Yoominoona Bilgayeeb – तफ़सीरे अल बक़्रह आयत 3

अल्लाह ताला फरमाता है Yoominoona Bilgayeeb. जिसके माना होते हैं बिना देखे ईमान लाना। यहाँ पर अल्लाह ताला उन लोगों के वस्फ़ बयान करता है जो बिना किसी शक या शुब के ईमान ले आते हैं।

अस्सलाम अलइकूम व रहमतुल्लाह ! मेरे प्यारे भाइयो रहे हक़ की इस तफ़्सीसुरुल कुरान मुहिम में आप सभी का खर मख्दम है। तफ़सीरत का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए आज हम सूरह अल बक़्रह की आयत नंबर 3 का ज़िक्र करेंगे।

इस आयत में अल्लाह रब्बुल इज्ज़त, उन लोगों के वस्फ़ बयान करता है जिन्होने हुज़ूर सल्लाल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम को देखे बिना ईमान ले आए। इस आयत में उन लोगों का ज़िक्र है जो ज़ाहिरी और बतिनी दोनों तौर पर इस्लाम में शरीक हुए हैं।

अल्लाह रब्बुल इज्ज़त की ऐसी फरमान को और बेहतर तरीके से जानने के लिए हम इस आयत की मतर्जुम तफ़सीर पढ़ते हैं। तो आइए अल्लाह का नाम लेकर शुरू करते हैं-

bismillah
surah al baqrah ayat 3

तर्जुमा कंजूल इरफ़ान – वो लोग जो बेगैर देखे ईमान लाते है और नमाज़ कायम करते हैं और हमारे दिये हुए रिज्क में से कुछ हमारी रह में खर्च करते हैं।

अललजीना यूमीनूना बिल्गइब (Allazeena Yoominoona Bilgayeeb) – वो लोग जो बेगैर देखे ईमान लाते हैं 

आयत के इस हिस्से में मुत्तकी लोगों का एक वस्फ़ बयान किया गया है कि वो लोग बेगैर देखे ईमान लाते हैं।

यानि वो उन तमाम चीजों पर ईमान लाते हैं जो उनकी निगाहों से पोशीदा है और नबी करीम सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने उन के बारे में खबर दी है।

जैसे मरने के बाद दोबारा ज़िंदा किया जाना, क़यामत का कायम होना, आमाल का हिसाब होना और जन्नत व जहन्नम वगैरा।

एक मत ये भी है कि यहाँ गैब से मुराद है क़ल्ब यानि दिल। इस हालत में इस आयत के माना होते है कि “वो दिल से ईमान लाते हैं”।

ईमान और गैब से मुताल्लिक कुछ अहम बातें 

इस आयत में “ईमान” और “गैब” का ज़िक्र हुआ है इसलिए इनके मुताल्लिक कुछ अहम बातें याद रखें-

#1

“ईमान” उसे कहते हैं कि बंदा सच्चे दिल से उन सब बातों कि तसदीक करे जो ज़रूरियाते दीन हैं। और किसी एक जरूरते दीन के इन्कार को कुफ़्र कहते हैं।(बहारे शरीयत, 1/172)

#2

“अमल” ईमान में दाखिल नहीं होते इसीलिए कुरान पाक में ईमान के साथ अमल का अलग अलग ज़िक्र किया जाता है। जैसे इस आयत में भी ईमान के बाद नमाज़ व सदका का ज़िक्र अलहीदा तौर पर किया गया है। 

#3

“गैब” वो है जो हमसे पोशीदा हो और हम इसे अपने हवास में जैसे, देखने, सुनने, छूने वगैरा से मालूम न कर सकें।

#4

गैब कि दो किस्में हैं – 

(1) जिसके हासिल होने पर कोई दलील न हो। ये इल्म गैब ज़ाती है और अल्लाह ताला के साथ खास है और जिन आयात में गैर अल्लाह से इलमे गैब न होने का ज़िक्र है वहाँ इसी इलमे गैब से मुराद होता है। 

(2) जिसके हासिल होने पर दलील मौजूद हैं अल्लाह ताला की ज़ात व सफ़ात, सारे अंबियाय किराम। ये सब अल्लाह ताला के बताने से मालूम है और जहां भी गैरुल्लाह के लिए गैब की मालूमात का सबूत हो वहाँ अल्लाह ताला के बताने से ही होता है 

#5

अल्लाह ताला के बताए बगैर किसी के लिए एक ज़रिये का इल्मे गैब मानना क़तई कुफ़रा है।

#6

अल्लाह ताला अपने मुकर्रब बंदो जैसे अंबियाय किराम और औलियाय इज़ाम पर गैब के दरवाजे खोलता है जैसा की खुद कुरान व हदीस मे है। इस मौजू पर आगे का ज़िक्र सूरह आले इमरान की आयत नंबर 179 की तफ़सीर मे किया गया है।

वयकीमूनस सलात (और नमाज़ क़ायम करते हैं)

आयात के इस हिस्से में मुत्तकी लोगों का दूसरा वस्फ़ ज़िक्र किया गया है की वो नमाज़ क़ायम करते हैं। नमाज़ क़ायम करते हैं से मुराद ये है कि नमाज़ के ज़ाहिरी और बातिनी हुकूक अदा करते हुए नमाज़ पढ़ी जाए।

नमाज़ के ज़ाहिरी हुकूक ये हैं कि हमेशा ठीक वक़्त पर पाबंदी के साथ पढ़ी जाए और नमाज़ के फराइज़, सुन्नन और मुस्तहबात का ख़्याल और तमाम मुफ़्सीदात व मकरूहत से बचा जाए।

बातिनी हुकूक ये हैं कि आदमी दिल को गैरुल्लाह के ख़्याल से फारिग ज़ाहिर व बातिन के साथ बरगाहे हक़ में मुतवज्जो हो और बरगाहे इलाही में अर्ज़ों नियाज़ मुनाजात में महू हो जाए।

नमाज़ क़ायम करने के फराइज़ व न करने की वईदें 

कुराने मजीद और हदीस में नमाज़ के हुक़ूक की अदाएगी के साथ नमाज़ पढ़ने वालों के फजाइल बयान किए गए हैं और न पढ़ने वालों की मज़म्मत की गयी है। चुनांचे सूरह मोमीनून में अल्लाह ताला इरशाद फरमाता है –

surah mominun ayat 1-2

तर्जुमा कंजुल इरफ़ान – बेशक ईमान वाले कामयाब होंगे। जो अपनी नमाज़ में खुशु व खुजू करने वाले हैं।

इसी सूरह में ईमान वालों के और भी औसाफ बयान करने के बाद उनका एक वस्फ़ ये बयान फरमाया कि

surah mominun ayat number 9

तर्जुमा कंजुल इरफान – और जो अपनी नमाजों कि हिफाज़त करते हैं।

और इन औसाफ के के हमील ईमान वालों के बारे में इरशाद फरमाता है।

surah mominun ayat number 10-11

तर्जुमा कंजुल इरफ़ान – यही लोग वारिस हैं। ये जन्नत कि मीरास पाएंगे, वह इसमें हमेशा रहेंगे।

नमाज़ मे सुस्ती करने वालों और नमाज़ जाये करने वालों के बारे मे अल्लाह ताला इरशाद फरमाता 

surah nisa ayat number 142

तर्जुमा कंजूल इरफान – बेशक मुनाफिक लोग अपने गुमान अल्लाह को फरेब देना चाहते हैं और वही उन्हे गाफिल करके मारेगा। जब नमाज़ के लिए खड़े होते हैं तो बड़े सुस्त होकर लोगों के सामने रियाकारी करते हुए खड़े होते है और अल्लाह को बहुत कम याद करते हैं। 

फिर अल्लाह ताला ने इरशाद फ़रमाया — 

surah maryam ayat number 59-60

तर्जुमा कंजुल इरफ़ान – तो उनके बाद वो नालायक लोग आए जिनहोने नमाजों को जाय किया। और अपनी ख्वाहिशों की पैरवी की तो अनकरीब वो जहन्नम की खौफनाक वादी गई से जा मिलेंगे मगर जिनहोने तौबा की और ईमान लाये और नेक काम किए तो ये लोग जन्नत में दाखिल होंगे और इनपर कोई ज़्यादती नहीं होगी।

हज़रत ऊष्मान गनी रज़ी० फरमाते हैं: सरकारे दो आलम सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया : “ जिसने मेरे इस वज़ू की तरह वज़ू किया फिर उस तरह दो रकत नमाज़ पढ़ी कि उनमे खयालात न आने दे तो उसके पिछले गुनाह बख्श दिये जाएंगे।” (बुखारी, किताबुल वज़ू, हदीस, 159)

हज़रत अबू सईद खुदरी रज़ी० से रियायत है हुजूरे अक़्दस सल्लल्लाहो ताला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया: “जिसने जानबूझ कर नमाज़ छोड़ी जहन्नम के उस दरवाज़े पर इसका नाम लिख दिया जाता है जिससे वो दाखिल होगा।” (हालेतुल औलिया, 7/299, हदीस, 10890)

मिम्मा रजक़्नाहुम यून्फ़िकून – (और हमारे दिये हुए रिज्क से हमारी रह में कुछ खर्च करते हैं)

आयत के इस हिस्से में मुत्तकी लोगों का तीसरा वस्फ़ बयान किया गया है। वो अल्लाह ताला के दिये हुए रिज्क में कुछ अल्लाह ताला की राह में खर्च करते हैं। रहे खुदा में खर्च करने से ज़कात मुराद है, जैसी कई जगहों पर नमाज़ के साथ ज़कात का तज़किरा है।

या इससे मुराद तमाम क़िस्म के सदक़ात हैं जैसे गरीबों, मिसकीनों, यतीमों, तलबा, वुलमा, मस्जिद व मदरसे वगैरा को देना

माल खर्च करने में समझदारी से काम लेना चाहिए 

आयत में फरमाया गया कि जो हमारे दिये हुए में से कुछ हमारी राह में खर्च करते हैं। इससे मालूम होता है कि रहे खुदा में माल खर्च करने में ऐसा नहीं होना चाहिए कि इतना ज़्यादा माल खर्च कर दिया जाए कि खर्च करने के बाद आदमी पछताए

और न ही खर्च करने में कंजूसी से काम लिया जाए बल्कि इस में एतदल होना चाहिए। इस चीज़ कि तालीम देते हुए एक आर मक़ाम पर अल्लाह इरशाद फरमाता है —

surah bani israel ayat number 29

तर्जुमा कंजूल इरफ़ान – और अपना हाथ अपनी गार्डन से बढ़ा हुआ न रखो न पूरा खोल दो की फिर मलामत में हसरत में बैठे रह जाओ।

surah furqan ayat 67

तर्जुमा कंजूल इरफान – और वो लोग की जब खर्च करते है तो न हद से बढ़ते हैं न तंगी करते हैं और इन दोनों के दरमियान एतदाल से रहते हैं। 

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