Hudallil Muttaqeen – सूरह अल बक़्रह आयत 1 और 2 की तफ़सीर

Hudallil Muttaqeen फरमाया है अल्लाह ताला ने सूरह अल बक़्रह की दूसरी ही आयत हैं। hudallil muttaqeen के माना होते हैं, हिदायत है तकवाकारों को।

मुत्तकी कौन होता है? मुत्तकी वो इंसान होता है जो अल्लाह पे भरोसा करे और उससे डरे। तो यूं कह सकते हैं कि hudallil muttaqeen के माना हो सकता है, हिदायत है डरने आलों के लिए।

अस्सलाम अलैकुम व रहमत उल्लाह। मेरे प्यारे इस्लामी भाइयों, सूरह अल बक़्रह की तफ़सीर के इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आज हम इस सूरह की पहली दो आयतों के तफ़सीर का तज़किरा करेंगे।

इससे पहले हमने सूरह अल बक़्रह के बारे में जाना कि अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने सूरह अल बक़्रह को क्यों नाज़िल फरमाया। हमने जाना कि अल्लाह ताला ने अपनी इस सूरह में इन्सानों के लिए कितनी हिदायतें बख़्शी हैं।

इन सारी हिदायतों को आगे हम थोड़ा तरतीब से समझेंगे इस तफ़सीरुल कुरान के सबक से। तो आइये बिस्मिल्लाह के साथ शुरू करते हैं।

सूरह अल बक़्रह आयत 1 और 2

सूरह अल बक़्रह आयत 1 और 2 में अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने कुरान के एक बुलंद दर्जा किताब होने का ज़िक्र किया है। और अल्लाह ताला ने बताया है कि कुरान शरीफ में किसी भी तरह कि शक व शुबा कि गुंजाइश नहीं है।

इस आयत में अल्लाह ताला ने ये भी फरमाया है कि इस किताब में तकवाकार लोगों के लिए हिदायत है।

कुछ लोग इस आयत का ये माना निकाल लेते हैं कि इस किताब में सिर्फ मुसलमानो के लिए ही हिदायत है। यहाँ पर अल्लाह ताला ने “मुत्तकीन” लफ्ज का इस्तेमाल किया है न कि मुस्लिमीन। मुत्तकीन के माना होते हैं ऐसे लोग जो अल्लाह से डरते हों और उसी पर भरोसा रखते हों।

हरफ़े मुक़त्त-आत (अलिफ लाम मीम) 

कुरान पाक की 29 सूरतों के शुरू में इस तरह के हुरूफ़ हैं। इन्हे “हुरूफ़े मुक़त्त-आत” कहते हैं। इनके बारे में सबसे खास बात ये है कि ये हुरूफ़ अल्लाह ताला के राज़ और मुतशाबिहात में से हैं। इनके क्या माना है अल्लाह ताला जानता है। हम इनके हक़ होने पर ईमान लाते हैं। 

(खाजिन, अल बक़्रह, तहतूल आया, 1, 1/20, इत्तेकाने फ़ी उलूम-उल-क़ुरान, अल नू-अ सालिसिल वल अर्बऊन, 2/308)

हुरूफ़े मुक़त्त-आत का इल्म अल्लाह ताला के अलावा किसी और को हासिल है या नहीं?

यहाँ ये एक बात याद रखने लायक है कि अल्लाह ताला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम को भी हुरूफ़े मुक़त्त-आत का इल्म अता फरमाया है।

जैसा कि आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान रहमत उल्लाह अलैहि फरमाते हैं, क़ाज़ी बैदावी रहमत उल्लाह अलैहि “अनवारुत तंजील” में सूरतों कि इबतेदाइयाँ यानि हुरूफ़े मुक़त्त-आत के बारे में फरमाते हैं, “ये एक राज़ है जिसे अल्लाह ताला ने अपने इल्म के साथ मखसूस फ़रमाया है।”

तकरीबन ऐसी ही रिवायात खुल्फ़ाए अरबिया और दीगर साहबाए किराम रज़ीo से भी हैं। और मुमकिन है कि साहबाए किराम रज़ीo ने ये मुराद लिया हो कि ये हुरूफ़ अल्लाह ताला और उसके रसूल सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम के दरमियान राज़ ओ नियाज़ हैं। और ये ऐसे इसरार हैं जिन्हें दूसरे को समझाना मकसूद नहीं। 

इमाम खफ्फाजी रह० फरमाते है, “ अनवारुत तंजील के कुछ नुसख़ों में “इस्तासराहु ल्लाहो बिइलमेही” है और इस्तासराहु रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम के लिए है और “बिइलमेही” का ब मकसूद पर दाखिल है।

यानि अल्लाह ताला ने हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम को अपने इल्म से खास करके मू-अज़्ज़िज़ व मुकर्रम फरमाया। यानि मुक़त्त-आत का इल्म सिर्फ अल्लाह ताला को और उसके रसूल सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम को हासिल है। इस माना को अक्सर मुहक़्किकीन ने पसंद फरमाया है।

( इनायतुल क़ाज़ी, अलबकरह, तहयतुल आया, 1/178)

अल्लामा महमूद आलूसी रह० फरमाते है गालिब ईमान ये है कि हुरूफ़े मुक़त्त-आत मुखफ़ी इल्म और सरबसता राज़ हैं जिनके ईदराक से उलमा आजिज़ हैं। जैसा कि हज़रत अबदुल्ला बिन अब्बास रज़ी० ने इरशाद फरमाया और खयालात उस तक पहुँचने से कासिर हैं।

इसी वजह से हज़रत अबूबक्र सिद्दीक रज़ी० ने फरमाया : हर किताब के राज़ होते हैं और कुरान शरीफ के राज़ सूरतों कि इब्तेदा में आने वाले हुरूफ़ हैं।

इमाम साबी रह० फरमाते हैं : ये हुरूफ़ अल्लाह ताला के इसरार हैं तो इनकी खोज न लगाओ क्योंकि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम के बाद इनकी मारफ़त आप सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम के उलूम के वारिस औलियाय किराम को है।

उन्हें इसी बारगाह से मार्फत हासिल होती है और कभी ये हुरूफ़ खुद उन्हे अपना माना बता देते हैं जैसे हुज़ूर सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम के हाथों में कंकरियों ने तसबीह के जरिये कलाम किया था

ल रैबा फ़ीह – कोई शक नहीं 

आयत के इस हिस्से में कुरान शरीफ के एक वस्फ़ बयान किया गया है। इस आयत में ज़िक्र किया गया है कि कुरान एक ऐसी बुलंद और अजमत व शर्फ़ वाली किताब है जिसमें किसी तरह के शक वो शुब कि कोई गुंजाइस नहीं

शक उस चीज़ में होता है जिसकी हक़्क़ानीयत कि कोई दलील न हो। जबकि कुरान पाक अपनी हक्कानियत कि ऐसी वाजेह और मजबूत दलील रखता है जो हर साहिबे निसाब और और अक़्लमंद इंसान को इस बात पर यकीन करने पर मजबूर कर देती है कि ये किताब हक़ है और अल्लाह ताला कि तरफ ने नाज़िल हुई है।

जैसे किसी अंधे के इंकार से सूरज का वजूद खत्म नहीं होता ऐसे ही किसी बेअक़्ल मुखालिफ के शक और इंकार करने से ये किताब ग़लत नहीं हो सकती।

हुदल्लिल मुत्तकीन (hudallil muttaqeen) ( डरने वालों के लिए हिदायत है)

आयत के इस हिस्से में कुरान मजीद का एक और वस्फ़ बयान किया गया है। अल्लाह ताला ने इस आयत में फरमाया है कि ये किताब उन तमाम लोगों को हक़ कि हिदायत देती है जो अल्लाह ताला से डरते है। और जो लोग नहीं डरते उन्हे कुरान से हिदायत हासिल नहीं होती। 

याद रहे कि कुरान पाक कि हिदायत और रहनुमाई अगरचे मोमिन और काफ़िर हर सख्स के लिए आम है। जैसा कि सूरह बक़्रह कि आयत नंबर 185 में अल्लाह ताला ने इरशाद फरमाया “हुदल्लिन नास” यानि कुरान मजीद तमाम लोगों के लिए हिदायत है।

लेकिन चूंकि कुरान मजीद से हक़ीक़ी नफ़ा सिर्फ मुत्तकी लोग हासिल करते हैं इसलिए यहाँ हुदल्लिल मुत्तकीन (hudallil muttaqeen) यानि मुत्तकीन के लिए हिदायत फरमाया गया है। 

( आबु सऊद, अल बक़्रह, तहयतुल आया, 2, 1/23)

तकवा के माना 

तकवा के माना है नफ़्स को खौफ कि चीज़ से बचाना। और शरीयत इस्तेलाह में तकवा का माना है कि नफ़्स को हर उस काम से बचाना जिसे करने या न करने से कोई शख्स अज़ाब का मुस्तहक हो।

जैसे कुफ़्र, शिर्क, कबीरा गुनाह, और बेहयाई के कामों से अपने आप को बचाना, हराम चीजों को छोड़ देना और फराइज़ अदा करना। बुज़ुर्गाने दीन ने यूं भी फरमाया है कि तकवा ये है कि तेरा खुदा तुझे वहाँ न पाये जहां उसने मना फरमाया है।

(मिदराक, अल बक़्रह, तहयतुल आया, 2 )

तकवा के फजाइल 

कुरान मजीद और हदीस में तकवा हासिल करने और मुत्तकी बनने कि तरगीब और फ़ज़ाइल बेकसर बयान किए गए हैं। चुनांचे अल्लाह ताला इरशाद फरमाता है –

surah ale imran verse 102
सूरह आले इमरान आयत 201

ऊपर दी गयी आयत में अल्लाह रबबूल इज्ज़त अपने बंदो से फरमाता है : ऐ ईमान वालों! अल्लाह से डरो जैसा उससे डरने का हक़ है और ज़रूर तुम्हें मौत सिर्फ इस्लाम कि हालत में आए।

अल्लाह ताला फिर इरशाद फरमाता है-

surah ahzaab verse 70-71
सूरह अहज़ाब आयत 70-71

ऐ ईमान वालों! अल्लाह से डरो और सीधी बात कहा करो। अल्लाह तुम्हारे आमाल तुम्हारे लिए संवार देगा और तुम्हारे गुनाह बख्श देगा और जो अल्लाह और उसके रसूल कि फर्मान्बर्दारी करे उसने बड़ी कामयाबी पायी।

हज़रत अतिया सादी रज़ी० से रिवायत है रसूले करीम सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया, “कोई बंदा उस वक़्त तक मुत्तकीन में शुमार नहीं होगा जब तक कि वह नुकसान ना देने वाली चीज़ को किसी दूसरी नुकसान वाली चीज़ के डर से ना छोड़ दे” ( यानि किसी जायज़ चीज़ के इर्तिकाब से ममनू-अ चीज़ तक ना पहुँच जाए) 

( तिरमिज़ी, सफतुल क़यामा, 19 बाब, 4/204-205, हदीस, 2459)

हज़रत आबु सईद रज़ी० से रिवायत है, नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया, “ तुम्हारा रब अज़्ज़ व जल्ल एक है, तुम्हारा बाप एक है और किसी अरबी को अज्मी पर फ़ज़ीलत है ना किसी अज्मी को अरबी पर, न गोरे को काले पर न काले को गोरे पर फ़ज़ीलत है। फ़ज़ीलत अगर किसी चीज़ कि है तो वो है तकवा।

(मुयज्जमूल वस्त, 3/329, हदीस, 4749)

हज़रत अनस रज़ी० से रिवायत है हुज़ूर पुरनूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया, “ तुम्हारा रब इरशाद फरमाता है : इस बात का मुस्तहक सिर्फ मैं ही हूँ कि मुझसे डरा जाए और जो मुझसे डरेगा तो मेरी शान ये है कि मैं उसे बख्श दूँ।

(दारमी, किताबुल रिकाक, बाब फ़ी तकवा अल्लाह, 2/392, हदीस, 2724)

तकवा के मरातिब 

उलमा ने तकवा के मुखतलिफ़ मरातिब बयान फरमाए हैं, जैसे आम लोगों का तकवा ईमान लाकर कुफ़्र से बचना है। मुतविस्त लोगों का तकवा अहकामात कि पैरवी करना और ममनू-आत से रुकना है। और खास लोगों का तकवा हर ऐसी चीज़ को छोड़ देना जो अल्लाह ताला से गाफिल करे। 

(जुमल, अल बक़्रह, तहयतुल आया,2, 1/17)

आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान रह० के फरमान के मुताबिक तकवा कि सात किसमे हैं।

  1. कुफ़्र से बचना
  2. बदमज़हबी से बचना
  3. कबीरा गुनाह से बचना
  4. सगीरा गुनाह से बचना
  5. शुब-हात से परहेज करना
  6. नफ़सानी ख्वाहिशात से बचना
  7. अल्लाह ताला से दूर ले जाने वाली हर चीज़ कि तरफ तवज्जो करने से बचना

और कुरान शरीफ इन सातों मर्तबों कि तरफ हिदायत देने वाला है –(खजाइनूल इरफ़ान, अल बक़्रह, तहयतुल आया, 2)

अल्लाह ताला हमें मुत्तकी और परहेजगार बनने कि तौफीक अता फरमाए। आमीन

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