Alhamdu Lillah – सूरह अल फातिहा की पहली 3 आयतों की तफ़सीर

अस्सलाम अलइकूम व रहमत उल्लाह । आज हम सूरह अल फातिहा, अल्हम्दुल्लिल्लाह (Alhamdu Lillah) की तफ़सीर का सिलसिला शुरू करने जा रहे हैं । आप तमामी हजरात से दरख़्वास्त है की इसे सिर्फ खुद तक महदूद न रखें बल्कि अपने दोस्तों और अहबाबों से भी शेयर करें । तो आइए शुरू करते हैं सूरह फ़ातिहा की पहली आयत से । 

सूरह अल फ़ातिहा की पहली आयत है अल्हम्दुलिल्लाह (Alhamdu Lillah) रब्बिल आलमीन। ये आयत दो हिस्सों में बंटी है जिसमे हम अल्लाह रब्बुल इज्ज़त की हम्म्द और शुक्रिया अदा करते हैं जो इस तमाम जहां का रब्ब है । सारी दुनिया के सभी चरिंद परिंद का पालनहार है । 

Alhamdu Lillah – सब तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं 

इस आयत के सीधे माईने हैं की सारी हम्द और तारीफ का मुस्तहक़ अल्लाह है, क्यूंकि अल्लाह ही सब तरह के कमल और जमाल का जरिया है।  

हम्द और शुक्र का तार्रुफ़ 

हम्द के माने है किसी की इख़्तियारी खूबियों की बिना पर उसकी तारीफ करना।  और शुक्र के माने है किसी के एहसानो का ज़बान, दिल, और मन से उसकी ताज़ीम करना। 

हम चूँकि अल्लाह अज्ज व जल्ला की हम्द आम तौर पर उसके एहसानो के पेशे नज़र करते हैं इसलिए अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की हम्द करना उसका शुक्र करना भी है। 

अल्लाह ताला की हम्द-ओ-सना करने के फ़ज़ाइल 

हदीस में अल्लाह ताला की हम्दो सना करने के बहुत से फ़ज़ाइल बयान किये गए हैं। इनमें से 3 फ़ज़ाइल निचे पेश किये गए हैं। 

हज़रत अनस बिन मालिक से रिवायत है, नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया,

” अल्लाह ताला  बन्दे की उस बात से खुश होता है की वो कुछ खाये तो अल्लाह ताला की हम्द करे और कुछ पिए तो अल्लाह ताला की हम्द करे।”

— (मुस्लिम, किताबुल ज़िक्र व दुआ, बाब इस्तेहबाबुल हम्द अल्लाह, हदीस 89(2794))

हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ि० से रिवायत है, हुज़ूर पुरनूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया,

“सबसे अफ़ज़ल ज़िक्र “ला इलाहा इल्लल्लाह” और सबसे अफ़ज़ल दुआ “Alhamdu Lillah है।”

–(इब्ने मजा, किताबुल अदब, बाब फज़लुल हमीदीन,4/248, हदीस 3800)

हज़रत अनस बिन मालिक रज़ि० से रिवायत है, हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया,

” जब अल्ला ताला अपने बन्दे पर कोई नेमत नाज़िल फरमाता है और वो नेमत मिलने पर “Alhamdu Lillah” कहता है तो ये हम्द अल्लाह ताला के नजदीक उस नेमत से ज्यादा अफ़ज़ल है।”

–(इब्ने मजा, किताबुल अदब, बाब फज़लुल हमीदीन,4/250, हदीस 3805)  

हम्द से मुताल्लिक शरई हुक्म 

ख़ुत्बे में हम्द “वाजिब”, खाने के बाद “मुस्तहब”, छींक आने पर “सुन्नत”, हराम के काम के बाद “हराम” और कुछ सूरतो में कुफ़्र है। 

लिल्लाह – अल्लाह के लिए 

“अल्लाह” उस जाते आला का अज़मत वाला नाम है जो तमाम कमाल वाली सिफ़्फ़तों का जरिया है। कुछ मुफ़स्सेरीन ने लिल्लाह लफ्ज़ ला माना भी बयान किया है।

जैसे एक का माना है “इबादत का मुस्तहक़”, दूसरा माना है “वो ज़ात किसकी मार्फ़त में अक़्लें हैरान हैं।” 

तीसरा माना है “वो ज़ात जिसकी बारगाह में शुकून हासिल होता है” और चौथा माना है “वो ज़ात, मुसीबत के वक़्त जिसकी पनाह ली जाये।”

–( बैदावी, अल्फ़ातिहा, 1/32)

रब्बिल आलमीन – सारे जहाँ वालों का मालिक 

लफ्ज़ “रब्ब” के कई माना है, जैसे सय्यद, मालिक, माबूद, साबित, मुसल्लह. अल्लाह ताला के अलावा हर मौजूद चीज को आलम कहते है और इसमें तमाम मख़लूक़ात शामिल हैं। 

अर्रहमानिर रहीम – निहायत मेहरबान व रहम वाला (आयत नंबर 2)

आयत नंबर दो में अल्लाह ताला की रहमत और उसके मेहरबान होने का ज़िक्र किया गया है। 

अर-रहमान – बहुत मेहरबान

रहमान और रहीम अल्लाह ताला के दो सिफई नाम हैं। रहमान के माना है, नेमतें अता करने वाली वो ज़ात जो बहुत ज्यादा मेहरबान हो। रहीम के माना है, बहुत रहमत फरमाने वाला। 

यद् रहे हक़ीक़ी तौर पर नेमत अता करने वाली ज़ात अल्लाह ताला के अकेली ज़ात  जो अपनी नेमत का बदला नहीं चाहती। 

हर छोटी-बड़ी, ज़ाहिरी-बातिनी, जिस्मानी-रूहानी सभी नेमत सिर्फ अल्लाह ताला ही अता फरमाता है। 

दुनिया में जिस शख्स को जो नेमत पहुँचती है वो अल्लाह ताला की रहमत से ही पहुँचती है।क्योंकि किसी के दिल में रहम का जज़्बा करने पर क़ुदरत देना, नेमत को वजूद में लाना।

दूसरे का इस नेमत से फायदा उठाना, और फायदा उठाने के एज़ा की सलामती अत करना, ये सब अल्लाह ताला के तरफ से ही है। 

अल्लाह ताला की वसी-ए-रहमत और बन्दों की गुनाहो से बेबाकी 

बेशक अल्लाह ताला बेशुमार रहमतो का ज़रिया है और अपनी रहमत अपने बन्दों में लुटाता भी है।मगर बन्दों को अल्लाह की इस वसी-ए-रहमत से बेबाक नहीं होना चाहिए।  अल्लाह ताला गुनाहों का भरपूर अजाब भी देता है। 

अबु अब्दुल्लाह मुहम्मद बिन अहमद क़रतबि फरमाते हैं, अल्लाह ताला ने रब्बिल आलमीन के बाद अपने दो औसाफ़, रहमान और रहीम बयान फरमाए हैं। 

इसकी वजह यह है की जब अल्लाह ताला ने ये फ़रमाया की वह रब्बिल आलमीन है तो इससे (सुनने और पढ़ने वाले के दिल में अल्लाह ताला की अज़मत की वजह से उसका) खौफ हुआ तो उसके साथ ही अल्लाह ताला के के दो औसाफ़ रहमान और रहीम ज़िक्र किये गए।

क़ुरान मजीद में और मक़ामात पर अल्लाह ताला की रहमत और उसके अजाब दोनों वाज़िह तौर पर एक साथ ज़िक्र किया गया है।  चुनाँचे अल्लाह ताला इरशाद फरमाता है… 

Surah hajra ayat 49-50
सूरह हज्र आयत 49-50

तर्जुमा कंज़ुल इरफ़ान – मेरे बन्दों को खबर करदो की बेशक मैं ही बख्शने वाला मेहरबान हूँ।  और बेशक मेरा ही अजाब सबसे दर्दनाक अजाब है। 

Surah Momin Ayat 3
सूरह मोमिन आयत 3

तर्जुमा कंज़ुल इरफ़ान – गुनाह बख्शने वाला और तौबा क़ुबूल करने वाला, सख़्त अजाब देने वाला, बड़े इनाम देने वाला, इस के सिवा कोई माबूद नहीं, इसी की तरफ फिरना है। 

हज़रत अबु हुरैरा रज़ि० से रिवायत है, रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया,

“अगर मोमिन जान लेता की अल्लाह ताला पास कितना अजब है तो कोई उसकी जन्नत की उम्मीद न करता।  अगर काफिर ये जान लेता की अल्लाह ताला के पास कितनी रहमत है तो उसकी जन्नत से कोई नाउम्मीद न होता।”

लिहाज़ा हर मुस्लमान को चाहिए की वो उम्मीद और खौफ के दरमियान रहे और अल्लाह ताला की वुस-अत देख कर गुनाहों पर बेबाक न हो। और न ही अजाब की सिद्दत देखकर उसकी रहमत से मायूस हो। 

किसी को रहमान और रहीम कहने के बारे में शरई हुक्म 

अल्लाह ताला के सिवा किसी और को रहमान कहना जायज़ नहीं जबकि रहीम कहा जा सकता है। 

जैसे क़ुरान मजीद में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने अपने हबीब को भी रहीम फ़रमाया है, इसलिए इरशाद फ़रमाया है। —

Surah tauba Ayat 128
सूरह तौबा आयत 128

तर्जुमा कंज़ुल इरफ़ान – बेशक तुम्हारे पास तुममें से वो अज़ीम रसूल तारीफ लाएंगे जिन पर तुम्हारामशक़्क़त में पड़ना भरी गुजरता है। वो तम्हारी भलाई के लिए निहायत चाहने वाले मुसलमानो पर बहुत मेहरबान है। रहमत फरमाने वाला है। 

मालिक यौमिद्दीन – जज़ा के दिन का मालिक (आयत नंबर 3)

जज़ा के दिन से मुराद है क़यामत का दिन।  इस दिन नेक आमाल करने वाले मोमिनों को सवाब मिलेगा और गुनहगारों और काफिरों को सजा मिलेगी।

मालिक उसे कहते है जो अपनी मालकियत में मौजूद सभी चीजों में जैसे चाहे तसर्रुफ़ करे।  अल्लाह ताला अगरचे दुनिया व आख़िरत दोनों का मालिक है लेकिन यहाँ पर क़यामत के दिन को बतौरे  ख़ास इस लिए ज़िक्र किया ताकि उस दिन अहमियत दिल में बैठे। 

दुनिया के मुक़ाबले आख़िरत में अल्लाह ताला के मालिक होने का ज़हूर ज्यादा होगा क्योंकि उसी दिन किसी के पास ज़ाहिरी सल्तनत न होगी। जो अल्लाह ताला ने दुनिया में आता फ़रमायी थी इसलिए यहाँ पर खास तौर पर क़यामत के दिन की मालकियत का ज़िक्र किया गया है। 

मैं आप लोगो से एक बार और दरख्वास्त करता हूँ की इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और लोगोन तक दीं की रोशनी पहुंचाए।  

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