ मेरे पालनहार, इस नगर को शान्ति का नगर बना दे और उसके वासियों को, जो इनमें से अल्लाह और परलोक के दिन पर विश्वास रखे, उनको फलो की जीविका प्रदान कर। अल्लाह ने कहा जो अवज्ञा करेगा में उसको भी थोड़े दिनों लाभ दूंगा। फिर उसको अग्नि की यातना की ओर ढकेल दूंगा और वह बहुत बुरा ठिकाना है।
(127) और जब इब्राहीम और इस्माईल अल्लाह के घर (काबा) की दीवारें उठा रहे थे और यह कहते जाते थे: ऐ हमारे पालनहार, स्वीकार कर ले हम से, निस्संदेहः, तू ही सुनने वाला और जानने वाला है।
(128) ऐ हमारे पालनहार! हमको अपना कृतज्ञ बना और हमारी सन्तान में से अपनी एक कृतज्ञ कोम उठा, और हमको हमारे इबादत के तरीके बता और हमको क्षमा कर, तू ही क्षमा करने वाला, दया करने वाला है।
(129) ऐ हमारे पालनहार, और इनमें इन्हीं मैं का एक रसूल (सन्देष्टा) उठा जो उनको तेरी आयतें (श्रुति) सुनाये और उनको किताब और विवेक की शिक्षा दे और उनका तजिकया (शुद्धिकरण और अध्यात्मिक विकास) करे। निस्सन्देहः तू बड़ा प्रभुत्वशाली है, तत्वदर्शी है।
(130) और कौन है जो इब्राहीम के दीन को पसन्द न करे, परन्तु वह जिसने अपने आप को मूर्ख बना लिया हो। हालाँकि हमने इब्राहीम को संसार में चुन लिया था और परलोक में वह भले लोगों में से होगा।
(131) जब उसके पालनहार ने कहा कि मुस्लिम (अज्ञाकारी) हो जा तो उसने कहाः मैंने अपने आप को जगत के स्वामी के हवाले किया।
(132) और इसी का उपदेश दिया इब्राहीम ने अपनी सन्तान को और इसी का उपदेश दिया याकूब ने अपनी सन्तान को। ऐ मेरे बेटो! अल्लाह ने तुम्हारे लिए इसी दीन को चुन लिया है। अतः इस्लाम के अतिरिक्त किसी और हालत पर तुमको मृत्यु न आये।
(133) क्या तुम उपस्थित थे जब याकूब की मृत्यु का समय आया। जब उसने अपने बेटों से कहा कि मेरे बाद तुम किसकी इबादत करोगे। उन्होंने कहाः हम उसी अल्लाह की इबादत करेंगे जिसकी इबादत आप और आपके पूर्वज इब्राहीम, इस्माईल, इस्हाक़ करते आये हैं. वही एक उपास्य है और हम उस के आज्ञाकारी हैं।
(134) यह एक उम्मत थी जो गुज़र चुकी। उसको मिलेगा जो उसने कमाया और तुमको मिलेगा जो तुमने कमाया। और तुमसे उनके किये हए की पूछ न होगी।
(135) और वह कहते हैं कि यहूदी या ईसाई बन जाओ तो सन्मार्ग पाओगे। कहो कि नहीं, बल्कि हम तो अनुसरण करते हैं इब्राहीम के दीन का जो अल्लाह की ओर एकाग्रचित था और वह बहुदेववादियों में से न था।
(136) कहो कि हम अल्लाह पर ईमान लाये और उस मार्गदर्शन पर जो हमारी ओर उतारा गया है, और उस पर भी जो इब्राहीम और इस्माईल और इसहाक़ और याकूब की सन्तान पर उतारा गया और जो दिया गया मूसा और ईसा को और जो दिया गया पैगम्बरों को उनके पालनहार की ओर से। हम उनमें से किसी के बीच अन्तर नहीं करते, और हम अल्लाह ही के आज्ञाकारी (मुस्लिम) हैं।
(137) फिर यदि वह ईमान लायें जिस तरह तुम ईमान लाये हो तो निस्सन्देहः वह सन्मार्ग पा गये और यदि वह फिर जायें तो अब वह हठधर्मिता पर हैं। अतः तुम्हारी ओर से अल्लाह उनके लिए पर्याप्त है और वह सुनने वाला, जानने वाला है।
(138) कहो हमने अपनाया अल्लाह का रंग और अल्लाह के रंग से किसका रंग अच्छा है और हम उसी की इबादत करने वाले हैं।
(139) कहो क्या तुम अल्लाह के सम्बन्ध में हमसे झगड़ते हो, हालाँकि वह हमारा पालनहार भी है और तुम्हारा पालनहार भी। हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म, और हम पूर्ण रूप से उसके लिए हैं।
(140) क्या तुम कहते हो कि इब्राहीम और इस्माईल और इसहाक और याकूब और उसकी सन्तान सब यहुदी अथवा ईसाई थे। कहो कि तुम अधिक जानते हो या अल्लाह। और उससे बड़ा अत्याचारी और कौन होगा जो उस गवाही को छिपाये जो अल्लाह की ओर से उसके पास आई हुई है। और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उससे अनभिज्ञ नहीं।
(141) यह एक उम्मत थी जो गुजर चुकी, उसको मिलेगा जो उसने कमाया और तुमको मिलेगा जो तुमने कमाया। और तुमसे उनके किये हुए की पूछ न होगी।
(142) अब मूर्ख लोग कहेंगे कि ईमान वालों को किस चीज़ ने उनके किले (केन्द्र) से फेर दिया। कहो कि पूर्व और पश्चिम अल्लाह ही के हैं। वह जिसको चाहता है, सीधा मार्ग दिखाता है।
(143) और इस तरह हमने तुमको बीच की उम्मत बना दिया, ताकि तुम हो बताने वाले लोगों पर और रसूल (मुहम्मद) हो तुम पर बताने वाला। और जिस किब्ले पर तुम थे, हमने उसको मात्र इसलिए ठहराया था कि हम जान लें कि कौन रसूल का अनुसरण करता है और कौन इससे उल्टे पाँव फिर जाता है। और निस्सन्देह, यह बात भारी है परन्तु उन लोगों पर जिनको अल्लाह ने सीधा रास्ता दिखा दिया है। और अल्लाह ऐसा नहीं कि वह तुम्हारे ईमान को नष्ट कर दे। निस्सन्देह, अल्लाह लोगों के साथ स्नेह करने वाला, दया करने वाला है।

काबा के क़िबला बनने का ज़िक्र

(144) हम तुम्हारे चेहरे का बार-बार आसमान की ओर उठना देख रहे हैं। अतः हम तुमको उसी किबले की ओर फेर देंगे जिसको तुम पसन्द करते हो, अब अपना चेहरा मस्जिद-ए हराम (काबा) की ओर फेर दो। और तुम जहाँ कहीं भी हो, अपने चेहरों को उसी की ओर करो। और जिन लोगों को किताब दी गई, वह भली-भाँति जानते हैं कि यह सत्य है और उनके पालनहार की ओर से है। और अल्लाह अनभिज्ञ नहीं उससे, जो वह कर रहे हैं।
(145) और यदि तुम इन किताब वालों के समक्ष सभी तर्क प्रस्तुत कर दो, तब भी वह तुम्हारे किब्ले को न मानेंगे और न तुम उनके किबले का अनुसरण कर सकते हो। और न वह स्वयं एक दूसरे के किबले को मानते हैं। और इस ज्ञान के प्राप्त हो जाने के बाद जो तुम्हारे पास आ चुका है, यदि तुम उनकी इच्छाओं का अनुसरण करोगे तो निश्चय ही तुम अत्याचारियों में हो जाओगे।
(146) जिनको हमने किताब दी है, वह उसको उसी तरह पहचानते हैं जिस तरह वह अपने बेटों को पहचानते हैं। और उनमें से एक समूह सत्य को छिपा रहा है, हालाँकि वह उसको जानता है। सत्य वह है जो तेरा पालनहार कहे।
(147) अतः तुम कदापि सन्देह करने वालों में से न बनो।
(148) हर एक के लिए एक दिशा है जिधर वह अपना चेहरा करता है। अतः तुम भलाइयाँ की ओर दौड़ो। तुम जहाँ कहीं भी होगे, अल्लाह तुम सबको ले आयेगा, निस्सन्देहः अल्लाह सब कुछ कर सकता है।
(149) और तुम जहाँ से भी निकलो, अपना चेहरा मस्जिद-ए हराम की ओर करो। निस्सन्देहः यह सत्य है, तुम्हारे पालनहार की ओर से है। और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उससे अनभिज्ञ नहीं।
(150) और तुम जहाँ से भी निकलो, अपना चेहरा मस्जिद-ए हराम की ओर करो और तुम जहाँ भी हो अपना चेहरा उसी की और रखो, ताकि लोगों को तुम्हारे ऊपर कोई हुज्जत (तक) शेष न रहे, सिवाय उन लोगों के जो उनमें अन्यायी हैं। अतः तुम उनसे न डरों और मुझसे डरो। और ताकि मैं अपनी कृपा तुम्हारे ऊपर पूरी कर दूँ। और ताकि तुम सन्मार्ग पा जाओ।
(151) जिस तरह हमनें तुम्हारे बीच एक रसूल (सन्देष्टा) तुम्ही में से भेजा जो तुमको हमारी आयतें (श्रुति) पढ़कर सुनाता है और वह तुमको पवित्र करता है और तमको किताब (कुरआन) की और हिक्मत (तत्वरिष्टता) की शिक्षा देता है। और तुमको वह चीजे सिखा रहा है जिनको तुम नहीं जानते थे।
(152) अतः तुम मुझको याद रखो, मैं तुमको याद रतूंगा। और मेरे उपकार के आभारी बनो, कृतघ्न न बनो।
(153) ऐ ईमान वालो, सब्र (धैर्य) और नमाज़ के माध्यम से सहायता प्राप्त करो। निश्चय ही अल्लाह धैर्य रखने वालों के साथ है।
(154) और जो लोग अल्लाह के रास्ते में मारे जायें, उनको मृत मत कहो, वह जीवित हैं, परन्तु तुमको ज्ञात नहीं।
(155) और हम अवश्य तुमको परीक्षा में डालेंगे, कुछ डर और भूख से और सम्पत्ति और प्राणों और फलों की कमी से। और दृढ़ रहने वालों को शुभ-सूचना दे दो।
(156) जिनका हाल यह है कि जब उन पर कोई विपत्ति आती है तो वह कहते हैं: हम अल्लाह के हैं और हम उसी की ओर लौटने वाले हैं।
(157) यही लोग हैं जिनके ऊपर उनके पालनहार की ओर से शाबाशियां (विशेष कृपा है और दया है। और यही लोग हैं जो सन्मार्ग पर हैं।
(158) सफा और मरवा (मक्के की दो पहाडियाँ) निस्सन्देहः अल्लाह की स्मृतियों में से हैं। अतः जो व्यक्ति अल्लाह के घर का हज करे या उमरः करे तो उसपर कोई हानि नहीं कि वह इन दोनों की परिक्रमा करे और जो कोई उत्साहपूर्वक कुछ भलाई करे तो अल्लाह क़द करने वाला, जानने वाला है।
(159) जो लोग छिपाते हैं हमारी उतारी हई खुली निशानियों को और हमारे मार्गदर्शन को, इसके पश्चात कि हम इसको लोगों के लिए किताब में खोल चुके है तो यह वही लोग हैं जिन को अल्लाह ठुकरा देगा, और उन पर फटकार करने वाले फटकार करते हैं।
(160) हाँ, जिन्होंने तोबा (क्षमा याचना) की और सुधार कर लिया और स्पष्ट रूप से उसका वर्णन कर दिया तो उनको में क्षमा कर दूंगा, और में हूँ क्षमा करने वाला, दयावान।
(161) निस्सन्देहः जिन लोगों ने झुठलाया और वह उसी हालत में मृत्यु पा गये तो वही लोग हैं कि उन पर अल्लाह की और फ़रिश्तों की और मनुष्यों की सबकी फटकार है।
(162) इसी स्थिति में वह सदैव रहँगे। उन पर से यातना हल्की न की जायेगी और न उनको ढील दी जायेगी।
(163) और तुम्हारा अल्लाह  एक ही अल्लाह है, उसके सिवा कोई अल्लाह नहीं, वह बहुत दयावान और अत्यन्त कृपाशील है।
(164) निस्सन्देह, आकाशों और पृथ्वी की संरचना में और रात और दिन के आने-जाने में और उन नौकाओं में जो मनुष्यों के काम आने वाली चीजें लेकर समुद्र में चलती हैं, और उस पानी में जिसको अल्लाह ने आकाश से उतारा, फिर उसने मृत भूमि को जीवन प्रदान किया। और अल्लाह ने भूमि में प्रत्येक प्रकार के जीवधारी फैला दिये। और हवाओं की गति और बादलों में जो आकाश और पृथ्वी के बीच आदेश के आधीन हैं, संकेत है उन लोगों के लिए जो बुद्धि से काम लेते हैं।

मुशरीकों का ज़िक्र

(165) कुछ लोग ऐसे हैं जो अल्लाह के सिवा दूसरों को उसके समकक्ष ठहराते हैं। वह उनसे ऐसा प्रेम रखते हैं जैसा प्रेम अल्लाह से रखना चाहिए। और जो ईमान वाले हैं, वह सबसे अधिक अल्लाह से प्रेम रखते हैं। और यदि ये अत्याचारी उस समय को देख लैं, जबकि वह यातना ग्रस्त हाँगे, कि सम्पूर्ण शक्ति अल्लाह ही की है और अल्लाह बहत कठोर यातना देने वाला है।
(166) जब यातना उनके सामने होगी तो वह लोग जिनके कहने पर वह चलते थे, उन लोगों से अलग हो जायेंगे और उनके प्रत्येक दिशा के सम्बन्ध पूर्णतया टूट चुके होंगे।
(167) वह लोग जो संसार में उनके पीछे चले थे, कहेंगे काश, हमको दुनिया की और वापसी मिल जाती तो हम भी उनसे अलग हो जाते जैसे ये हमसे अलग हो गये। इस प्रकार अल्लाह उनके कर्मों को उन्हें पश्चाताप बनाकर दिखाएगा। और वह आग (जहन्नम) से निकल न सकेंगे।

हलाल खाने की हिदायत

(168) लोगो! पृथ्वी की वस्तुओं में से हलाल (वैध) और सुथरी वस्तुएँ खाओ और शैतान के पद-चिन्हों का अनुसरण न करो, निस्सन्देहः शैतान तुम्हारा प्रत्यक्ष शत्रु हैं।
(169) वह तुमको मात्र बुरे कर्म और निर्लज्जता का आदेश देता है और इस बात का कि तुम अल्लाह के बारे में वह बात करो, जिनके सम्बन्ध में तुमको कोई ज्ञान नहीं।
(170) और जब उनसे कहा जाता है कि उस पर चलो जो अल्लाह ने उतारा है तो वह कहते हैं कि हम उस पर चलेंगे जिस पर हमने अपने पूर्वजों (बाप-दादा) को चलते हुए पाया है। क्या उस स्थिति में भी कि उनके बाप-दादा न बुद्धि रखते हाँ और न सन्मार्ग जानते हो।
(171) और उन झुठलाने वालों का उदाहरण ऐसा है जैसे कोई व्यक्ति ऐसे पशु के पीछे चिल्ला रहा हो जो बुलाने और पुकारने के अतिरिक्त और कुछ नहीं सुनता। ये बहरे हैं, गूगें हैं, अन्धे हैं, ये कुछ नहीं समझते।
(172) ऐ ईमान वालो, हमारी दी हुई पवित्र चीज़ों को खाओ और अल्लाह का आभार व्यक्त करो यदि तुम उसकी उपासना करने वाले हो।

हराम चीजों का ज़िक्र

(173) अल्लाह ने तुम पर हराम (अवैध) किया है मात्र मुदार और रक्त को और सुअर के माँस को, और जिस पर अल्लाह के अतिरिक्त किसी और का नाम लिया गया हो। फिर जो व्यक्ति विवश हो जाये, वह न इच्छुक हो और न सीमा का उल्लघंन करने वाला हो तो उस पर कोई पाप नहीं। निस्सन्देहः अल्लाह क्षमा करने वाला, दयावान है।
(174) जो लोग उस चीज़ को छिपाते हैं जो अल्लाह ने अपनी किताब में उतारी है और उसके बदले में थोड़ा मोल लेते हैं, वह अपने पेट में मात्र आग भर रहे हैं। कियामत (उठाये जाने के दिन) मैं अल्लाह न उनसे बात करेगा और न उनको पवित्र करेगा और उनके लिए कष्टप्रद यातना है।
(175) यही वे लोग हैं जिन्होंने सन्मार्ग के बदले पचभ्रष्टता का सौदा किया और क्षमा के बदले यातना का, तो आग को सहन करने की उनको कितनी सहार है।
(176) यह इसलिए कि अल्लाह ने अपनी किताब को ठीक-ठीक उतारा, परन्तु जिन लोगों ने किताब में कई रास्ते (मतभेद) निकाल लिये, वह हठधर्मिता में दूर जा पड़े।
(177) नेकी (पुण्य) यह नहीं कि तुम अपने चेहरे पूरब और पश्चिम की ओर कर लो, बल्कि नेकी यह है कि मनुष्य ईमान लाये अल्लाह पर और परलोक के दिन पर और फ़रिश्तों पर और किताब पर और पैगम्बरों पर। और धन दे अल्लाह के प्रेम में और सम्बन्धियों को और अनाथों को और मुहताजों को और मुसाफिरों को और माँगने वालों को और गर्दने छुड़ाने में। और नमाज़ स्थापित करे और ज़कात अदा करे और जब प्रण कर ले तो उसको पूरा करे। और सन (पर्य) करे कठिनाई में और विपत्ति और कष्ट में, और युद्ध के समय। यही लोग हैं जो सच्चे निकले और यही हैं डर रखने वाले।

बदले का ज़िक्र

(178) ऐ ईमान वालो, तुम पर हत्या का किसास (बदला) लेना अनिवार्य किया जाता है। स्वतन्त्र व्यक्ति के बदले स्वतन्त्र व्यक्ति, दास के बदले दास. महिला के बदले महिला। फिर जिसको उसके भाई की ओर से कुछ क्षमा प्राप्त हो जाये तो उसको चाहिए कि वह भले मार्ग का अनुसरण करे और भलाई के साथ उसको अदा करे। यह तुम्हारे पालनहार की ओर से एक सुविधा है और दया है। अब इसके बाद भी जो व्यक्ति सीमा का उल्लंघन करे, उसके लिए कष्टदायक यातना है।
(179) और ऐ बुद्धि वालो, किसास (बदला) में तुम्हारे लिए जीवन है ताकि तुम बचो।

वसीयत का ज़िक्र

(180) तुम पर फर्ज़ (अनिवार्य) किया जाता है कि जब तुममें से किसी की मृत्यु का समय आ जाये और वह अपने पीछे, सम्पत्ति छोड़ रहा हो तो वह सामन्य रीत के अनुसार वसीयत कर दे अपने माता-पिता के लिए और सम्बन्धियों के लिए। यह आवश्यक है अल्लाह से डरने वालों के लिए।
(181) फिर जो कोई वसीयत को सुनने के बाद उसको बदल डाले तो उसका पाप उसी पर होगा जिसने उसको बदला, निश्चय ही अल्लाह सुनने वाला, जानने वाला है।
(182) हो, जिसको वसीयत करने वाले के सम्बन्ध में यह सन्देह हो कि उसने पक्षपात किया है या हक़ मारा है और वह आपस में समझौता करा दे तो उस पर कोई पाप नहीं है। अल्लाह क्षमा करने वाला, दया करने वाला है।

रोज़े का ज़िक्र

(183) ऐ ईमान वालो, तुम पर रोज़ा फर्ज़ (अनिवार्य किया गया, जिस प्रकार तुमसे पहले के लोगों पर रोज़ा फजर (अनिवार्य किया गया था, ताकि तुम परहेजगार (संयमी) बनो
(184) गिनती के कुछ दिन। फिर जो कोई तुममें रोगग्रस्त हो या वह यात्रा में हो तो अन्य दिनों में वह संख्या पूरी कर ले। और जिनको ताक़त न हो तो उनके ऊपर एक रोज़े का प्रतिदान एक निर्धन को खाना खिलाना है। जो कोई अतिरिक्त नेकी (पुण्य) करे तो वह उसके लिए अच्छा है। और तुम रोज़ा रखो तो यह तुम्हारे लिए अधिक अच्छा है, यदि तुम समझो।

रमज़ान का ज़िक्र

(185) रमज़ान का महीना जिसमें कुरआन उतारा गया, मार्गदर्शन है लोगों के लिए और प्रत्यक्ष निशानियों मार्ग की, और सत्य और असत्य के बीच निर्णय करने वाला। अतः तुममें से जो कोई इस महीने को पाये, वह इसके रोज़े रखे और जो रोगग्रस्त हो या वह यात्रा पर हो तो वह अन्य दिनों में उसी संख्या पूरी कर ले। अल्लाह तुम्हारे लिए सुविधा चाहता है, वह तुम्हारे साथ सख़्ती करना नहीं चाहता। और (वह चाहता है) कि तुम संख्या पूरी कर लो और अल्लाह की बड़ाई करो इस बात पर कि उसने तुमको मार्ग बताया और ताकि तुम उसके आभार व्यक्त करने वाले बनो।
(186) और जब मेरे उपासक तुमसे मेरे सम्बन्ध में पूढं तो मैं निकट हूँ, पुकारने वाले की पुकार का उत्तर देता हूँ जबकि वह मुझे पुकारता है, तो चाहिए कि वह मेरा आदेश माने और मुझपर विश्वास रखें ताकि वह सन्मार्ग पायें।

रमज़ान की रात में बीवी से सोहबत

(187) तुम्हारे लिए रोजे की रात में अपनी पत्नियों के पास जाना वैध किया गया। वह तुम्हारे लिए वस्त्र है और तुम उनके लिए वस्त्र हो। अल्लाह ने जाना कि तुम अपने आप से प्रतिज्ञा भंग कर रहे थे तो उसने तुम पर कृपा की और तुमको क्षमा कर दिया। तो अब तुम उनसे मिलो और चाहो जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दिया है। और खाओ और पिओ यहाँ तक कि सुबह की सफेद धारी काली धारी से अलग स्पष्ट हो जाये, फिर पूरा करो रोज़ा रात तक। और जब तुम मस्जिद में एतेकाफ़ में हो तो पत्नियों से संभोग न करो। यह अल्लाह की बनाई हुई सीमाएँ हैं तो तुम उनके निकट न जाओ। इस तरह अल्लाह अपनी निशानियाँ लोगों के लिए बयान करता है ताकि वह बचें।
(188) और तुम आपस में एक-दूसरे के धन को अनधिकृत रूप से न खाओ, और न उनको प्रशासकों तक पहुँचाओ ताकि दूसरों के धन का कोई भाग अन्याय पूर्वक खा जाओ। हालांकि तुम इसको जानते हो।
(189) वह तुमसे चांद के घटने एवं बढ़ने के सम्बन्ध में प्रश्न करते हैं। कह दो कि वह समय तथा तिथि (बताने वाले) हैं लोगों के लिए और हज के लिए। और नेकी यह नहीं कि तुम घरों में आओ छत पर से, बल्कि नेकी यह है कि मनुष्य संयमी बने। और घरों में उनके दरवाज़ों से आओ और अल्लाह से डरो ताकि तुम सफल हो।
(190) और अल्लाह के मार्ग में उन लोगों से लड़ो जो लड़ते हैं तुमसे। और अत्याचार न करो, अल्लाह अत्याचार करने वालों को पसन्द नहीं करता।

काफिरों के क़त्ल की हिदायत

(191) और मारो उनको जिस स्थान पर पाओ और निकाल दो उनको जहाँ से उन्होंने तुमको निकाला है। और फितना (उपद्रव) हत्या से भी बढ़कर है। और उनसे मस्जिद-ए हराम के पास न लड़ो, जब तक कि वह तुमसे वहां युद्ध न छेड़ें। अतः यदि वह तुमसे युद्ध छेड़ तो उनका वध करो। यही दण्ड है अवज्ञाकारियों का।
(192) फिर यदि वह मान जायें तो अल्लाह क्षमा करने वाला दयावान है।
(193) और उनसे युद्ध करो यहाँ तक कि फितना (धार्मिक अत्याचार) बाकी न रहे और दीन (धर्म) अल्लाह का हो जाये, फिर यदि वह मान जायें तो इसके बाद सख़्ती नहीं है, परन्तु अत्याचारियों पर।
(194) हुरमत वाला (प्रतिष्ठित) महीना, हुरमत वाले महीनों का बदला है और हुरमतों का भी किसास (बदला) है अतः जिसने तुमपर अत्याचार किया, तुम भी उसपर अत्याचार करो, जैसा उसने तुम पर अत्याचार किया है। और अल्लाह से डरो और जान लो कि अल्लाह परहेज़गारों के साथ है।
(195) और अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करो और अपने आप को हलाकत में न डालो। और काम अच्छी तरह करो। निस्सन्देहः अल्लाह पसन्द करता है अच्छी तरह काम करने वालों को।

हज और उमरा का ज़िक्र

(196) और हज और उमरः अल्लाह के लिए पुरा करो। फिर यदि तुम घिर जाओ तो जो कुर्वानी (वध का जानवर) उपलब्ध हो, वह प्रस्तुत कर दो और अपने सिरों का मुण्डन न कराओ जब तक कुर्बानी अपने ठिकाने पर न पहुँच जाये। हममें से जो रोगग्रस्त हों और उसके सिर में कोई पीड़ा हो तो वह फिदिया (अर्थदण्ड) दे. रोज़ा या दान, या कुबानी का। जब शान्ति की स्थिति हो और कोई हज तक उमरः का लाभ प्राप्त करना चाहे. तो वह कुबानी प्रस्तुत करे, जो उसको उपलब्ध हो। फिर जिसके पास उपलब्ध न हो तो वह हज के दिनों में तीन दिन के रोज़े रखे और सात दिन के रोज़े जब तुम घरों को लोटो। ये पूरे दस दिन हुए। यह उस व्यक्ति के लिए है जिसका परिवार मस्जिद-ए हराम के पास न बसा हुआ हो। अल्लाह से डरो और जान लो कि अल्लाह कठोर यातना देने वाला है।
(197) हज के निर्धारित महीने हैं। अतएव जिसने इन निर्धारित महीनों में हज का इरादा कर लिया तो फिर उसको हज के दौरान न कोई अश्लील बात करनी है और न पाप की और न लड़ाई-झगड़े की बात। और जो भले कर्म तुम करोगे, अल्लाह को उसका ज्ञान हो जायेगा। और तुम पाथेय लो। सबसे अच्छा पाथेय तक़वा (परहेज़गारी) का पाथेय है। और ऐ बुद्धि वालो, मुझसे डरो।
(198) इसमे कोई पाप नहीं कि तुम अपने पालनहार का फल (अनुकम्पा) तलाश करो। फिर जब तुम लोग 'अरफात से वापस हो तो अल्लाह को याद करो 'मशअरे हराम' के निकट। और उसको याद करो जिस तरह अल्लाह ने तुमको बताया है। इससे पहले निश्चय ही तुम भटके हुए लोगों में थे।
(199) फिर परिक्रमा को चलो जहाँ से सब लोग चलें और अल्लाह से क्षमा याचना करो। वास्तव में अल्लाह क्षमा प्रदान करने वाला, दया करने वाला है।
(200) फिर जब तुम अपने हज के मनासिक (हज की प्रक्रिया) पूरे कर लो तो अल्लाह को याद करो, जिस तरह तुम पहले अपने बाप-दादा को याद करते थे, बल्कि उससे भी अधिक। लोगों में से कोई मनुष्य कहता है: ऐ हमारे पालनहार! हमको इसी संसार में सब कुछ दे दे, और परलोक में उसका कुछ हिस्सा नहीं।
(201) और कोई व्यक्ति है जो कहता है कि ऐ हमारे पालनहार, हमको संसार में भलाई दे और परलोक में भी भलाई दे और हमको आग की यातना से बचा।
(202) उन्हीं लोगों के लिए हिस्सा है उनके किये का (दोनों जगह- प्रलोक एवं संसार) और अल्लाह शीघ्र ही हिसाब लेने वाला है।
(203) और अल्लाह को याद करो निर्धारित दिनों में। फिर जो व्यक्ति शीघ्रता से दो दिन में लौट आये, उस पर कोई पाप नहीं और जो व्यक्ति व्हर जाये, उस पर भी कोई पाप नहीं। यह उसके लिए है जो अल्लाह से डरे। और तुम अल्लाह से डरते रहो और भली-भाँति जान लो कि तम उसी के पास एकत्र किये जाओगे।
(204) और लोगों में से कोई ऐसा है कि उसकी बात इस सांसारिक के जीवन मैं तुमको भली प्रतीत होती है और वह अपने दिल की बात पर अल्लाह को साक्षी बनाता है, हालांकि वह बहुत झगड़ालू है।
(205) और जब वह पीठ फेरता है तो वह इस प्रयास में रहता है कि पृथ्वी पर उपद्रव फैलाये और खेतों और प्राणों को नष्ट करे, हालांकि अल्लाह फ़साद (बिगाड़) को पसन्द नहीं करता।
(206) और जब उससे कहा जाता है कि अल्लाह से डर, तो अहंकार उसको पाप पर जमा देता है। अतः ऐसे व्यक्ति के लिए नरक निश्चित है और वह बहुत बुरा ठिकाना है।
(207) और लोगों में से कोई ऐसा है कि अल्लाह की प्रसन्नता की तलाश में वह अपने प्राण को खपा देता है और अल्लाह अपने बंदों (उपासकों) पर अत्यन्त दयावान है।

इस्लाम में कामिल दाखिले का ज़िक्र

(208) ऐ ईमान वालों, इस्लाम में पूरे के पूरे प्रविष्ट हो जाओ और शैतान के पद-चिन्हों पर मत चलो, वह तुम्हारा प्रत्यक्ष शत्रु है।
(209) यदि तुम फिसल जाओ इसके उपरान्त कि तुम्हारे पास स्पष्ट तकं आ चुके हैं तो जान लो कि अल्लाह प्रभुत्वशाली है और तत्वदर्शी है।
(210) क्या लोग इस प्रतीक्षा में है कि अल्लाह (स्वंय) बादलों की छाया में आये और फ़रिश्ते भी आ जायें और मामले का निर्णय कर दिया जाये, और समस्त मामले अल्लाह ही की ओर फेरे जाते हैं।
(211) इसाईल की सन्तान से पूछो, हमने उनको कितनी खुली-खुली निशानियाँ दी। और जो व्यक्ति अल्लाह की नेमत (अनुकम्पा) को बदल डाले, जबकि वह उसके पास आ चुकी हो तो अल्लाह निश्चित रूप से कठोर दण्ड देने वाला है।
(212) आकर्षक बना दिया गया है सांसारिक जीवन उन लोगों की दृष्टि में जो अवज्ञाकारी हैं और वह ईमानवालों पर हँसते हैं। जबकि जो परहेज़गार है, वह कियामत के दिन उनकी तुलना में ऊँचे होंगे। और अल्लाह जिसपर चाहता है, उदार अनुग्रह करता
(213) लोग एक उम्मत थे। उन्होंने विभेद किया तो अल्लाह ने पैग़म्बरों को भेजा शुभ सूचना देने वाले और डराने वाले बना कर। और उनके साथ किताब उतारी सत्य के साथ, ताकि वह निर्णय करे उन बातों का जिनमें लोग मतभेद कर रहे हैं। और यह मतभेद उन्हीं लोगों ने किये जिनको सत्य दिया गया था, इसके उपरान्त कि उनके पास खुला-खुला मार्गदर्शन आ चुका था, आपस की हठधमी के कारण। अतः अल्लाह ने अपनी कृपा से सच्चाई के मामले में ईमान वालों को मार्ग दिखाया जिसमें वह झगड़ रहे थे और अल्लाह जिसको चाहता है सीधा रास्ता दिखा देता है।
(214) क्या तुमने यह समझ रखा है कि तुम जन्नत में प्रवेश पा जाओगे जबकि अभी तुम पर वह परिस्थितियाँ गुज़री ही नहीं जो तुमसे पहले के लोगों पर गुज़री थीं। उनको कठिनाई और पीड़ा पहुँची और वह हिला मारे गये, यहाँ तक कि रसूल (सन्देष्टा) और उनके साथ ईमान लाने वाले पुकार उठे कि अल्लाह की सहायता कब आयेगी। याद रखो, अल्लाह की सहायता निकट है।
(215) लोग तुमसे पूछते हैं कि वह क्या खर्च करें। कह दो कि जो धन तुम खर्च करो तो उसमे अधिकार है तुम्हारे माता-पिता का और सम्बन्धियों का और अनाथों का और निर्धनों का और मुसाफिरों का। और जो भलाई तुम करोगे, वह अल्लाह को मालूम है। 
(216) तुम पर युद्ध का आदेश हुआ है और वह तुमको भारी प्रतीत होता है। हो सकता है कि तुम एक चीज़ को नापसन्द करो और वह तुम्हारे लिए भली हो। और हो सकता है कि तुम एक चीज़ को पसन्द करो और वह तुम्हारे लिए बुरी हो। और अल्लाह जानता है, तुम नहीं जानते।।
(217) लोग तुमसे हुरमत (युद्ध निषिद्ध) वाले महीने के सम्बन्ध में पूछते हैं कि उसमें युद्ध करना कैसा है। कह दो कि उसमें युद्ध करना बहुत बुरा है। परन्तु अल्लाह के मार्ग से रोकना और उसको झुठलाना और मस्जिद-ए हराम से रोकना और उसके लोगों को उससे निकालना अल्लाह की रष्टि में इससे भी अधिक बुरा है। और फितना (फसाद हत्या से भी अधिक बड़ी बुराई है। और ये लोग तुमसे निरन्तर लड़ते रहेंगे यहाँ तक कि तमको तुम्हारे दीन से फेर दै, यदि वह सक्षम हो। और तुममें से जो कोई अपने दीन से फिरेगा और वह कुफ (अवज्ञा) की स्थिति में मर जाये तो ऐसे लोगों के कर्म नष्ट हो गये (इस) संसार में और परलोक में। और वह आग में पड़ने वाले हैं और वह उसमें सदैव रहेंगे।
(218) वह लोग जो ईमान लाये और जिन्होंने हिजरत (अल्लाह के मार्ग मैं अपना घर बार छोड़ा) की और अल्लाह के मार्ग में संघर्ष किया, वह अल्लाह से दया की अपेक्षा रखते हैं और अल्लाह क्षमा करने वाला, दया करने वाला है।
(219) लोग तुमसे मदिरा और जुए के विषय में पूछते हैं। कह दो कि इन दोनों चीज़ों में बड़ा पाप है और लोगों के लिए कुछ लाभ भी हैं। और उनका पाप बहुत अधिक है उनके लाभ से। और वह तुमसे पूछते हैं कि वह क्या खर्च करें। कह दो कि जो आवश्यकता से अधिक हो। इस तरह अल्लाह तुम्हारे लिए आदेशों का वर्णन करता है ताकि तुम चिन्तन करो
(220) संसार और परलोक के मामलों में। और वह तुमसे अनाथों के सम्बन्ध में पूछते हैं। कह दो कि जिसमें उनकी भलाई हो, वही उपयुक्त है। और यदि तुम उनको अपने साथ सम्मिलित कर लो तो ये तुम्हारे भाई हैं। और अल्लाह को ज्ञात है कि कौन बिगाड़ करने वाला है और कौन सुधार पैदा करने वाला। और यदि अल्लाह चाहता तो तुमको विपत्ति में डाल देता। अल्लाह प्रभुत्वशाली और तत्वज्ञ है।
(221) और मुश्रिक (बहुदेववादी) औरतों से विवाह न करो जब तक कि वह ईमान न लाय और एक मोमिन दासी अधिक अच्छी है एक मुश्रिक स्त्री से, यद्यपि वह तुमको अच्छी लगती हो। और अपनी औरतों को मुनिक मदों के निकाह में न दो जब तक कि वह ईमान न लायें, मोमिन दास अच्छा है एक स्वतन्त्र मुनिक से, यद्यपि वह तुमको अच्छा लगता हो। ये लोग आग की ओर बुलाते हैं और अल्लाह जन्नत (स्वर्ग) की ओर, और अपनी क्षमा की ओर बुलाता है। वह अपने आदेश (नियम) लोगों के लिए स्पष्ट करके बयान करता है, ताकि वह नसीहत पक.।

हैज़ के दौरान सोहबत का ज़िक्र

(222) और वह तुमसे हैज़ (मासिक धर्म) के विषय में पूछते हैं। कह दो कि वह एक गन्दगी है, उसमें तुम औरतों से अलग रहो। और जब तक वह पवित्र न हो जायें उनके निकट न जाओ। फिर जब वह अच्छी तरह पवित्र हो जायें, तो उस विधि से उनके निकट जाओ जिसका अल्लाह ने तुमको आदेश दिया है। अल्लाह मित्र रखता है तौबा करने वालों को और वह मित्र रखता है पवित्र रहने वालों को।
(223) तुम्हारी औरतें तुम्हारी खेतियों है। अतः अपनी खेती में जिस तरह चाहो जाओ और अपने लिये आगे भेजो और अल्लाह से डरो और जान लो कि तम्हें अवश्य उससे मिलना है। और ईमान वालों को शुभ-सूचना दे दो।
(224) और अल्लाह को अपनी सौगन्धों की ओट न बनाओ कि तुम भलाई न करो, और परहेज़गारी न करो और लोगों के बीच समझौता न कराओ। अल्लाह सुनने वाला जानने वाला है।
(225) अल्लाह तुम्हारी अन्जानी सौगन्धों पर तुमको नहीं पकड़ता, बल्कि वह उस संकल्प पर पकड़ता है जो तुम्हारे हृदय करते हैं। और अल्लाह क्षमा करने वाला, सहनशील है।

तलाक का ज़िक्र

(226) जो लोग अपनी पत्नियों से न मिलने की सौगन्ध खा लें, उनके लिए चार महीने तक का अवसर है। फिर यदि वह (अपनी पत्नी की ओर) लौट आएँ तो अल्लाह क्षमा कर देने वाला, दयावान है।
(227) और यदि वह तलाक का निर्णय करें तो वास्तव में अल्लाह सुनने वाला, जानने वाला है।
(228) और तलाक दी हुई औरतें अपने आप को तीन हैज़ (मासिक धर्म) तक रोके रखें, और यदि वह अल्लाह पर और परलोक के दिन पर विश्वास रखती हैं तो उनके लिए वैध नहीं कि वह उस चीज़ को छिपायें जो अल्लाह ने पैदा किया है उनके पेट में। और इस अवधि में उनके पति उनको फिर लौटा लेने का अधिकार रखते हैं, यदि वह संबन्धी को ठीक करना चाहे। और उन औरतों के लिए नियमानुसार उसी तरह अधिकार हैं जिस प्रकार नियम के अनुसार उन पर दायित्व हैं। और मर्दों को उनपर एक दर्जा प्राप्त है। और अल्लाह शक्तिशाली है और तत्वदर्शी है।
(229) तलाक दो बार है। फिर या तो प्रचलन के अनुसार, रख लेना है या अच्छे ढंग से विदा कर देना। और तुम्हारे लिए यह बात वैध नहीं कि तुमने जो कुछ उन औरतों को दिया है, उसमें से कुछ ले लो, परन्तु यह कि दोनों को डर हो कि वह अल्लाह की सीमाओं पर जमे न रह सकेंगे। फिर यदि तुमको यह डर हो कि दोनों अल्लाह की सीमाओं पर जमे न रह सकेंगे, तो पत्नी पर कुछ गुनाह नहीं कि उस सम्पत्ति में से पति को कुछ मुआवज़ा देकर उससे अलग हो जाए। यह अल्लाह की बांधी हुई सीमाएँ हैं, तो उनसे बाहर न निकलो। और जो व्यक्ति अल्लाह की सीमाओं का उल्लघन करे तो वही अत्याचारी हैं।
(230) फिर यदि वह उसको तलाक दे दें तो उसके बाद वह औरत उसके लिए हलाल (वैध) नहीं जब तक कि वह किसी दूसरे मर्द से निकाह न करे। फिर यदि वह मर्द उसको तलाक दे दे, तब गुनाह नहीं उन दोनों पर कि फिर मिल जायें, शर्त यह है कि उन्हें अल्लाह की सीमाओं पर जमे रहने की आशा हो। यह अल्लाह के दिये हुए नियम हैं जिनको वह बयान कर रहा है उन लोगों के लिए जो बुधेि वाले हैं।
(231) और जब तुम औरतों को तलाक दे दो और वह अपनी इद्दत (तीन महीने दस दिन या प्रसव तक की अवधि) तक पहुँच जाये तो उनको या तो नियम के अनुसार, रख लो या उनको नियम के अनुसार विदा कर दो। और कष्ट पहुंचाने के उद्देश्य से न रोको, कि उन पर अत्याचार करो। और जो ऐसा करेगा उस बुरा किया। और अल्लाह की आयतों को खेल न बनाओ। और याद करो अपने ऊपर अल्लाह की कृपा को और इस किताब और हिक्मत को जो उसने तुम्हारी नसीहत के लिए अवतरित किया है। और अल्लाह से इरो और जान लो कि अल्लाह हर चीज़ को जानने वाला है।
(232) और जब तुम अपनी औरतों को तलाक़ दे दो और वह अपनी इद्दत पूरी कर लें तो उनको न रोको कि वह अपने पतियों से निकाह कर लें। जबकि वह नियम के अनुसार, आपस में सहमत हो जायें। यह नसीहत की जाती है उस व्यक्ति को जो तुममें से अल्लाह और परलोक के दिन पर विश्वास रखता हो, यह तुम्हारे लिए अधिक पवित्र और सुथरा नियम है। और अल्लाह सनता है. तम नहीं जानते।

बच्चे को दूध पिलाने का हुक्म

(233) और माएँ अपने बच्चों को परे दो वर्ष तक द्ध पिलायें, उन लोगों के लिए जो पूरी अवधि तक दूध पिलाना चाहते हो। और जिसका बच्चा है, उसका दायित्व है उन माँओं के खाने और पहनने का रीति के अनुसार। किसी को आदेश नहीं दिया जाता, परन्तु उसकी क्षमता के अनुसार। न किसी माँ को उसके बच्चे के कारण कष्ट दिया जाये और न किसी पिता को उसके बच्चे के कारण। और यही दायित्व उत्तराधिकारी (वारिस) पर भी है। फिर यदि दोनों पारस्परिक सहमति और परामर्श से दूध छुड़ाना चाहें तो दोनों पर कोई पाप नहीं, और यदि तुम चाहो कि अपने बच्चों को किसी और से दूध पिलवाओ, तब भी तुम पर कोई पाप नहीं, शर्त यह है कि तुम रीति के अनुसार, वह अदा कर दो जो तुमने उनको देना तय किया था। और अल्लाह से इरो और जान लो कि जो कुछ तुम करते हो. अल्लाह उसको देख रहा है।

शौहर की मौत के बाद इद्दत का हुक्म

(234) और तुममें से जो लोग मृत्यु पा जायें और पत्नियों छोड़ जायें वह पत्नियाँ अपने आप को चार महीने दस दिन तक प्रतीक्षा में रखें। फिर जब वह अपनी इद्दत (अवधि) को पहुँचे तो जो कुछ वह अपने आप के बारे में रीति के अनुसार करें, उसका तुम पर कोई गुनाह नहीं। और अल्लाह तुम्हारे कर्मों से पूर्णतः भिज्ञ है।
(235) और तुम्हारे लिए इस बात में कोई गुनाह नहीं कि उन औरतों को (विवाह का) संदेश देने में कोई बात संकेत के रूप में कहो या उसको अपने दिल में छिपाये रखो। अल्लाह को ज्ञात है कि तुम अवश्य उनका ध्यान करोगे। परन्तु छिपकर उनसे वादे न करो, तुम उनसे सामन्य रीति के अनुसार कोई बात कह सकते हो। और विवाह का इरादा उस समय तक न करो जब तक निर्धारित अवधि (इदत) अपनी पूर्णता को न पहुँच जाये। और जान लो कि अल्लाह जानता है जो कुछ तुम्हारे दिलों में है। अतः उससे इरो और जान लो कि अल्लाह क्षमा करने वाला, सहनशील है।

महर का ज़िक्र

(236) यदि तुम औरतों को ऐसी स्थिति में तलाक़ दो कि उनको न तुमने हाथ लगाया है और न उनके लिए कुछ महर निर्धारित किया है तो उनके महर के सम्बन्ध में तुम पर कोई पकड़ नहीं। हाँ उनको रीति के अनुसार, कुछ सामान दे दो, क्षमता रखने वाले पर अपनी हैसियत के अनुसार है और क्षमता न रखने वाले पर अपनी हैसियत के अनुसार, यह भलाई करने वालों पर अनिवार्य है।
(237) और यदि तुम उनको तलाक़ दो इससे पहले कि उनको हाथ लगाओ और तुम उनके लिए कुछ महर भी निर्धारित कर चुके थे तो जितना महर तुमने निर्धारित किया हो, उसका आधा महर अदा कर दो। सिवाय यह कि वह माफ कर दे या वह महर माफ कर दे जिसके हाथ में निकाह की गाँठ है। और तुम्हारा माफ़ कर देना परहेज़गारी से अधिक निकट है। और आपस में उपकार करना न भूलो। जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसको देख रहा है।
(238) पाबन्दी करो नमाज़ों की और पाबन्दी करो बीच की नमाज़ की
(239) और खड़े हो अल्लाह के सामने नम्र बने हुए। यदि तुमको सन्देह (डर) हो तो पैदल या सवारी पर नमाज़ पढ़ लो। फिर जब शान्ति की स्थिति आ जाये तो अल्लाह को उस ढंग से याद करो जो उसने तुमको सिखाया है, जिसको तुम नहीं जानते थे।
(240) और तुममें से जो लोग मृत्यु पा जायें और पत्नियाँ छोड़ रहे हों, वह अपनी पत्नियों के सम्बन्ध में वसीयत कर दें कि एक वर्ष तक उनको घर में रखकर खर्च दिया जाये। फिर यदि वह स्वयं घर छोड़ दें तो जो कुछ वह अपने सम्बन्ध में रीति के अनुसार करें, उसका तुम पर कोई आरोप नहीं। अल्लाह शक्तिवान है, तत्वदी है।
(241) और तलाक दी हुई औरतों को भी रीति के अनुसार खर्च देना है, यह अनिवार्य है परहेज़गारों के लिए।
(242) इस तरह अल्लाह तुम्हारे लिए अपने आदेश का स्पष्ट वर्णन करता है, ताकि तुम समझो।
(243) क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जो अपने घरों से मौत के डर से भाग खड़े हुए, और वह हज़ारों की संख्या में थे। तो अल्लाह ने उनसे कहा कि मर जाओ। फिर अल्लाह ने उनको जीवित किया। निस्सन्देह, अल्लाह लोगों पर दया करने वाला है। परन्तु अधिकतर लोग आभार व्यक्त नहीं करते।
(244) और अल्लाह के मार्ग में लड़ो और जान लो कि अल्लाह सुनने वाला, जानने वाला है।
(245) कौन है जो अल्लाह को कर्ज़-ए हसन (बेहतरीन ऋण) दे कि अल्लाह उसको बढ़ा कर उसके लिए कई गुना कर दे। अल्लाह ही तंगी भी पैदा करता है और सम्पन्नता भी। और तुम सब उसी की ओर लौटाये जाओगे।

तालूत का ज़िक्र

(246) क्या तुमने मूसा के बाद इस्राईल की सन्तान के सरदारों को नहीं देखा, जबकि उन्होंने अपने पैगम्बर से कहा कि हमारे लिए एक राजा नियुक्त कर दीजिए, ताकि हम अल्लाह के मार्ग में लड़ें। पैगम्बर ने उत्तर दिया: ऐसा न हो कि तुमको युद्ध का आदेश दिया जाये तब तुम न लड़ो। उन्होंने कहा यह कैसे हो सकता है कि हम न लड़ें अल्लाह के मार्ग में, हालाँकि हमको अपने घरों से निकाला गया है और हमको अपने बच्चों से अलग किया गया है। फिर जब उनको युद्ध का आदेश हुआ तो थोड़े लोगों के सिवा सब उससे फिर गये। और अल्लाह अत्याचारियों को भली-भांति जानता है।
(247) और उनके पैगम्बर ने उनसे कहा. अल्लाह ने तालूत को तुम्हारे लिए राजा नियुक्त किया है। उन्होंने कहा कि उसको हमारे ऊपर राज कैसे मिल सकता है, हालांकि उसकी तुलना में, हम राज करने के अधिक हकदार हैं, और उसको आधिक दौलत भी प्राप्त नहीं। पैग़म्बर ने कहाः अल्लाह ने तुम्हारी तुलना में तालूत को चुना है और ज्ञान और शारीरिक बल मैं उसको प्रधानता दी है। और अल्लाह अपनी सत्ता जिसको चाहता है देता है। अल्लाह बहुत व्यापकता रखने वाला, जानने वाला
(248) और उनके पैराम्बर ने उनसे कहा कि तालूत के राजा होने कि पहिचान यह है कि तुम्हारे पास वह सन्दूक आ जायेगा जिसमें तुम्हारे पालनहार की ओर से तुम्हारे लिए सान्त्वना है और उसमें मूसा और हारुन के अनुयायियों को छोड़ी हुई स्मृतियाँ हैं। इस सन्दूक को फ़रिश्ते उठाये हुए होंगे। उसमें तुम्हारे लिए बड़ी निशानी है, यदि तुम विश्वास रखने वाले हो।
(249) फिर जब तालूत सेनाओं को लेकर चला तो उसने कहाः अल्लाह एक नदी के माध्यम से तुम्हारी परीक्षा लेने वाला है। अतः जिसने उसका पानी पिया, वह मेरा साथी नहीं और जिसने उसको न चखा, वह मेरा साथी है। परन्तु यह कि कोई अपने हाथ से एक चुल्लू भर ले। तो उन्होंने उसमें से भरपूर पानी पिया सिवाय थोड़े लोगों के। फिर जब तालूत और जो उसके साथ ईमान पर जमे रहे थे, नदी पार कर चुके तो वह लोग बोले कि आज हमको जालत और उसकी सेनाओं से लड़ने की शक्ति नहीं। जो लोग यह जानते थे कि वह अल्लाह से मिलने वाले हैं, उन्होंने कहा कि कितने ही छोटे समूह अल्लाह के आदेश से बड़े समूह पर वर्चस्व प्राप्त कर चुके हैं। और अल्लाह जमे रहने वालों के साथ है।
(250) और जब जालूत और उसकी सेनाओं से उनका सामना हुआ तो उन्होंने कहा: ऐ हमारे पालनहार, हमारे ऊपर धैर्य उंडेल दे और हमारे कदमों को जमा दे और इन अवज्ञाकारियों के विरुद्ध हमारी सहायता कर।
(251) फिर उन्होंने अल्लाह के आदेश से उनको पराजित किया। और दाऊद ने जालूत का वध कर दिया। और अल्लाह ने दाऊद को राज और विवेक प्रदान किया और जिन चीज़ों का चाहा, ज्ञान प्रदान किया। और यदि अल्लाह कुछ लोगों को कुछ लोगों से न बचाता रहे तो पृथ्वी बिगाड़ से भर जाये। परन्तु अल्लाह संसार वालों पर बहुत कृपा करने वाला है।
(252) यह अल्लाह की आयते हैं जो हम तुमको सुनाते हैं ठीक-ठीक। और निस्सन्देह तू पैराम्बरों में से है।
(253) उन पैगम्बरों में से हमने कुछ को कुछ पर प्रधानता दी। उनमें से कुछ से अल्लाह ने बात की। और कुछ के दर्जे ऊँचे किए। और हमने मरियम के बेटे इंसा को खुली निशानियाँ प्रदान की और हमने उसकी सहायता की रूहल क़ुदस (पवित्र आत्मा) के द्वारा। अल्लाह यदि चाहता तो उनके बाद वाले स्पष्ट आदेश आ जाने के बाद न लड़ते। परन्तु उन्होंने मतभेद किया। फिर उनमें से कोई ईमान लाया और किसी ने झुठलाया। और यदि अल्लाह चाहता तो वह न लड़ते। परन्तु अल्लाह करता है जो वह चाहता है
(254) ऐ ईमान वालो, खर्च करो उन चीज़ों से जो हमने तुमको दी हैं और उस दिन के आने से पहले जिसमें न लेन-देन है और न मित्रता है और न सिफारिश। और जो अवज्ञाकारी हैं, वहीं है अत्याचार करने वाले।
(255) अल्लाह उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं। वह जीवित है, संपूर्ण जगत का संभालने वाला है, उसको न ऊँघ आती है न निद्रा। उसी का है जो कुछ आकाश में और पृथ्वी में है। कौन है जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना सिफारिश कर सके। वह जानता है जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे है। और वह अल्लाह के ज्ञान में से किसी चीज़ को घेरे (परिधि) में नहीं ले सकते, परन्तु जो वह चाहे। उसकी सत्ता आकाश और पृथ्वी पर छायी हुई है। वह थकता नहीं उनके थामने से। और वही है उच्च प्रतिष्ठा का मालिक, महान।
(256) दीन (धर्म) के सम्बन्ध में कोई ज़बरदस्ती नहीं। सन्मार्ग, पशष्टता से अलग हो चुका है। अतः जो व्यक्ति, शैतान को झुठलाये और ईमान लाये, उसने ऐसा ठोस सहारा पकड़ लिया जो टूटने वाला नहीं। और अल्लाह सुनने वाला जानने वाला है।
(257) अल्लाह संरक्षक है ईमान वालों का, वह उनको अंधेरों से निकाल कर उजाले की और लाता है. और जिन लोगों ने झुठलाया, उनके मित्र शैतान हैं, वह उनको उजाले से निकालकर अँधेरों की ओर ले जाते हैं। यह आग में जाने वाले लोग हैं, वह उसमें सदैव रहेंगे।

इब्राहीम (अ०) का ज़िक्र

(258) क्या तुमने उसको नहीं देखा जिसने इब्राहीम से उसके पालनहार के सम्बन्ध में तर्क- वितर्क किया, क्योंकि अल्लाह ने उसको सत्ता प्रदान की थी। जब इब्राहीम ने कहा कि मेरा पालनहार वह है जो जीवित करता है और मृत्यु देता है। वह बोला कि मैं भी जीवन देता हूँ और मृत्यु देता हूँ। इब्राहीम ने कहा कि अल्लाह सूरज को पूरब से निकालता है, तुम उसको पश्चिम से निकाल दो। तब वह अवज्ञाकारी स्तब्ध (हक्का-बक्का) रह गया। और अल्लाह अत्याचारियों को मार्ग नहीं दिखाता।
(259) अथवा जैसे वह व्यक्ति जो एक बस्ती से गुज़रा। और वह बस्ती अपनी छतों पर गिरी हई थी। उसने कहा: इसके मर जाने के बाद अल्लाह इस बस्ती को पुनः किस प्रकार जीवित करेगा। फिर अल्लाह ने उस को सौ वर्ष तक के लिए मत्य इसल दी। फिर उसको पुनः जीवित किया। अल्लाह ने पूछा तुम कितनी देर इस स्थिति में रहे। उसने कहाः एक दिन अथवा एक दिन से कुछ कम। अल्लाह ने कहा नहीं बल्कि तुम सौ वर्ष इस स्थिति में रहे हो। अब तुम अपने खाने-पीने की वस्तुओं को देखो कि वह सड़ी नहीं हैं और अपने गधे को देखो। और ताकि हम तुमको लोगों के लिए एक निशानी बना दें। और हइड़ियों की और देखो, किस तरह हम उनका दाँचा खड़ा करते हैं, फिर उनपर माँस चढ़ाते हैं। अतः जब उस पर स्पष्ट हो गया तो उसने कहा मैं जानता हूँ कि निस्सन्देह, अल्लाह हर बात की क्षमता रखता है।
(260) और जब इब्राहीम ने कहा कि ऐ मेरे पालनहार, मुझको दिखा दे कि तू मुर्दों को किस प्रकार जीवित करेगा। अल्लाह ने कहा, क्या तुमको विश्वास नहीं। इब्राहीम ने कहा क्यों नहीं, परन्तु इसलिए कि मेरे दिल को सन्तुष्टि मिल जाये। फ़रमायाः चार पक्षी लो और उनको अपने आप से हिला लो। फिर उनमें से हर एक को अलग-अलग पहाड़ी पर रख दो, फिर उनको पुकारो। वह तुम्हारे पास दौड़ते हए चले आयेंगे। और जान लो कि अल्लाह प्रभुत्वशाली और तत्वज्ञ है।

सदके का ज़िक्र

(261) जो लोग अपनी सम्पत्ति अल्लाह के मार्ग में खर्च करते हैं, उनका उदाहरण ऐसा है जैसे एक दाना हो जिससे सात बालियों पैदा हों. हर बाली में सौ दाने हों। और अल्लाह बढ़ाता है जिसके लिए चाहता है। और अल्लाह बड़ा समझवाला, जानने वाला है।
(262) जो लोग अपनी पूँजी अल्लाह के मार्ग में खर्च करते हैं, फिर वह खर्च करने के बाद न तो एहसान जताते हैं और न कष्ट पहुँचाते हैं, उनके लिए उनके पालनहार के पास बदला है। और उनके लिए न कोई भय है और न वह दुखी हाँगे।
(263) उचित बात कह देना और क्षमा कर देना उस दान से अधिक अच्छा है जिसके पीछे कष्ट देना हो। और अल्लाह निस्पक्ष है सहनशील है।
(264) ऐ ईमान वालो, एहसान जता कर और कष्ट पहुँचा कर अपने दान को नष्ट न करो, जिस तरह वह व्यक्ति जो अपनी पूंजी दिखावे के लिए खर्च करता है और वह अल्लाह पर और परलोक के दिन पर विश्वास नहीं रखता। अतः उसका उदाहरण ऐसा है जैसे एक चट्टान हो जिस पर कुछ मिट्टी हो, फिर उस पर मूसलाधार वर्षा हो और वह उसको पूर्णतः साफ कर दे। ऐसे लोगों को अपनी कमाई कुछ भी हाथ न लगेगी। और अल्लाह अवज्ञाकारियों को मार्ग नहीं दिखाता।
(265) प्रन्तु जो लोग अपनी पूँजी को अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए और अपने आप में स्थिरता लाने के लिए पूरे मन से अल्लाह के मार्ग में खर्च करते हैं उनका उदाहरण एक बाग के समान है जो ऊँचाई पर हो। उस पर मूसलाधार वर्षा हुई तो वह दुगुना फल लाया। और यदि अधिक वर्षा न हो तो हल्की फुहार भी पर्याप्त है। और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसको देख रहा है।
(266) क्या तुममें से कोई यह पसन्द करता है कि उसके पास खजूरों और अंगूरों का एक बाग हो, उसके नीचे नहरें बह रही हों। उसमें उसके लिए हर प्रकार के फल हो। और वह बूढा हो जाये और उसके बच्चे अभी कमज़ोर हो। तब उस बाग़ पर एक चक्रवात आये जिसमें आग हो। फिर वह बाग जल जाये। अल्लाह इस तरह तुम्हारे लिए खोल कर निशानियाँ बयान करता है, ताकि तुम चिंतन करो।
(267) ऐ ईमान वालो, खर्च करो सबसे अच्छी चीज़ को, अपनी कमाई में से और उसमें से जो हमने तुम्हारे लिए भूमि में से पैदा किया है। और बेकार चीज़ का इरादा न करो कि उसमें से खर्च करो। हालाँकि तुम स्वंय भी इसको लेने वाले नहीं सिवाय इसके कि अनदेखी कर जाओ। और जान लो कि अल्लाह निस्पृह है, खूबियों वाला है।
(268) शैतान तुमको निर्धनता से डराता है और अश्लीलता का आदेश देता है और अल्लाह वादा करता है अपनी कृपा का और क्षमा का और अल्लाह व्यापकता वाला है और जानने वाला है।
(269) अल्लाह जिसको चाहता है हिक्मत (विवेक) दे देता है और जिसको हिक्मत मिली, उसको बड़ी दौलत मिल गयी। और मार्गदर्शन वही प्राप्त करते हैं जो बुद्धि वाले हैं।
(270) और तुम जो खर्च करते हो और जो मन्नत मानते हो, उसको अल्लाह जानता है। और अत्याचारियों का कोई सहायक नहीं।
(271) यदि तुम अपने दान प्रकट रूप में दो तब भी अच्छा है और यदि तुम उन्हें छिपाकर निर्धन लोगों को दो तो यह तुम्हारे लिए अधिक उपयुक्त है। और अल्लाह तुम्हारे पापों को दूर कर देगा और अल्लाह तम्हारे कमाँ से भिज्ञ है।
(272) उनको सन्मार्ग पर लाना तुम्हारा दायित्व नहीं, बल्कि अल्लाह जिसको चाहता है सन्मार्ग प्रदान करता है। और जो धन तुम खर्च करोगे, अपने ही लिए खर्च करोगे। और तुम न खर्च करों परन्तु अल्लाह की प्रसन्नता के लिए। और तुम जो धन खर्च करोगे, वह तुमको पूरा कर दिया जायेगा और तुम्हारे लिए उसमें कमी न की जायेगी।
(273) प्राय दान उन वंचितों के लिए है जो अल्लाह के मार्ग में घिर गये हों कि अपनी व्यक्तिगत जीविका के लिए पृथ्वी में दौड़ धूप नहीं कर सकते। अनभिज्ञ व्यक्ति उनको धनवान समझता है, उनके न माँगने के कारण। तुम उनको उनके रुप से पहचान सकते हो। वह लोगों से लिपट कर नहीं माँगते। और जो धन तुम खचं करोगे, वह अल्लाह को ज्ञात है।
(274) जो लोग अपनी पूंजी को रात और दिन, छिपेपे और खुले खर्च करते हैं, उनके लिए उनके पालनहार के पास बदला है। और उनके लिए न भय है और न वह दुखी होंगे।

ब्याज का ज़िक्र

(275) जो लोग व्याज खाते हैं, वह कियामत में न उठेंगे परन्तु उस व्यक्ति की तरह जिसको शैतान ने स्पर्श करके बावला बना दिया हो। यह इसलिए कि उन्होंने कहा कि व्यापार करना भी वैसा ही है जैसा व्याज लेना। जबकि अल्लाह ने व्यापार को हलाल (वैध) ठहराया है और व्याज को हराम (अवैध) किया है, फिर जिस व्यक्ति के पास उसके पालनहार की ओर से नसीहत (चेतावनी) पहुँची और वह रुक गया तो जो कुछ वह ले चुका, वह उसके लिए है। और उसका मामला अल्लाह के हवाले है। और जो व्यक्ति फिर वही करे तो वही लोग नरक वाले हैं, वह उसमें सदैव रहेंगे।
(276) अल्लाह व्याज को घटाता है और दान को बढ़ाता है। और अल्लाह पसन्द नहीं करता कृतघ्नों को, पापियों को।
(277) निस्सन्देह, जो लोग ईमान लाये और भले कर्म किए और नमाज़ की पाबन्दी की और जकात अदा की, उनके लिए उनका बदला है उनके पालनहार के पास। उनके लिए न कोई भय है और न वह दुखी होंगे।

कर्ज की अदाएगी का ज़िक्र

(278) ऐ ईमान वालो, अल्लाह से डरो और जो व्याज बाक़ी रह गया है, उसको छोड़ दो, यदि तुम मोमिन (अल्लाह में आस्था रखने वाले) हो।
(279) यदि तुम ऐसा नहीं करते तो सावधान हो जाओ अल्लाह और उसके रसूल (सन्देष्टा) कि ओर से युद्ध की घोषणा है। और यदि तुम तौबा कर लो तो मूल धन के तुम अधिकारी हो, न तुम किसी पर अन्याय करों और न तुम पर अन्याय किया जाये।
(280) और यदि एक व्यक्ति विपन्नता वाला है तो उसको सम्पन्नता आने तक समय दो। और यदि मॉफ कर दो तो यह तुम्हारे लिए अधिक बेहतर है, यदि तुम समझो।
(281) और उस दिन से डरो जिस दिन तुम अल्लाह की ओर लौटाये जाओगे। फिर प्रत्येक व्यक्ति को उसका किया हुआ पूरा-पूरा बदला मिल जायेगा और उन पर अन्याय न होगा।
(282) ऐ ईमान वालो, यदि तुम किसी निर्धारित अवधि के लिए उधार का लेन-देन करो तो उसको लिख लिया करो। और उसको लिखे तुममे से कोई लिखने वाला न्याय के साथ। और लिखने वाला लिखने से मना न करे, जैसा अल्लाह ने उसको सिखाया, उसी तरह उसको चाहिए कि वह लिख दे। और वह व्यक्ति लिखवाये जिस पर दायित्व आता है। और वह डरे अल्लाह से जो उसका पालनहार है और वह उसमें कोई कमी न करे। और यदि वह व्यक्ति जिसपर दायित्व आता है, मूर्ख हो या दुर्बल हो या स्वयं लिखवाने की क्षमता न रखता हो तो चाहिए कि उसका अभिभावक न्याय के साथ लिखवा दे, और अपने मदों में से दो व्यक्तियों को गवाह बना लो। और यदि दो मर्द न हों तो फिर एक मदं और दो औरतें, उन लोगों में से जिनको तुम पसन्द करते हो। ताकि यदि एक औरत भूल जाये तो दूसरी औरत उसको याद दिला दे। और गवाह मना न करें जब वह बुलाये जायें। और लेन-देन छोटा हो या बड़ा, अवधि निर्धारण के साथ उसको लिखने में आलस्य न करो। यह लिख लेना अल्लाह के निकट अधिक न्याय संगत है और गवाही को अधिक विश्वसनीय रखने वाला है और निकटतम अनुमान है कि तुम सन्देह में न पड़ो। लेकिन यदि कोई लेन-देन हाथ के हाथ हो जैसा कि तुम परस्पर किया करते हो तो तुम पर कोई आरोप नहीं कि तुम उसको न लिखो। परन्तु जब तुम सौदा करो तो गवाह बना लिया करो। और किसी लिखने वाले को या गवाह को कष्ट न पहुँचाया जाये। और यदि ऐसा करोगे तो यह तुम्हारे लिए बड़े पाप की बात होगी। और अल्लाह से डरों, अल्लाह तुमको सिखाता है और अल्लाह हर चीज़ का जानने वाला है।
(283) और यदि तुम यात्रा पर हो और कोई लिखने वाला न पाओ तो गिरवी रखने की चीजें गिरवी रखकर मामला किया जाये। और यदि एक व्यक्ति दूसरे पर विश्वास करता हो तो चाहिए कि जिस पर विश्वास किया गया हो, वह विश्वास को पूरा करे। और अल्लाह से डरे जो उसका पालानहार है और गवाही को न छिपाओ और जो व्यक्ति छिपायेगा उसका दिल अपराधी हो जायेगा। और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसको जानने वाला है।
(284) अल्लाह ही का है जो कुछ आकारों में है और जो कुछ पृथ्वी में है। तुम अपने दिल की बातों को प्रकट कर दो या छिपाओ, अल्लाह तुमसे उसका ब्योरा लेगा। फिर वह जिसको चाहेगा क्षमा करेगा और जिसको चाहेगा, दण्ड देगा और अल्लाह हर चीज़ की क्षमता रखता है।
(285) रसूल (सन्देष्टा) ईमान लाया है उस पर जो उसके पालनहार की ओर से उस पर उतरा है। और मुसलमान भी उस पर ईमान लाये हैं। सब ईमान लाये हैं अल्लाह पर और उसके फरिश्तों पर और उसकी किताबों पर और उसके रसूलों (सन्देष्टाओं) पर। हम उसके रसूलों में से किसी के बीच अन्तर नहीं करते और वह कहते हैं कि हमने सुना और माना। हम तुझसे क्षमा चाहते है ऐ हमारे पालनहार। और तेरी ही ओर हमें लौटना है।
(286) अल्लाह किसी पर दायित्व का भार नहीं डालता परन्तु उसकी सहन शक्ति के अनुसार। उसको मिलेगा वही जो उसने कमाया और उस पर पड़ेगा वही जो उसने किया। ऐ हमारे पालनहार हमको न पकड़ यदि हम भूलं या हम ग़लती कर जायें। ऐ हमारे पालनहार हम पर बोझ न डाल जैसा तूने बोझ डाला था हमसे अगला पर। ऐ हमारे पालनहार हमसे वह न उठवा जिसका सामर्थ्य हममें न हो। और हमें क्षमा कर दे और हम पर दया कर। तू हमारा काम बनाने वाला है। अतः अवज्ञाकारियों के मुकाबले में हमारी सहायता कर।

अल्लाह हम सभी को कुरान की तिलावत करने की तौफीक अता फरमाए। और हमसे लिखने में या पढ़ने में जो भी गलती हुई हो उसे माफ फरमाए- आमीन।

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