हुरूफ़े मुक़त्तअत | Harf e Muqattat

कुरान पाक की 29 सूरतों के शुरू में इस तरह के हुरूफ़ होते हैं जैसे सूरह बक़र में अलिफ़-लाम-मीम है। इन्हे “हुरूफ़े मुक़त्तअत” कहते हैं। इनके बारे में सबसे खास बात ये है कि ये हुरूफ़ अल्लाह ताला के राज़ और मुतशाबिहात में से हैं। इनके क्या माना है अल्लाह ताला जानता है। हम इनके हक़ होने पर ईमान लाते हैं। 

(खाजिन, अल बक़्रह, तहतूल आया, 1, 1/20, इत्तेकाने फ़ी उलूम-उल-क़ुरान, अल नू-अ सालिसिल वल अर्बऊन, 2/308)

हुरूफ़े मुक़त्त-आत का इल्म अल्लाह ताला के अलावा किसी और को हासिल है या नहीं?

यहाँ ये एक बात याद रखने लायक है कि अल्लाह ताला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम को भी हुरूफ़े मुक़त्त-आत का इल्म अता फरमाया है।

जैसा कि आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान रहमत उल्लाह अलैहि फरमाते हैं, क़ाज़ी बैदावी रहमत उल्लाह अलैहि “अनवारुत तंजील” में सूरतों कि इबतेदाइयाँ यानि हुरूफ़े मुक़त्तअत के बारे में फरमाते हैं, “ये एक राज़ है जिसे अल्लाह ताला ने अपने इल्म के साथ मखसूस फ़रमाया है।”

तकरीबन ऐसी ही रिवायात खुल्फ़ाए अरबिया और दीगर साहबाए किराम रज़ीo से भी हैं। और मुमकिन है कि साहबाए किराम रज़ीo ने ये मुराद लिया हो कि ये हुरूफ़ अल्लाह ताला और उसके रसूल सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम के दरमियान राज़ ओ नियाज़ हैं। और ये ऐसे इसरार हैं जिन्हें दूसरे को समझाना मकसूद नहीं। 

इमाम खफ्फाजी रह० फरमाते है, “ अनवारुत तंजील के कुछ नुसख़ों में “इस्तासराहु ल्लाहो बिइलमेही” है और इस्तासराहु रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम के लिए है और “बिइलमेही” का ब मकसूद पर दाखिल है।

यानि अल्लाह ताला ने हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम को अपने इल्म से खास करके मू-अज़्ज़िज़ व मुकर्रम फरमाया। यानि हुरूफ़े मुक़त्तअत का इल्म सिर्फ अल्लाह ताला को और उसके रसूल सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम को हासिल है। इस माना को अक्सर मुहक़्किकीन ने पसंद फरमाया है।

( इनायतुल क़ाज़ी, अलबकरह, तहयतुल आया, 1/178)

अल्लामा महमूद आलूसी रह० फरमाते है गालिब ईमान ये है कि हुरूफ़े मुक़त्तअत मुखफ़ी इल्म और सरबसता राज़ हैं जिनके ईदराक से उलमा आजिज़ हैं। जैसा कि हज़रत अबदुल्ला बिन अब्बास रज़ी० ने इरशाद फरमाया और खयालात उस तक पहुँचने से कासिर हैं।

इसी वजह से हज़रत अबूबक्र सिद्दीक रज़ी० ने फरमाया : हर किताब के राज़ होते हैं और कुरान शरीफ के राज़ सूरतों कि इब्तेदा में आने वाले हुरूफ़ हैं।

इमाम साबी रह० फरमाते हैं : ये हुरूफ़ अल्लाह ताला के इसरार हैं तो इनकी खोज न लगाओ क्योंकि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम के बाद इनकी मारफ़त आप सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम के उलूम के वारिस औलियाय किराम को है।

उन्हें इसी बारगाह से मार्फत हासिल होती है और कभी ये हुरूफ़ खुद उन्हे अपना माना बता देते हैं जैसे हुज़ूर सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम के हाथों में कंकरियों ने तसबीह के जरिये कलाम किया था

क़ुरान शरीफ में कुल 13 हुरूफ़े मुक़त्तअत हैं और वो किन-किन सूरतों की शुरुआत में हैं और क़ुरान शरीफ में कितनी बार है इसके एक फेहरिस्त बनायीं है गौर कीजियेगा।

अलिफ़ लाम मीम

सूरह अल बक़र

सूरह आले इमरान

सूरह अनकबूत

सूरह लुक़मान

सूरह रूम

सूरह सजदा

अलिफ़ लाम मीम सॉद

सूरह अल-आराफ़

अलिफ़ लाम रा

सूरह युनूस

सूरह हूद

सूरह यूसुफ़

सूरह अर्र-अद

सूरह इब्राहीम

सूरह अल हिज्र

काफ़ हा या ऐन सॉद

सूरह मरयम

ताहा

ताहा

ता सीम मीम

सूरह अस्शु-अरा

अलक़सस

ता सीन

सूरह अन्नमल

या सीन

सूरह यासीन

सॉद

सॉद

हा मीम

सूरह अल मोमिन

सूरह हामीम अससजदा

सूरह अस्शूरा

सूरह अज़्ज़ुख्रफ

सूरह अददुखान

सूरह अल जासिया

सूरह अल अहकाफ़

क़ाफ़

सूरह क़ाफ़

नून

सूरह अलक़लम

ऐन सीन क़ाफ़

सूरह अस्शूरा

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