Innallazeena Kafaroo- सूरह अल बक़्रह आयत 6 की तफ़सीर

“Innallazeena Kafaroo sawaaun alaihim a anzarta hum am lam tunzir hum la yoominoon.”

Surah Al Baqraha Verse 6

“इन्नल्लजीना कफ़रू सवाऊन अलैहिम अ अंजरतहुम अम लम तुंज़िर हुम ला यूमीनून”

तर्जुमा कन्ज़ुल इरफ़ान – बेशक वह जिनकी किस्मत में कुफ़्र है उन्हें बराबर है चाहे तुम उन्हें डराओ या न डराओ वह ईमान लाने के नहीं।


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अस्सलाम अलैकुम व रहमत उल्लाह! मेरे प्यारे इस्लामी भाइयों तफ़सीरुल कुरान के सिलसिले में आज हम सूरह अल बक़्रह की आयत नम्बर 6 की तफ़सीर का तज़किरा करेंगे।

अल्लाह ताला ने इस आयात मे काफिरों के हिठ्पने का ज़िक्र किया है। जिनकी किस्मत मे कुफ़्र है उन्हे कितना भी डराया जाए वो ईमान नहीं लाएँगे।

इस आयत मे अल्लाह ताला अपने महबूब, अहमद मुजतबा मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम से इरशाद फरमाते हैं कि तुम काफिरों को कितना भी साझाओगे या डराओगे वो ईमान नहीं लाएँगे। अगर मैंने उनके किस्मत मे ही कुफ़्र लिख दिया है तो।

Innallazeena Kafaroo sawaaun alaihim- बेशक वह लोग जिनकी किस्मत में कुफ़्र है उनके लिए बराबर है।

जैसा हम जानते हैं, ठंडक की पहचान गर्मी से, दिन की पहचान रात से और अच्छाई की पहचान बुराई से होती है। इसी तरह कुरान मे भी इससे पहले की आयतों में एक मोमिन का ज़िक्र था तो आगे एक काफिर और मुनाफिक की भी पहचान का ज़िक्र किया गया है।

इस आयत और इसके आगे की चंद आयतों मे अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने काफिरों वस्फ़ बयान किए हैं। जो कि इंसान के लिए जानते रहना बहुत ज़रूरी है। ज़रूरी इसलिए कि वो जानता रहे कि वो कुफ़्र है या ईमान पर या फिर सिर्फ दिखावा कर रहा है।

इस आयात का खुलासा कुछ इस तरह है –

“ऐ प्यारे हबीब! (सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम), वह जिनकी किस्मत में कुफ़्र है जैसे अबू जहल और अबू लहब वगैरा। इनके लिए बराबर है कि आप उन्हें अल्लाह ताला के एहकामात की मुखालफत से डराएँ या न डराएँ, ये किसी सूरत मे ईमान नहीं लाएँगे। क्योंकि इनके बारे मे अल्लाह ताला जो पहले से ही मालूम है कि ये लोग ईमान से महरूम हैं।

कुफ़्र का तार्रूफ और असली काफिरों को तबलीग़ करने का हुक्म देने कि वजह।

यहाँ पर दो बातें याद रखने लायक हैं –

#1

दीन के लिए ज़रूरी किसी भी चीज़ का इंकार करना या तहकीर-ओ-इस्तहज़ा करना कुफ़्र है। इस्लाम मे ज़रूरी चीज़ें हैं, इस्लाम के वो एहकाम जो हर आम वो खास जानते हों।

जैसे अल्लाह ताला कि वहदानीयत, अंबियाय किराम कि नुबुवत, नमाज़, रोज़े, हज, जन्नत, दोज़ख़, क़यामत मे उठाया जाना वगैरा।

आवाम से मुराद वो मुसलमान हैं जो उलैमा के तबक़े मे शुमार न किए जाते हों। मगर उलमा के सोहबत मे बैठने वाले हों और इल्मी मसाइल का शौक रखते हों।

इससे वह लोग मुराद नहीं जो दूर दराज़ जंगलों, पहाड़ों मे रहने वाले हों जिन्हें सही कलमा पढ़ना भी न आता हो। ऐसे लोगों का ज़रूरियाते दिन से नावाकिफ होना मायिने नहीं रखता।

अलबत्ता ऐसे लोगों के मुसलमान होने के लिए ये बात ज़रूरी है कि वो ज़रूरियाते दीन का इंकार करने वाले न हों और ये अक़ीदा रखते हों कि इस्लाम में जो कुछ है सब हक़ है।

#2

ईमान से महरूम कुफ़्फ़ार के बारे मे मालूम होने के बावजूद उन्हे तबलीग़ करने का हुक्म इसलिए दिया गया ताकि उन पर हुज्जत पूरी हो जाए और क़यामत के दिन उनके लिए कोई आज़ार बाकी न रहे।

अल्लाह ताला इरशाद फरमाता है –

“रुसूलम मुबास्शैरीना व मुंजेरीना लिअल्ला यकूना लिन्नासि अलल ल्लाही हुज्जतुम बादर रुसुल, व कानललाहो अज़ीज़न हकीमा।”

सूरह अन निसा आयत १६५

तर्जुमा कंजुल इरफ़ान – रसूल खुशखबरी देते और दर सुनाते के रसूलों के बाद अल्लाह के यहाँ लोगों को कोई अज़र न रहे और अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है।

और इरशाद फरमाया

“व लौ अन्न अहलक्नाहुम बेअजाबिम मिन कब्लिही लकालू रब्बना लौ ल अरसलता रसूलन फनत्तबे-अ आयातेका मिन कब्ली अन्न नाज़िल्ल व नखारा।”

सूरह ताहा आयत 134

तर्जुमा कंजूल इरफ़ान – और अगर हम उन्हे रसूल के आने से पहले किसी अज़ाब से हलाक कर देते तो ज़रूर कहते: ऐ हमारे रब! तूने हमारी तरफ कोई रसूल क्यों न भेजा कि हम ज़लील व रुसवा होने से पहले तेरी आयतों कि पैरवी करते।

इस तरह उन्हें तबलीग़ करने से एक फ़एडा एक फ़ाएदा ये भी हासिल हुआ कि वो अगरचे ईमान नहीं लाये लेकिन हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहो ताला अलैहि वस्ल्लम को उन्हे तबलीग़ करने का सवाब ज़रूर मिलेगा।

और ये बात हर मुबल्लीग़ को पेशे नज़र रखनी चाहिए कि उसका कम सिर्फ तबलीग़ करना और रजाये इलाहि पाना है। लोगों को सीधी राह पर लाकर ही छोड़ना ही नहीं।

लिहाजा मुबल्लिग नेकी कि दावत देता रहे और नतीजे अल्लाह ताला के हवाले कर दे। और लोगों के नेकी कि दावत कुबूल न करने पर मायूस न हो। इसके बजाए सवाब पर नज़र रखे जो उसे नेकी कि दावत देने कि सूरत में आखिरात मे मिलने वाला है।

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