क़ुरान में रमज़ान का ज़िक्र। 5 आयतों की दलील के साथ।

रमज़ान वो मुक़द्दस महीना है जिसमें पाक क़ुरान नाज़िल हुआ था। और इसी क़ुरान में रमज़ान का ज़िक्र कई जगह पर आता है। इस महीने का आगाज़ रूह की तलाश, अल्लाह से अक़ीदत और बदलाव के दौर के आग़ाज़ की निशानदेही होने लगती हैं।

रोज़ा रखने के बहुत से फायदे हैं। और सबसे बड़ा सच तो ये है कि रोज़ा रखना भी अल्लाह की इबादत करना है। रोज़ा एक मोमिन के लिए अपने ऊपर क़ाबू रखने का और इच्छा शक्ति कामयाबी की तरफ ले जाने में मदद करता है।

यह कुछ देकर पाने का, कमजोरी को जीत कर मजबूत होने का बहुत ही अच्छा मौका है।

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कई मकामात पर क़ुरान में रमज़ान का ज़िक्र आया क़ुरान मजीद में अल्लाह ताला ने हम मुस्लिमों को रोज़ा रखने का हुक्म दिया है।

सूरह बक़र की आयत 183 से 187 तक रमज़ान मे रोज़े की पाबंदी का ज़िक्र किया है। ये आयतें हज़रत मुहम्मद (स०) को हिजरत के पहले साल में ही नाज़िल हुईं।

रमज़ान और रोज़े से ताल्लुक रखने वाली कुछ आयतें-

ऐ ईमान वालो, तुम पर रोज़ा फर्ज़ (अनिवार्य )किया गया, जिस प्रकार तुमसे पहले के लोगों पर रोज़ा फर्ज़ (अनिवार्य )किया गया था, ताकि तुम परहेजगार (संयमी) बनो

सूरह बक़र आयत 183

गिनती के कुछ दिन। फिर जो कोई तुममें रोगग्रस्त हो या वह यात्रा में हो तो अन्य दिनों में वह संख्या पूरी कर ले। और जिनको ताक़त न हो तो उनके ऊपर एक रोज़े का प्रतिदान एक निर्धन को खाना खिलाना है। जो कोई अतिरिक्त नेकी (पुण्य) करे तो वह उसके लिए अच्छा है। और तुम रोज़ा रखो तो यह तुम्हारे लिए अधिक अच्छा है, यदि तुम समझो।

सूरह बक़र आयत 184

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रमज़ान का महीना जिसमें कुरआन उतारा गया, मार्गदर्शन है लोगों के लिए और प्रत्यक्ष निशानियों मार्ग की, और सत्य और असत्य के बीच निर्णय करने वाला। अतः तुममें से जो कोई इस महीने को पाये, वह इसके रोज़े रखे और जो रोगग्रस्त हो या वह यात्रा पर हो तो वह अन्य दिनों में उसी संख्या पूरी कर ले। अल्लाह तुम्हारे लिए सुविधा चाहता है, वह तुम्हारे साथ सख़्ती करना नहीं चाहता। और (वह चाहता है) कि तुम संख्या पूरी कर लो और अल्लाह की बड़ाई करो इस बात पर कि उसने तुमको मार्ग बताया और ताकि तुम उसके आभार व्यक्त करने वाले बनो।

सूरह बक़र आयत 185

बस इतना ही नहीं क़ुरान में रमज़ान का और भी ज़िक्र है, मजीद आगे पढ़िये।

और जब मेरे उपासक तुमसे मेरे सम्बन्ध में पूढं तो मैं निकट हूँ, पुकारने वाले की पुकार का उत्तर देता हूँ जबकि वह मुझे पुकारता है, तो चाहिए कि वह मेरा आदेश माने और मुझपर विश्वास रखें ताकि वह सन्मार्ग पायें।

सूरह बक़र आयत 186

तुम्हारे लिए रोजे की रात में अपनी पत्नियों के पास जाना वैध किया गया। वह तुम्हारे लिए वस्त्र है और तुम उनके लिए वस्त्र हो। अल्लाह ने जाना कि तुम अपने आप से प्रतिज्ञा भंग कर रहे थे तो उसने तुम पर कृपा की और तुमको क्षमा कर दिया। तो अब तुम उनसे मिलो और चाहो जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दिया है। और खाओ और पिओ यहाँ तक कि सुबह की सफेद धारी काली धारी से अलग स्पष्ट हो जाये, फिर पूरा करो रोज़ा रात तक। और जब तुम मस्जिद में एतेकाफ़ में हो तो पत्नियों से संभोग न करो। यह अल्लाह की बनाई हुई सीमाएँ हैं तो तुम उनके निकट न जाओ। इस तरह अल्लाह अपनी निशानियाँ लोगों के लिए बयान करता है ताकि वह बचें।

सूरह बक़र आयत 186

आख़िरी अल्फ़ाज़

4 खास मौजू हैं जो क़ुरान में रमज़ान के ज़िक्र से जुड़ी आयतों से हमें पता चलता है।

  1. रमज़ान वो मुक़द्दस महीना है जिसमें पाक क़ुरान नाज़िल हुआ था
  2. रोज़ा फर्ज़ है।
  3. अल्लाह के ज़िक्र की अहमियत
  4. दुआ

रमज़ान महीना है मगफिरत का, सदके का, दुआ का, रोज़े का और साथ साथ ही अल्लाह की बहुत सारी बरकतों का। या अल्लाह हम सभी को इस रमज़ान ढेर सारी नेकियाँ हासिल करने के काबिल बना। आमीन।

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